बलिदान (क़ुर्बानी) का सर्वोत्तम प्रतीक: ईद -उल-अज़हा

तारिक हुसैन रिज़वी

Ashraf Ali Bastavi

विश्व में इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसकी प्रत्येक शिक्षा मनुश्य के लिए एक उदाहरण है जिसकी रौशनी में मनुश्य अपने सही स्थान पर पहुँच सकता है।

इस्लाम धर्म में बलिदान (क़ुर्बानी) का इतिहास हज़रत इब्राहीम अ0 स0 से जुड़ी है। हज़रत इब्राहीम अ0 स0 ने अल्लाह के हुक्म पर अपने एकलोते बेटे हज़रत इस्माईल अ0 स0 को ज़बह करने को तैयार हो गए और चाकू चला दी पर वह चाकू

अल्लाह के हुक्म से उनके गले पर नहीं चली बल्कि उनकी जगह एक दुम्बा पर चाकू चल गया और वहीं से कुर्बानी की शुरूआत हुई। उस समय से सारी दुनिय मे कुर्बानी की शुरूआत हुई ।

उसी समय से विश्व में जहाँ- जहाँ मुस्लिम समुदाय हैं प्रत्येक वर्श ईद उल-अज़हा मानते हैं। इस पावन मुस्लिम पर्व में ग़रीबों का ख़ास ख़्याल रखा जाता है।

न केवल ईद-उल-अज़हा में बल्कि हर एक पर्व में ग़रीबों को सहायता मिलती है।

इस पर्व के शुभ अवसर पर लोग अपने- अपने घरों में विशेश प्रकार के व्यन्जनों को तैयार करते हैं और अपने रिश्तेदारों, दोस्तों व अन्य लोगों को इस पावन पर्व पर निमंत्रण देते हैं।

ईद- उह- अज़हा मानवीय इतिहास में बलि अथवा स्मरण कराता है यह पर्व सबसे पहले अरब देशों में मनाया गया था । उसके बाद धीरे- धीरे अन्य देशों में यह पावन पर्व हर्श उल्हास के साथ मनाया जाने लगा।

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