…………और मेरी माँ भी एक तारा बन गईं

तारिक हुसैन रिज़वी

Asia Times Desk

दस साल की नाज़ुक उम्र किसी भी बच्चे के लिए लड़कपन की उम्र होती है, उस उम्र में भले, बुरे, दुख सुख का ज़्यादा एहसास नहीं होता। लेकिन एक अजीब सी बेचैनी होती है, जब कोई अपना, अपने पास नहीं होता। मैं भी बचपन में दस साल की उम्र में जब बेचैन हो हो कर अपनी माँ से अब्बू के बारे में सवाल पूछा करता तो उन की बड़ी बड़ी गहरी आंखों के दायरे आंसुओं से भीग जाते, और वह भर्राई आवाज़ में जवाब देती कि बेटा आप के अब्बू को अल्लाह बहुत पसंद करता था, इसलिए अल्लाह ने आपके अब्बू को ऊपर आसमान में अपने पास बुला लिया।

अब हम उन से मिल तो नही सकते लेकिन आसमान में चमकते तारे की शक्ल में देख सकते हैं। जब मैं बड़ा हुआ तो इस बात का एहसास हुआ कि माँ ने मेरे वालिद के लिए कभी भी इन्तिक़ाल का नाम इसलिए नहीं लिया कि कँही मुझे उन की कमी महसूस ना हो। और मैं यही सोचता रहा कि मेरे अब्बू एक सितारा बन गए हैं, जो हर रात हम को देखते हैं, हम से बातें करते हैं।

मेरी माँ का नाम आफ़ीफ़ा खातून है, और नाम की पाकीज़गी की ही तरह उन की ज़िन्दिगी हमेशा पाक शफ़्फ़ाफ़, परहेज़गार, नमाज़ रोज़े की पाबंद , खुदा से डरने वाली, दूसरों की मददगार, और खुद ग़मांे को पी कर दूसरों पर खुशी लुटाने वाली रहीं। मैं पाँच बहनों के बीच अकेला भाई था, इसलिए मैं बहनों के बीच तो प्यारा था ही, माँ की आंखों का खास तारा और उस का राज दुलारा भी था।

चूंकि मेरी माँ के रिश्तेदार, नातेदार जज, डॉक्टर जैसे ओहदों पर फायज़ हुआ करते थे, तो उन के पेशे की नफ़ासत मेरी मां की तरबियत में साफ झलकती थी। सब को सब्र और तहम्मुल का सबक़ सिखाने वाली यह बहादुर माँ सन 2017 में उस वक़्त कमज़ोर हो गई, जिस वक़्त पता चला कि उन की बाईं किडनी में तीन किलो का ट्यूमर है।

एम्स में उस ट्यूमर को आपरेशन कर के निकाला गया। तब से अब तक उन की सेहत ने पूरी तरह उन का साथ नहीं दिया। पिछले चार महीनों से वोह लंग्स इन्फेक्शन से पीड़ित थीं। साथ ही में लीवर भी ढंग से काम नहीं कर रहा था। पैरों में दर्द रहता था। इस बार ना ही एम्स के इलाज से फ़र्क़ पड़ा, और नाही अल्शिफ़ा से उन्हें शिफ़ा मिल सकी । 14 अप्रैल 2019 की रात घर पर सब की मौजूदगी में उन की साँसों ने भी उन का साथ छोड़ दिया।

’इस तरह मेरी माँ भी एक तारा बन गईं।’ 74 साल की ज़िन्दिगी एक पल में ख़्वाब बन कर रह गई। 15 अप्रैल 2019 की शाम 6 बजे आपकी तदफीन अबुल फ़ज़ल के क़ब्रिस्तान में कर दी गई। सुपर्द ए ख़ाक होने के बावजूद भी उन का वजूद आज भी आस-पास ही मौजूद लगता है। रात को एक उम्मीद के साथ आँखे खुद ब खुद आसमान की तरफ़ टिमटिमाते तारों के दरमियान माँ की तलाश में ऊपर की तरफ़ उठ जाती हैं।

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