कैसे संभले डिजिटल दुनिया

रिपोर्ट प्रस्तुति: महबूब ख़ान

एशिया टाइम्स

इसमें तो ज़रा भी शक़ नहीं है कि इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने इंसानों के जीने का तरीक़ा बिल्कुल बदलकर रख दिया है.

या यूँ कहें कि डिजिटल युग ने ना सिर्फ़ मानवीय व्यवहार बल्कि जीने के सिद्धान्तों में ही उलटफेर कर दी है.

एक तरफ़ जहां डिजिटल तकनीक से ज़िन्दगी आसान हुई है वहीं इसने तरह-तरह की मुश्किलें भी खड़ी कर दी हैं.

कुछ ऐसी ही चुनौतियों पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र 18 दिसम्बर से ख़ास सम्मेलन आयोजित कर रहा है.

इस सम्मेलन साइबर सिक्योरिटी, इंटरनेट और मानवाधिकार के आपसी सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा.

इस सम्मेलन का नाम है – Twelfth Internet Governance Forum (IGF). सम्मेलन का मुख्य विषय है – डिजिटल दुनिया का बढ़ता दायरा और इसका प्रबन्धन कैसे किया जाए.

ये सम्मेलन ऐसे वक़्त हो रहा है जब पूरी दुनिया में इंटरनेट रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का अटूट हिस्सा बनता जा रहा है.

आयोजकों का कहना है कि इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने एक तरफ़ तो ज़िन्दगी को आसान बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ इसकी वजह से रोज़मर्रा के जीवन में बहुत सी बाधाएँ भी आने लगी हैं.

एक तरफ़ जहाँ इंटरनेट की वजह से प्रगति और ख़ुशहाली की असीम सम्भावनाएँ नज़र आती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसकी वजह से बहुत सी समस्याएँ भी दरपेश हैं.

“मक़सद होगा कि तकनीक कोई लक्ष्य या मंज़िल ना होकर, ये लोगों की प्रगति का एक साधन बन सके. इसके लिए ज़रूरी है कि सभी लोगों को किसी भेदभाव के बिना तकनीक इस्तेमाल करने के बराबर मौक़े मिलने चाहिए. चाहे उन लोगों के हालात और ज़रूरतें कैसी भी हों, तकनीक के ज़रिए उन्हें भी अपनी तरक़्क़ी करने के भरपूर मौक़े मिलने चाहिए.”

मई 2017 में WannaCry नामक ransomware ने 150 देशों में दो लाख से भी ज़्यादा कम्प्यूटरों को निशाना बनाया था.

और इस सॉफ़्टवेयर वायरस की वजह से ना सिर्फ़ निजी कम्प्यूटर ठप हो गए थे बल्कि ब्रिटेन में तो एक अस्पताल में ज़रूरी ऑपरेशन तक रद्द करने पड़े थे.

क्योंकि इस कम्प्यूटर वायरस ने अस्पताल के डिजिटल सर्वर को ही ठप कर दिया था.

इससे साफ़ संकेत मिलता है कि इंटरनेट किस तरह से रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर बुरे असर डाल सकता है.

जिनेवा में हो रहे इस Internet Governance Forum में सारी चर्चा इसी मुद्दे पर केन्द्रित रहेगी कि 21वीं सदी में डिजिटल दुनिया को किस तरह संभाला जाए. इस फ़ोरम में अनेक देशों से क़रीब 2000 प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

तकनीक मंज़िल नहीं, साधन और रास्ता है

इनमें सरकारों, सिविल सोसायटी, शिक्षाविद और उद्योगों से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ-साथ सिलिकॉन वेली के विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं.

स्विट्ज़रलैंड के राजदूत थॉमस शिनीडियर का कहना था कि खुले रूप में तमाम मुद्दों पर चर्चा कराना इस फ़ोरम की मुख्य विशेषता है, “21वीं शताब्दी में डिजिटल नीति बनाने पर चर्चा किसी एक संगठन या संस्थान द्वारा नियंत्रित ना होकर, मुक्त रूप से होनी चाहिए.”

“ये बहुत ज़रूरी है कि डिजिटल दुनिया के अहम खिलाड़ी और विशेषज्ञ इस नीति पर खुले रूप में चर्चा करके किसी ठोस नतीजे पर पहुँच सकें.”

उनका ये भी कहना था कि “मक़सद होगा कि तकनीक कोई लक्ष्य या मंज़िल ना होकर, ये लोगों की प्रगति का एक साधन बन सके. इसके लिए ज़रूरी है कि सभी लोगों को किसी भेदभाव के बिना तकनीक इस्तेमाल करने के बराबर मौक़े मिलने चाहिए. चाहे उन लोगों के हालात और ज़रूरतें कैसी भी हों, तकनीक के ज़रिए उन्हें भी अपनी तरक़्क़ी करने के भरपूर मौक़े मिलने चाहिए.”

इस फ़ोरम में साइबर सुरक्षा के अलावा कुछ और भी महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल होंगे.

इनमें प्रमुख हैं – Artificial Intelligence, Virtual Reality, and Fake News.

ख़ासतौर से इन सबका असर लोकतंत्र और नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं पर क्या होता है, ये मुद्दे भी चर्चा का विषय रहेंगे.

Internet Governance Forum का मक़सद कोई वादे या संकल्प करना नहीं है.

लेकिन फिर भी आयोजकों का कहना है कि इस फ़ोरम की अहमियत इसी बात में है कि इस मंच पर बिल्कुल बेबाकी से चर्चा होगी.

बेबाक चर्चा से सरकारी और निजी क्षेत्र में ज़्यादा ठोस और असरदार नीतियाँ बनाने के लिए ज़मीन तैयार होती है.

साभार : संयुक्त राष्ट्रसंघ

 

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