बाबरी मजिस्द विवाद मामला: सुप्रीम कोर्ट में मामले की डे टू डे सुनवाई शुरू हुई, लाइव स्ट्रिमिंग की मांग खारिज

Awais Ahmad

बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज से डे टू डे सुनवाई शुरू हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने आज मामले की लाइव स्ट्रिमिंग की मांग खारिज कर दी। निर्मोही अखाड़ा ने रामजन्म भूमि विवाद मामले में जिरह की शुरुआत की। निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट से मांग किया कि मामले मे नियुक्त कोर्ट रिसीवर को हटा दिया जाए और विवादित जमीन की देखभाल और इसकी कस्टडी का जिम्मा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में आज चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की संविधान पीठ के समक्ष के एन गोविंदाचार्य की ओर से वकील वान्या गुप्ता ने अयोध्या मामले की सुनवाई की ऑडियो रिकॉर्डिंग या फिर संसद की तर्ज पर लिखित ट्रांसक्रिप्ट तैयार कराने की मांग की। जिसको मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्वीकार करने से फिलहाल इंकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि पहले मामले की सुनवाई शुरू होने दे।

निर्मोही अखाड़ा की तरफ से वकील सुशील कुमार जैन ने मामले में जिरह किया। निर्मोही अखाड़ा का पक्ष रखते हुए सुशील जैन ने कहा कि मेरा किसे दरअसल उन जमीन के टुकड़ों के लिए है जो अदालत के नियंत्रण में है। बरसों से इस ज़मीन और राम जन्मस्थान पर निर्मोही अखाड़े के अधिकार है।

निर्मोही अखाड़े की ओर से सुशील जैन पक्ष रखते हुए कहा कि मेरा सूट दरअसल विवादित परिसर के अंदरूनी हिस्से को लेकर है,जिस पर पहले हमारा कब्ज़ा था। जिस पर हमारा 100 साल से कब्ज़ा था
बाद में दूसरे ने बलपूर्वक कब्ज़े में ले लिया।

सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि विवादित परिसर के अंदरूनी हिस्से पर पहले हमारा कब्ज़ा था, जिसे दूसरे ने बलपूर्वक कब्ज़े में ले लिया, बाहरी पर पहले विवाद नहीं था, 1961 से विवाद शुरू हुआ।

सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि मेरी मांग केवल विवादित जमीन के आंतरिक हिस्से को लेकर है, जिसमे सीता रसोई और भंडार गृह भी शामिल है। ये सभी हमारे कब्जे में रहे हैं। वहां पर उन्होंने हिंदुओं को पूजा पाठ की अनुमति दे रखी है। दिसंबर 1992 के बाद उक्त जगह पर उत्पातियों ने निर्मोही अखाड़ा का मंदिर भी तोड़ दिया था।

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मस्ज़िद को पुराने रिकॉर्ड में मस्ज़िद ए जन्मस्थान लिखा गया है, बाहर निर्मोही साधु पूजा करवाते रहे, हिन्दू बड़ी संख्या में पूजा करने और प्रसाद चढ़ाने आया करते थे, निर्मोही के संचालन में कई पुराने मंदिर, झांसी की रानी ने भी हमारे एक मंदिर में प्राण त्यागे थे।

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट से मांग किया कि इस मसले मे नियुक्त कोर्ट रिसीवर को हटा दिया जाए और विवादित जमीन की देखभाल और इसकी कस्टडी का जिम्मा अखाड़े को दिया जाए।

निर्मोही अखाड़ा कोर्ट में कहा कि दिसंबर 1992 के बाद उक्त जगह पर उत्पातियों ने निर्मोही अखाड़ा का मंदिर भी तोड़ दिया था। निर्मोही अखाड़ा 19-3-1949 से रजिस्टर्ड है। झांसी की लड़ाई के बाद ‘झांसी की रानी’ की रक्षा ग्वालियर में निर्मोही अखाड़ा ने की थी।

सुनवाई के दौरान सुन्नी वख्फ़ बोर्ड के वकील की राजीव धवन को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बीच मे हस्तक्षेप करने पर फटकार लगाई । सुप्रीम कोर्ट ने राजीव धवन से कहा कि कोर्ट की मर्यादा बनाए रखिए। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि कोर्ट आपको भी सुनेगा।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने निर्मोही अखाड़े के वकील सुशील कुमार जैन से पूछा कि आप अभी अपीलकर्ता की हैसियत से जो बोल रहे हैं, वही बातें दूसरों की अपीलों पर अपना पक्ष रखने के दौरान कहेंगे?

निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील कुमार जैन ने जवाब दिया हां। सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि हम इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे है क्योंकि यह हमारी आस्था से जुड़ा मामला है।

निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट में दलील रखी कि वह जगह मस्जिद नही मानी जा सकती है जहाँ नमाज़ नही पढ़ी जाती है, हम 1934 से कह रहे है कि वहां पर कभी नमाज़ नही पढ़ी गई है। निर्मोही अखाड़ा ने पुराने फ़ैसलों का हवाला दिया जिनके मुताबिक किसी ऐसी जगह को मस्जिद करार नहीं दिया जा सकता, अगर वहां पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही हो। निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत कोई भी दूसरे की ज़मीन पर बिना इजाज़त मस्जिद नही बना सकता है

सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि 1934 में 5 वक्त की नमाज बंद हुई। हर शुक्रवार सिर्फ जुमे की नमाज होती रही, 16 दिसंबर 1949 के बाद से जुमे की नमाज़ भी बंद हो गई, विवादित स्थान पर वुज़ू की जगह भी मौजूद नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई में हमे जल्दी नही है, निर्मोही अखाड़ा से कहा कि वह अपनी पूरी दलील रखे।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा से पूछा कि 1949 में सरकार ने ज़मीन पर कब्ज़ा किया, निर्मोही अखाड़े ने 1959 में कोर्ट का रुख किया, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने 1961 में मुकदमा दायर किया, क्या ये सिविल केस में दावे के लिए मुकदमा दायर करने की समयसीमा का उल्लंघन नहीं करता?

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट को जवाब दिया कि ज़मीन पर हमारा दावा पुराना है, ऐतिहासिक है, 1934 से हमारा कब्जा है, समयसीमा का यहां उनकी ओर से उल्लघंन नहीं हुआ है।

निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील जैन ने दावा किया कि अखाड़ा मंदिर के प्रबंधक की हैसियत से विवादित ज़मीन पर अपना दावा कर रहा है,जबकि बाकी हिंदू पक्षकार सिर्फ पूजा के अधिकार का हवाला देकर दावा कर रहे है,1949 से वहाँ नमाज़ नहीं हुई, लिहाजा मुस्लिम पक्ष का कोई दावा नहीं बनता है। मामले में अब कल सुनवाई होगी और हिन्दू पक्षकार निर्मोही अखाड़ा अपनी दलील रखेगा।

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