क्या आपकी ज़कात कुरान में दर्ज सभी 8 कामों पर ख़र्च होती है ?

इस्लाम ने मुसलमानों  को ज़कात का प्रबंध  क्यों दिया  था ? उस का जवाब तलाश कीजीए , असल कामयाबी तो तभी है जब आज का ज़कात लेने वाला कल ज़कात देने वाला बन जाये।

Asia Times Desk

अशरफ  अली बस्तवी , नई दिल्ली

अगर कोई आपसे ये पूछे कि इस साल आपने कितने क़र्ज़दारों की आर्थिक मदद की है , कितने बेक़सूर कैदियों को छुड़ाने में अपना माल ख़र्च किया और कितने मुसाफ़िरों की मदद की तो शायद ये जवाब आपके लिए मुश्किल हो लेकिन अगर कोई ये पूछे कि इस साल रमज़ान में कितने मदरसों  को अपनी ज़कात की रक़म दी तो आप रसीदों का बंडल सामने कर देंगे आपका जवाब होगा कि हमारे पास जो आया हमने उसे दिया .

लेकिन आपका ये जवाब शायद अधूरा  है ,इस से आप अपनी  जिम्मेदार्रियों  से बच नहीं सकते ज़रा गौर कीजीए जिस समाज  में ज़कात का प्रबंध  हो उस समाज  का नौजवान  बंगलोर का  निसारुद्दीन   23 वर्ष तक जेल में पड़ा रहता है इस बीच  उस का घर-बार तबाह हो जाता है उसका  बच्चा गरीबी  की वजह से तालीम हासिल नहीं कर सका .

उसकी पुश्तैनी  जायदाद मुक़द्दमे की भेंट चढ़  गई बल्कि उसके पिता को अपने  घर की  आधी ज़मीन को भी  बेचना पड़ा । भला बताएं जिस आबादी में निसार का परिवार  आबाद था क्या इस आबादी में ज़कात देने वाले नहीं थे ,आख़िर क्या वजह रही कि किसी ने भी इस ओर ध्यान   नहीं दिया ?

 निसारुद्दीन  की तबाही की  ये भयानक  घटना  हमारी प्राथमिकता को भी ज़ाहिर करती  है। हर साल करोड़ों की ज़कात निकालने वाली मुस्लिम आबादी  की बेचारगी  का ये आलम कि कर्ज में डूबे  एक पिता  की   बेटी  बिन ब्याही बैठी रह जाये .

जबकि हम हर साल करोड़ों की रक़म ज़कात के तौर पर निकालते हैं,  ज़कात के  प्रबंधन की बातें भी हम ख़ूब करते हैं , अपनी  जनसभाओं जुमे के खुत्बों और लेखों में बार बार ये दुहराते हैं कि अगर भारत के मुसलमान अपने ज़कात का प्रबंधन  दरुस्त कर लें तो मुस्लमानों की  बड़ी समस्याएँ हल  हो जाएं गी ।

अगर ज़कात निकालने वाले पहले अपने  आस-पास देख लें ऐसे लोग  ज़रूर मिल जायेंगे जो ज़कात के हक़दार हैं  उनको अपनी ज़कात दें  तो समाज के हालात तबदील होने लग जाऐंगे , लेकिन देखा ये जाता है कि उतर प्रदेश के किसी गांव  का रहने वाला  जो  मुंबई या और किसी बड़े शहर में कारोबार करता है  उसकी ज़कात ओडिशा  के किसी  मदरसे  के लिए जाती है जबकि उस के अपने गांव में और रिश्तेदारों में ज़कात के हकदार गरीबों की लंबी फ़हरिस्त है।

क्या कभी आपने ग़ौर किया कि किन किन कामों पर ज़कात ख़र्च की जानी चाहिए ? नहीं ना ! आपके  यही ढुलमुल  रवैय्या की वजह से सैकड़ों लोग करोड़ों की ज़कात निकालने के बावजूद  रह जाते हैं। प्लीज  इस बार अपनी सूची में कैदियों  ,क़र्ज़दारों और मुसाफ़िरों का हिस्सा भी शामिल कर लें .

कुरान में दर्ज ज़कात के अन्य सभी 8 कामों  पर ख़र्च करने की योजना  बनाएँ। हर साल की तरह इस साल भी पहले रमज़ान से ही ज़कात वसूल करने वाले  हाथों में रसीद और मदरसे की अंडर कंस्ट्रक्शन इमारत  की तस्वीर लिए आपके दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होंगे ।

ज़कात वसूल करने वाले अधिकांश लोग  मदारिस से होते  है, जो सलाम- दुआ   के बाद मदरसे की इनकम और ख़र्च का सालाना व्योरा आपके सामने पेश करते हैं ,उनकी कोशिश  आपको ये यकीन दिलाने की होती है कि मदरसे  का बजट वर्षों से लगातार घाटे  में है , मदरसे के एक  सेक्शन  की इमारत ना-मुकम्मल है आपकी तवज्जो दरकार है।

इस बार जब वह मदरसे का बजट पेश करें तो आप उनसे ये ज़रूर पूछें कि जिन बच्चों की तालीम और देखभाल आपका मदरसा  कर रहा है उनकी तालीम और खान पान,  रख रखाव  पर क्या  ख़र्च किया जा रहा है ?

आपके यहां तालीम की गुण्वत्ता क्या है ? टीचर्स की ट्रेनिंग  और उनकी कैपेसिटी बिल्डिंग का क्या प्रबंध  हैं ? यही  उम्मीद है कि वे  इन तमाम सवालों के जवाब से गुरेज़ करेंगे , उनमें कितने जाली रसीद लिए फिर रहे होंगे उनकी पहचान  कैसे करेंगे ?

कुछ मदरसों  ने तो मोटे कमीशन पर  सफ़ीर ( ज़कात वसूल करने वाला स्टाफ ) रख लिया है  जो पच्चास फ़ीसद  लेकर काम करते  हैं। यानी आपकी ज़कात का बड़ा हिस्सा कमीशन  में चला जाता है ,यह  भी एक काबिले गौर पहलू है और अब तो  मदारिस में टीचर्स  की बहाली  का पैमाना भी  बदल गया है ।

 टीचर्स  की बहाली  करते वक़्त  मैनेजमेंट अब यह  नहीं पूछता कि आपकी की किस सब्जेक्ट पर पकड़  है , आपकी दिचास्पी क्या है। बल्कि  पहला सवाल यह  होता है कि आप साल में चंदा कितना लाएँगे ? कुछ  छोटे मदरसों में एक शर्त ये भी होती है कि हॉस्टल में रह कर पढ़ने वाले बच्चे कितने लाएँगे। यह कोई इल्ज़ाम नहीं बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है आप भी अपने आस-पास देख सकते हैं कभी कभी निकल कर जायज़ा लें।

रुकिए गौर कीजिये , इस्लाम ने मुसलमानों  को ज़कात का प्रबंध  क्यों दिया  था ? उस का जवाब तलाश कीजीए , असल कामयाबी तो तभी है जब आज का ज़कात लेने वाला कल ज़कात देने वाला बन जाये।

आपको चाहिए कि इस बार सुनिष्चित करें   कि आपकी ज़कात हकदारों तक  पहूंचे और उन पर ख़र्च हो , आपका यह  कह कर ज़िम्मेदारी से अलग हो जाना कि हमने तो अपनी जानिब से अदा कर दी अब वो जानें जिन्हों ने वसूल किया है, इस से करप्शन  को बढ़ावा  मिलता है जाली ज़कात वसूल करने वालों की हौसला-अफ़ज़ाई होती है और हक़दार महरूम रह जाते हैं , यह  दरुस्त नहीं है।

क़ुरआन मजीद  के हुक्म के मुताबिक़ 8 कामों पर  ज़कात खर्च की जाये हैं

.1 फ़क़ीर 2मिस्कीन 3आमिलीन ज़कात (ज़कात का  इंतज़ाम सँभालने वाले 4 तालीफ़ क़लब  5 गर्दनों के छुड़ाने के लिए (बेक़सूर मुस्लमान कैदियों ) 6 क़र्ज़दारों की मदद 7 दावत और जिहाद फ़ीस्बीलिल्लाह  8 मुसाफ़िर।

अब आप यहां रुक कर एक लम्हे के लिए सोचें अपना जायज़ा लें आप अपनी ज़कात ऊपर दर्ज किन किन कामों  में ख़र्च करते हैं ? आप जिस जगह रहते हैं अपने आस-पास आपके रिश्तेदार  सर्किल में भी ऐसे गरीब  ज़रूरतमंद ज़रूर होंगे जो आपकी ज़कात के ज़्यादा हक़दार हैं .

इस बार ज़रा अपनी लिस्ट में तरमीम कर के देखें , काफ़ी लोगों का भला हो जाएगा। अक्सर देखने में ये आया है कि जो हर साल लाखों रुपय ज़कात निकालता है वही जब अपने समाज  में किसी ज़रूरतमंद रिश्तेदार या पड़ोसी को क़र्ज़ देता है , तो यहां नीयत ग़रीब की मदद नहीं होती बल्कि उनकी निगाह उस सूदी  कारोबार करने वाले साहूकार की सी होती है जो क़र्ज़ के बदले ग़रीब की किसी ज़मीन  को हड़पने की मंसूबा बंदी किए रहता है।

अफ़सोस कि यही नीयत आज एक मुस्लमान की भी होती है ताकि एक दिन क़र्ज़ की अदायगी ना कर पाने की  सूरत में वह  उसे अपने नाम कर ले। ऐसी मदद जो किसी को बेघर कर दे भला किस काम की। हमें अपनी ज़कात की अदायगी के वक़्त ये बात अच्छी तरह ध्यान में रखनी चाहिए कि क्या उस की ज़कात उन कामों  में ख़र्च हो रही है जिसका हुक्म क़िरान में दिया गया है। हमें और आपको ये जायज़ा लेना होगा और फ़िक्र करनी होगी की ज़कात की तक़सीम का निज़ाम  कैसे दरुस्त हो।

फ़ोन : 9891568632

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