दरभंगा एयरपोर्ट के टर्मिनल बिल्डिंग निविदा के खारिज होने की खबर

Manjit Thakur

Ashraf Ali Bastavi

दरभंगा एयरपोर्ट के टर्मिनल बिल्डिंग निविदा के खारिज होने की खबर आई है. एक सपना जो टूट गया. हमें लगा था कि शायद मिथिला को बदलने की कोशिशों में से एक पूरा हो जाएगा. काफी दिनों से हम सबने अपने तरीके से इसके लिए कोशिशें की थीं, कुछ ने विरोध भी किया था. उन्हें लगा था कि ट्रेन ज्यादा जरूरी है. मेरा बस यही कहना था कि ट्रेन और हवाई सेना दोनों होनी चाहिए. देश के बहुत सारे इलाके हैं जहां यह सब काम हो रहा. बस मिथिला में नहीं हो रहा. मेरे कुछ स्वजन टाइप मित्रों ने ट्वीटर पर मेरा मजाक उड़ाया. हमले (शाब्दिक) किए. कुछ ने तो मजाक में दरभंगा को अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कहना शुरू कर दिया. कुछ ने फोटो शॉप से टिकट तक बना दिए. मैं यह नहीं जानता कि यह योजना धरातल पर उतारने लायक थी या महज हमरा एक ख्याली पुलाव. लेकिन विरोध कर रहे मित्र संभवतया इस संभावित हवाई अड्डे के श्रेय को चिंतित थे. उनकी लड़ाई भी यही थी. लेकिन कुछ लोग, जिसमें मैं भी शामिल हूं, इसे लेकर संजीदा थे. मेरा कोई फायदा नहीं होना था, पर मुझे मिथिला में विकास की बायर की चिंता है. हर तरह से. लोग अपने घर में बैठकर विरोध और जुगाली करते रहे और दूसरे अगर इस मामले को उठाया तो उनका मजाक उड़ाया. जाहिर है, टेंडर कैंसल होने के बाद उनके बीच खुशी की लहर दौड़ गई होगी. आप खुश रहे, मिथिला ऐसे ही घिसटता रहेगा. आपको दूसरों के उपहास का मौका मिल गया है. 


पर मानिए, दरभंगा में किसी भी हालत में एयर इंक्लेव नहीं बन सकता है तो बेइज्जती का यह जूता आपको भी पड़ा है. चूंकि आप सत्यापित रूप से आत्मसम्मान से हीन हैं इसलिए जूते की चोट आपको महसूस नहीं होती है. यह स्थिति सिर्फ और सिर्फ मिथिला में देखने को मिलती है जहाँ पराभव को भी उत्सव और अपने स्वजनों को बेइज्जत करने के रूप में प्रयोग होता है. 


जब हमारी जयनगर रांची एक्सप्रेस बंद हुई थी उस समय हम लोगों ने तय कर लिया था कि सरकार की छाती पर चढ़कर ट्रेन वापस लेंगे। वह एक छोटा लेकिन सफल आंदोलन था क्योंकि हम सभी लोग एक साथ थे.


क्या गंगा के इस साइड के 6 करोड़ लोगों का वाज़िब हक़ नहीं है एयरपोर्ट ? क्या एयरपोर्ट के आने से मिथिला में निवेश-उद्योगों और नए मौकों का रास्ता नहीं खुलता ? क्या ये अत्यंत जरूरी नहीं था? 


ये समय ब्लेम, स्वीकारोक्ति, मज़ाक, तंज का नहीं है. ये वक्त है आगे आकर पूछने की सरकार से. ये वक्त है बताने का की एयरपोर्ट हमारा हक़ है और हम लेके रहेंगे. नेताओं ने हमें छला है ये तो तय हो ही गया है लेकिन हम पुनः लड़ेंगे नए सिरे से. ये वक्त है सरकार को एहसास करवाने का की हमें कारण नहीं पता, दिक्कतों से मतलब नहीं है, हमें बस मतलब है एयरपोर्ट से और वो आपको देना पड़ेगा किसी भी कीमत पर, अब आप चाहे जैसे करें.


आइए हम लड़ते हैं, खड़े होते हैं और सवाल करते हैं इस मनतोड़ सरकार से जिसने हमें मुंह चिढ़ाया है की जो भी कर लो हम वही करेंगे जो हमारा मन है. क्या आप साथ हैं? अबतक एहसास आपको हो गया होगा कि आपके बच्चे कमजोर नहीं हैं, वो लड़ और झुका सकते हैं आपको बस साथ देना होगा. आइए नए सिरे से शुरुआत करते हैं. आवाज इतना गगनभेदी हो की दिल्ली तक जय मिथिला सुनाई दे. आइए जागरण वाले मुद्दे की तरह पूरा मिथिला पुनः सब भेद भूलकर एक होते हैं, जीत हमारी होगी. जिन लोगों ने ट्विटर पर मेरा मजाक बनाया उनसे भी अपील, साथ आएं.

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