स्वच्छाग्रह का संकल्प लेने चलो चम्पारण

डॉ मुज़फ्फर हुसैन गज़ाली

Ashraf Ali Bastavi

केंद्र सरकार चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह को सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह के रूप में मना रही है I देशभर से हजारों स्वच्छाग्रहियों को चंपारण में एकत्र करने की योजना है ताकि गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन की तर्ज पर स्वच्छाग्रह का अभियान देशभर में चलाया जा सके। शताब्दी समारोह की शुरुआत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर एक साल पहले हुई थी I चम्पारण के लोगों की दुर्दशा देख कर गाँधी जी बहुत व्याकुल हुए उन्होंने सत्याग्रह समाप्त होने पर यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और स्वच्छता का काम शुरू किया I इस कार्य में गुजरात, महाराष्ट्र के समाज सेवियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया I शायद इस घटना से प्रेरित हो कर ही सरकार ने शताब्दी समारोह के समापन पर ” सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह ” कार्यक्रम का आयोजन किया है I इस अवसर पर 10 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के चम्पारण से ” खुले में शौच से मुक्ति ” के लिए काम करने वाले चार लाख ” स्वच्छाग्रही ” कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया I इनमें से 20 हज़ार ” स्वच्छाग्रही ” कार्यक्रम में मौजूद रहे जबकि अन्य देश के विभिन्न भागों से इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के द्वारा जुड़े I कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए खिलाडी, फ़िल्मी सितारों और समाजी हस्तियों ने टी वी पर चम्पारण चलो का नारा दिया था I

पेयजल एवं स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर ने मीडिया से बात करते हुए कहा ‘ स्वच्छ भारत अभियान ‘ की शरुआत के समय अक्टूबर 2014 में ग्रामीण भारत में खुले में शौच करने वालों की संख्या 55 करोड़ थी जो मार्च 2018 में घट कर 25 करोड़ रह गई है I इस दौरान स्वच्छता का दायरा 38.7 प्रतिशत से बढ़ कर 80 .53 प्रतिशत पर पहुंच चुका है I इस ने जन आंदोलन का रूप ले लिया है I उन्होंने बताया, 26 मार्च 2018 तक देश के 3 .38 लाख गांव, 338 जिले, 12 राज्य और तीन केंद्रशासित प्रदेश खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं I एक आज़ाद सर्वे एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि 6000 से अधिक गांव के 90000 परिवार ग्रामीण शौचालय का उपयोग कर रहे हैं I रिपोर्ट के मुताबिक शौचालय का कवरेज 77 प्रतिशत और उनका उपयोग 93 .4 प्रतिशत है I इस प्रगति को देखते हुए माना जा रहा है कि देश 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से शत-प्रतिशत मुक्ति का लक्ष्य हासिल कर लेगा I

बिहार को खुले में शौच मुक्त करने के लिए 3 अप्रैल से 9 अप्रैल तक बिहार के दस हजार और अन्य राज्यों के दस हजार स्वच्छाग्रहियों ने बिहार के लोगों को घरों में शौचालय बनाने के लिए प्रेरित किया I उन्होंने राज्य के सभी 38 जिलों के लोगों का व्यवहार बदलने तथा खुले में शौच से मुक्ति के अभियान से जोड़ने का प्रयत्न किया I अभी तक 4 .2 लाख लोग अपने को स्वच्छाग्रही के तौर पर पंजीकृत कर चुके हैं I खुले में शौच से मुक्ति अभियान का उद्देश्य है कि प्रत्येक गांव में एक स्वच्छाग्रही हो, इसके लिए मार्च 2019 तक 6 .5 लाख स्वच्छाग्रही को जोड़ा जायेगा I इस कार्यक्रम के विशेष अधिकारी अक्षय राउत ने बताया हर जिले, हर गांव में यह देखा जाता है कि कौन सी बात लोगों कि भावनाओं को छूती है और उन्हें शौचालय इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करती है I कोई शर्म से, कोई स्वास्थ्य के लिए, कोई सुरक्षा के लिए, कोई पैसे के लालच में तो कोई सामाजिक प्रतिष्ठा कि खातिर भी इस अभियान से जुड़ता है और अपने घर शौचालय का निर्माण करता है I

चम्पारण बिहार राज्य का पिछड़ा क्षेत्र है I ज़माने तक जब शाम के धुंधलके में कोई बस यहाँ से गुजरती तो सड़क के किनारे गार्ड ऑफ़ आनर में महिलाएं खड़ी हो जाती थीं I सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह कार्यक्रम के मद्दे नज़र शासन ने शौचालय बनवाने पर विशेष ध्यान दिया है I शासन कि ओर से 4 अप्रैल को बताया गया , 39 प्रतिशत शौचालय अब तक जिले में बन गए हैं I दस तारिख को पी एम मोदी मोतिहारी पहुंचेंगे तब तक पूर्वी चम्पारण में 50 प्रतिशत शौचालय तैयार मिलेंगे, यानि पांच दिन में ग्यारह फीसदी शौचालय चम्पारण में बन जायेंगे I शासन यदि इस गति से कार्य करे तो ग्रामीण भारत 2019 से पहले ही खुले में शौच से मुक्त हो जायेगा, परन्तु किया चम्पारण में यह संभव है जहाँ 60 फीसद से अधिक आबादी भूमि हीन है I यहाँ नौ शुगर मिल है भूमि के बड़े भाग पर उनका कब्ज़ा है I भूमि हीनों को शौचालय बनाने के लिए क्या शासन जमीन उपलब्ध कराएगा ? शौचालय बनाने के लिए वित्तीय सहायता न मिलने पर बने हुए शौचलय तोड़े जाने के समाचार भी बिहार से मिलते रहे हैं I इस पर गंभीरता से ध्यान देने कि जरुरत है I

खुले में शौच की जड़ भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारम्परिक प्रथाओं में निहित है I जहाँ बच्चे के मल को हानिरहित माना जाता है, यह विश्वाश दीर्घ काल से व्यवहार का हिस्सा बना हुआ है I लोग खुले मैदान, जंगल, बहते पानी या तालाब के किनारे और झाड़ियों के आस पास शौच करते हैं शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते I खुले में शौच का मुख्य कारण गरीबी और असमानता है, खुले में शौच करने वालों में अधिकांश का सम्बन्ध इन्तेहाई गरीब, कमजोर और हाशिये पर धकेले हुए समुदाय से होता है, विशेष रूप से बच्चों का I यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार खुले में शौच करने वाले समुदायों में हर वर्ष 26 मिलियन बच्चे पैदा होते हैं I खुले में शौच बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है, डायरिया, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस, पोलियो, कीड़ों का संक्रमण और पोषण की कमी इसी के कारण होती है I एक ग्राम मनुष्य के मल में 10 मिलियन वायरस, एक मिलियन बेक्टेरिया पैरासाइट और उनके अंडे होते हैं I केवल डायरिया से भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 117000 बच्चे हर वर्ष मर जाते हैं जो वैश्विक बर्डन का 22 प्रतिशत है I

कुपोषण का भी खुले में शौच से सीधा सम्बन्ध है I बच्चों के साथ महिलाएं इस से सब से अधिक प्रभावित होती हैं I देश में बड़ी तादाद में गर्भवती महिलाएं और नई माताओं की निवारण करने योग्‍य रोगों से ग्रस्त हो कर मृत्यु हो जाती है I इन में नकसीर, गर्भपात, सेप्सिस- रक्त का थक्का बनना, खून तथा पोषण की कमी और अनुचित स्वच्छता शामिल है I महिलाओं की सुरक्षा भी इस से खतरे में पड़ती है उन्हें शौच के लिए अँधेरा होने का इंतज़ार करना पड़ता है I दिन के समय वह बाहर नहीं जा सकतीं इस लिए पानी कम पीती हैं जिस से खून की कमी हो जाती है जो शिशु की पैदाइश के समय मौत का कारण बनती है I अँधेरे में सांप और जंगली जानवरों के अतिरिक्त शारीरिक तथा यौन हमलों का खतरा रहता है I अधिकांश बलात्कारी अँधेरे का फ़ायदा उठा कर महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं I शौचालय के उपयोग से महिलाओं एवं बच्चों को इन खतरों से बचाया जा सकता है I

देश को खुले में शौच से मुक्त कराने का कदम सराहनीये है किन्तु व्यवहार को बदले तथा सभी समुदायों को साथ लेकर समाजी आंदोलन बनाये बग़ैर इसमें सफलता नहीं मिल सकती I इसके लिए जरुरी है की ऐसा माहौल बनाया जाये कि आम आदमी शौचालय बनाने और उसके उपयोग को लाज़मी समझे, जिन के पास भूमि नहीं है उनके लिए सरकार सामुदायिक शौचालय कि व्यवस्था करे, उसकी साफ सफाई का उचित इंतेज़ाम किया जाये I बच्चों, लड़कियों, महिलाओं, सामुदायिक संगठनों और समाज सेवियों को इस अभियान में सहभागी बनाया जाये I राजनेताों का फोटो खिंचवाने के बजाए संसाधन उपलब्ध कराने पर बल हो I पारम्परिक प्रथाएं समाज की बनाई हुई है वही अपनी इच्छा शक्ति से इन्हे बदल सकता है I यह कम आज से शुरू हो सकता है क्या आप इसके लिए तैयार हैं I

 

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