मेरे कपड़ों पर सियाह दाग न हो तो इनके कपड़ों पर खून के सूर्ख धब्बे होंगे !

रेहान खान, मुंबई

Asia Times Desk

मैं एक गैंगमेन हूँ. गैंग शब्द पर आप चोंक पड़ें होंगे, लेकिन मेरा काम लोगो की ज़िन्दगीयाँ ख़त्म करने की बजाए उन्हें बचाना है. मैं रात के अँधेरे में सड़कों पर रिवोल्वर छुपा कर घूमने की बजाए दिन के उजाले में बेलचे और हथोड़े उठाए रेलवे के ट्रैक पे चलता हूँ.

रोजाना मौत सेंकडों बार मेरे दाएँ-बाएँ से गुज़रती है. इससे डर भी लगता है लेकिन पेट बड़ा पापी होता है. इसकी मांगें मौत को ख़त्म कर सकती है लेकिन मौत के खौफ को नहीं. मैं अकेला भी तो नहीं हूँ भरा पूरा खानदान है. बीमार माँ है, आँखों में एक उजव्वल भविष्य की आशा सजाए सुबह सवेरे स्कूल जाने वाले बच्चें हैं. इन बच्चों की माँ भी जो अपनी अधेड़ उम्र में ही बूढ़ी नज़र आने लगी है.

जब मैं काम पर निकलता हूँ तो वो मुझे यूँ देखती है जैसे आखिरी बार देख रही हो और इसके बाद उसे मेरी लाश ही देखनी नसीब होगी! मैं काम ही ऐसा करता हूँ. मैं मुंबई की लाइफ लाइन समझी जाने वाली लोकल ट्रेन के ट्रैक की देख रेख और मरम्मत करने वाली टीम का हिस्सा हूँ. मैं और मेरे साथी रोज़ाना जान हथेली पर रख काम कर करते हैं ताकि लोकल ट्रेन से सफ़र करने वाले लगभग एक करोड़ लोग सही सलामत अपने घर पहुँच सके. जब मैं सपनी शिफ्ट पूरी करने के बाद घर लौटता हूँ तो मुझे एक इत्मिनान होता है कि लाखों लोगों को सही सलामत घर पहुँचाने में एक बिसात भर ही सही मेरा हिस्सा ज़रूर है. मैं खुश भी होता हूँ कि मैं खुद भी उन ट्रैक से सही सलामत घर पहुँचता हूँ जहाँ मलक उल मौत (इश्वर के आदेश पर इंसानों की जान निकालने वाला फ़रिश्ता) का आना-जाना लगा रहता है.

घर पहुँचता हूँ तो बेगम के चेहरे पर छाए शंका के बादल एक पल के लिए छंट जाते हैं, लेकिन आने वाले कल की चिंता से फिर उसके चेहरे पर उस शंका के बादल फिर से घिर आते हैं. वो कहती है कि मैं ये काम छोड़ क्यूँ नहीं देता, लेकिन मैं इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकता मेरी शिक्षा-दीक्षा सिर्फ इतनी है कि मैं स्टेशन्स के नाम पढ़ लेता हूँ.

इतनी सी शिक्षा से मैं और कुछ नहीं कर सकता लेकिन अपने बच्चों को पढ़ा रहा हूँ ताकि उन्हें आगे ऐसी ख़तरे से भरी नौकरी न करनी पड़े.
काम के दौरान मुझे बहुत सारे अनुभव हुए हैं. रेलवे ट्रैक की मरम्मत के लिए अक्सर मुझे एक जगह से दूसरी जगह जाना होता है. इसके लिए मैं अगर कभी गलती से भी फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में चढ़ जाऊं तो मेरे कपड़ों पर लगे ग्रीस के दाग देखकर मुझे घनघोर तिरिस्कार के साथ उतार दिया जाता है.

इस बात का मुझे बुरा लगता है लेकिन मैं ये सोच कर खामोश हो जाता हूँ, कि मैं इन चमकते कपडों में काले दिल रखने वाले इंसानों से कहीं ज्यादा रोशन दिल रखता हूँ, मेरे कपड़ों पर सियाह दाग न हो तो इनके कपड़ों पर खून के सूर्ख धब्बे होंगे. अक्सर गुटखा खाने वाले लोग ट्रेन से मुझ पर थूक भी देते हैं.
मुझे एक और भयानक अनुभव हुआ था मैं अपने एक दोस्त के साथ ट्रैक पर काम कर रहा था. दो ट्रेकों के बीच मुश्किल से 5 फिट का फासला रहा होगा. हमने एक ट्रैक की मरम्मत की जिसपे थोड़ी ही देर बाद एक फ़ास्ट लोकल गुजरने वाली थी. ट्रैक क्लियर करके हम वहीँ बैठकर सुस्ताने लगे. कुछ देर बाद उस ट्रैक पे ट्रेन आई जिसकी हमने मरम्मत की थी, उसी दौरान बाजू वाले विपरीत दिशा के ट्रैक पर भी ट्रेन आ गई. दोनों ट्रेनों के बीच 5 या 6 फिट का फासला था और बीच में हम खड़े थे. अचानक एक मनचले ने ट्रेन के दरवाजे पर लटक कर मेरे दोस्त को लात मार दी जिससे वो लड़खड़ा कर दूसरी ट्रेन के पहियों के नीचे चला गया. खून की फूंवार मेरे चेहरे पर आई. मेरे साथी को लात उस ट्रैक से आने वाली ट्रेन से मारी गयी थी जिसकी हमने कुछ देर पहले मरम्मत की थी. हम वो ट्रैक ठीक नहीं करते तो हज़ारों लोग मरे जाते जिसमें वो मनचला भी शामिल हो सकता था जिसने मेरे साथी को लात मारी थी. मेरे दोस्त की लाश को पुलिस कार्यवाही के बाद घर पहुँचाने मैं ही गया था. उसकी माँ अंधी थी, वो अपने बेटे की लाश टटोल कर उसकी पैशानी तलाश कर रही थी ताकि उसपर ममता का अलविदाई बोसा सब्त कर सके, लेकिन पैशानी होती तो मिलती. मजबूरन किसी ले लाश के सिरहाने एक छोटी सी हांडी रख दी. जिसपर माँ ने अपने बेटे का आखिरी बोसा लिया. वो भी माँ थी समझ गई होगी कि ये पैशानी नहीं है लेकिन कुछ वक़्त के लिए उसने खुद को धोका दे लिया. मेरे दोस्त को अपनी माँ की आँखों की रौशनी चले जाने का अफ़सोस रहता था, लेकिन अगर वो जानता कि वो उसके कुचले हुवे सर वाली लाश नहीं देख सकेगी तो हरगिज़ अफ़सोस न करता.
इसी तरह एक 53 वर्ष का गैंगमेन सुबह के व्यस्त समय में ट्रैक की देखभाल की ड्यूटी पर था. दुरंतो एक्सप्रेस से एक आदमी उतरा और ब्रिज के बजाए ट्रैक फलांगता हुवा अँधेरी स्टेशन के दुसरे सिरे पर जाने लगा. वहां पर कोई आठ ट्रैक थे जिन पर लगातार ट्रेनों का आना जाना लगा हुवा था. वो मुसाफिर सिर्फ एक ही दिशा में देखता हुवा ट्रैक पार कर रह था. 53 साल के इस गैंगमेन में उस आदमी को उस वक्त रोका जब वो जिधर देख रहा था उसके विपरीत दिशा से एक ट्रेन उसकी तरफ चली आ रही थी. मुमकिन था कि वो उस ट्रेन की चपेट में आ जाता लेकिन इस 53 साल के गैंगमेन ने उसे पकड़ कर पीछे खींच लिया. इस कोशिश में उस मुसाफिर की जान तो बाख गयी लेकिन उसे बचने की कोशिश में ये गैंगमेन खुद ट्रेन से जा टकराया. ट्रेन ने उसे उचल कर दूर फेंक दिया. उसकी जान तो बाख गयी लेकिन शरीर में आये 6 फ्रेक्चरों की वजह से वो अगले दो साल के लिए बिलकुल नाकारा हो गया था. डॉक्टरों ने कहा कि उम्र ज्यादा है इसलिए रिकवरी में दो साल से ज्यादा का समय भी लग सकता है. इस हादसे को काफी दिन गुज़र गए हैं लेकिन अभी तक उस मुसाफिर ने अपनी जान बचाने वाले मुहसिन की खैर खबर लेना भी गवारा नहीं किया.
फर्स्ट क्लास से झिडकियां देकर निकाल देने वाले, दरवाजे पर लटक कर किक मारने वाले, जान बचने के बाद हमें भूल जाने वाले वही इन्सान हैं, जिन्हें सही सलामत घर तक पहुँचाने वाले गैंगमेन रोजाना अपनी जिंदगियां दांव पर लगाते हैं. लोगों को सोचना चाहिए मैं भी इन्सान हूँ मेरा भी स्वाभिमान है, मेरा भी खानदान है, मैं भी उनकी तरह ही एक मुम्बईकर हूँ. मैं ये नहीं कहता मेरी आवभगत की जाये मेरी मेहनतों के बदले मुझे पूजा जाए. मेरी बस इतनी सी मांग है कि मुझे भी इन्सान समझा जाए और मेरी ये मांग नाजाईज़ नहीं है.

लेखक : रेहान खान, मुंबई

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