जलवायु परिवर्तन का मास्टर प्लान भारत का चुनावी मुद्दा होना चाहिए

फ्रैंक एफ़. इस्लाम

Asia Times Desk

जून 2018 में जारी विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन से भारत की जीडीपी दर ढाई फीसद तक घट सकती है जिससे 2050 तक भारत की पचास प्रतिशत आबादी का जीवन स्तर नीचे जा सकता है।

भारत में दो माह तक चलने वाला चुनाव शुरू हो चुका है। यह चुनाव इस दृष्टि से भी बेहद महत्पूर्ण है कि देश को जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना है। अधिकतर लोग उस परिवर्तन को भारत के बदहाल पर्यावरण से जोड़कर देखते हैं। जो सही ही है। हालांकि इसमें कई और महत्वपूर्ण क्षेत्र भी शामिल हैं- विशेष तौर पर अर्थ-वित्त और मतदाता। भारत का वर्तमान पर्यावरणीय, आर्थिक और चुनावी माहौल काफी समस्यात्मक है। माहौल बदलने के इन तीन क्षेत्रों को समग्रता में और तत्परता से देखने की जरूरत है ताकि भारत ने विकासशील देश से विकसित देश की श्रेणी में आने के लिए जो छलांग लगायी है वह कायम रहे।

पर्यावरणीय परविर्तन भारत के लिए नयी बात नहीं है। अब तक विश्व के 196 नेताओं ने पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर कर यह बात स्वीकार की है कि ग्लोबल वार्मिंग एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। यह समझौता दिसंबर, 2015 में संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेन्शन में तय पाया था।

पिछले साल अक्टूबतर में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरशासनीय पैनल (यूएनआईपीसीसी) ने चेतावनी दी थी कि पहले अनुमानित स्तर की अपेक्षा वातावरण और तेजी से खराब हो रहा है और अगर बड़े बदलाव नहीं किये गये तो 2040 तक भयावह परिणाम होंगे। जलवायु परिवर्तन के लिए संकुचित समय सारिणी डराने वाली है। भारत के लिए तो यह और डरावनी है। वल्र्ड बैंक के अनुसार ‘भारत उन देशों में शामिल है जहां जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा हो सकता है।’ आशंका है कि 2020 तक भारत के जल, वायु, मिट्टी और जंगलों पर दुनिया का सर्वाधिक दबाव होगा।

यह एक भयावह बात है। अधिक भयावह बात यह है कि इस दबाव का असर भारत के लोगों और इसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है।

जून 2018 में जारी विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन से भारत की जीडीपी दर ढाई फीसद तक घट सकती है जिससे 2050 तक भारत की पचास प्रतिशत आबादी का जीवन स्तर नीचे जा सकता है। यूएनआईपीसीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से खाद्य सुरक्षा और आजीविका के अवसर के मामले में संसाधनहीन और कमजोर आबादी पर बेहद गंभीर दुष्प्रभाव होंगे और इसका स्वास्थ्य पर भी बुरा असर होगा। भारत में संसाधनहीन और बेसहारा आबादी की तादाद काफी बड़ी है। वे और आम भारतीय पहले से इसके गंभीर परिणामों का सामना कर रहे हैं। नयी दिल्ली स्थित सर गंगा राम हॉस्पिटल के सर्जन डा. अरविंद कुमार बताते हैं: हमारे कई शहरों में नवजात तो पहली सांस से ही स्मोकर हो जाते हैं।

बाढ़ और सुखाड़ के मामले बढ़ने के कारण खेती करने और आजीविका कमाने के लिए खेत के छोटे प्लॉट घटते जा रहे हैं। आधी भारतीय श्रमशक्ति स्वनियोजित है और अस्सी प्रतिशत से अधिक लोग अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं जहां जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली हानि से किसी प्रकार सुरक्षा नहीं होती है।

यह एक अकाट्य तथ्य है कि भारत में भविष्य का वातावरण और यहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह एक दूसरे से जुड़ी है। बस कुछ साल पहले तक भारत की बड़े स्तर की अर्थव्यवस्था सफलता से और सधे तरीके से बढ़ रही थी। यह विकास अब काफी धीमा हो गया है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका लाभ गरीबों को कभी नहीं मिला।

इसके और कुछ अन्य कारकों के कारण संयुक्त राष्ट्र के विश्व हैप्पीनेस इंडेक्स- 2018 में भारत का नंबर 133 से खिसकर कर 156 हो गया जो 2017 के मुकाबले 17 स्थान नीचे है।

इसमें कोई शक नहीं कि अर्थव्यवस्था में यह जड़ता और भारत की दो तिहाई आबादी जो गांवों में रहती है, उसकी सामान्य अप्रसन्नता इस साल के चुनावी माहौल को प्रतिस्पर्धी और जुझारू बना रही है।

2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपराजेय लग रहे थे। इस सोच को भारतीय जनता पार्टी की राज्यों में सरकार बनाने से बल मिला जिनकी संख्या 2014 से 2018 के बीच छह राज्यों से बढ़कर 21 हो गयी थी। इसके बाद 2018 के दिसंबर में कांग्रेस ने तीन महत्पूर्ण राज्यों में सरकार बना ली।

अब, ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री पद हथियाने के लिए रेस लगी है। भारत के पर्यावरणीय, आर्थिक और चुनावी माहौल को बदलने और तेजी से बेहतर करने के लिए एक समेकित मास्टरप्लान अपनाने की कोई रेस नजर नहीं आती। हालांकि आगामी चुनावों में जीत हासिल करने वाले के लिए निश्चित रूप से यह शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।

भारत के विकास और बदलाव के लिए मेरी नजर में जो सबसे बेहतर बात आयी है वह मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट द्वारा 2016 में प्रस्तुत पांच अवसर हैं।

1. सबके लिए स्वीकार्य जीवन स्तर
2. टिकाऊ शहरीकरण
3. भारत के लिए, भारत में निर्माण
4. डिजिटल लहर की सवारी
5. भारतीय महिलाओं की संभावना की गिरह खोलना

भारत में ग्रीनपीस की प्रवक्ता पूजारानी सेन कहती हैं कि सवाल यह है कि भारत में स्वास्थ्य के मामले में जो एक इमर्जेंसी की हालत है क्या उससे निपटने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति है?

(फ्रैंक एफ़. इस्लाम वाशिंगटन डीसी स्थित उद्यमी और सामाजिक विचारक हैं। ये उनके निजी विचार हैं। उनसे ffislam@verizon.net संपर्क किया जा सकता है।)

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