दलितों का इतना साहस : कमाल है!

दलित चाहें तो हमेशा के लिए भारत बंद करा सकते हैं, लेकिन अभी उन्हों ने सिर्फ एक दिन का भारत बंद किया है।

एशिया टाइम्स

चाय पे चर्चा: दलितों की अपनी सीमा है वह दुनिया बनाने के लिए तो ब्राह्मणों से पंगा लेने की हिम्मत कर सकते हैं, लेकिन उन्हें बैकुंठ यानी स्वर्ग जाने के लिए ब्राह्मणों का ही पैर पकड़ना होता है कि यही उनकी किस्मत में ब्रह्मा ने लिख दिया है , तभी तो वे सब बेचारे पैर से पैदा हुए और सिर से पैदा होने वालों के हमेशा के दास हो गए।

अच्छी बात यह है कि घीसू, माधव, होरी, फली, झकसा, झूरी के पास वर्षों के शोषण और दोहन के बाद मुंह में जीभ आई है। कहने लगे हैं कि मुसलमानों से लड़ाना है तो कहते हो हिन्दू हो और मंदिर जाना होता है तो कहते हो शूद्र हो, दलित हो।

अब ऐसे नहीं चलेगा, और ऐसा नहीं चलने देने के लिए उन्होंने भारत बंद करने की हिम्मत दिखाई और उन के इसी साहस ने सरकार को मजबूर किया कि वह सुप्रीम कोर्ट मे रिवीजन याचिका दायर करे कि अदालत ने उनके मामले को कमजोर कैसे कर दिया। भारत की अदालत भी अजीब खेल खेलती है, जब बेचारे दलितों पर अत्याचार बढ़ जाने का समय आया तभी उसने अधिनियम को अस्वीकार करने का फरमान जारी किया कि दलित को मारने पर ज़मानत हो जाएगी, मतलब अदालत यह मानती है कि इस अधिनियम में गलत मुकदमा खूब दायर किए जाते हैं। लेकिन अदालत ने शायद इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट नहीं पढ़ी जिस में डेटा के साथ व्याख्या की गई है कि दलितों के खिलाफ अत्याचार में लगभग दोगुना इजाफा हुआ है और दलित महिलाओं की स्थिति तो अभी भी दयनीय है।

अभी भी ठाकुरों के मोहल्ले से दलित की बारात नहीं गुज़रती और अभी भी मंदिरों की सीढ़ियों पर दलितों के पांव कांपते दिखाई देते हैं तो अदालत को क्यों लगा कि दलित अब सुरक्षित हो गए हैं।

लेकिन चौंकने वाली बात यह है कि जो दलित अभी तक ब्राह्मणों और ठाकुरों के दरवाजे लांघने की हिम्मत नहीं कर सका वह भारत बंद के दौरान हिंसा पर कैसे उतर आया। क्या वे वास्तव में अब मजबूत हो गए हैं या यह भी एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। अभी भी ठाकुरों के मोहल्ले से दलित की बारात नहीं गुज़रती और अभी भी मंदिरों की सीढ़ियों पर दलितों के पांव कांपते देखो। तो अदालत को क्यों लगा कि दलित अब सुरक्षित हो गए हैं। बिना किसी मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के पूरे भारत में नीला झंडा लहराते दलितों का जनसमूह सड़कों पर दिखाई दे ऐसा तो भारत ने शायद पहली बार ही देखा होगा।

दलित मजबूत हो गए, शंभू नाथ रीगर ने तो एक मुसलमान को इसी तरह काटा, जैसे उच्च जाती के लोग दलितों को काटते और मारते रहते हैं, तो जिस तरह उसकी हरकत को राजनीति से जोड़कर देखा गया, उसी तरह इस जुलूस को भी राजनीति से जोड़ कर देखना चाहिए कि कहीं यह विपक्ष की आंख में धूल झोंकने के लिए आरएसएस और भाजपा की कोई चाल तो नहीं कि पहले एससी एसटी अधिनियम हिला दो फिर दलितों को सड़कों पर उतारो। फिर इसी अधिनियम को वापस लाओ और दलितों को शीशे में उतारो।

ऐसा इसलिए लगता है कि 2014 में जिस तरह भाजपा जीती है, वह बिना दलितों के समर्थन के संभव ही नहीं। तो दलितों ने पहले भाजपा की सरकार बनाई और अब सारे दलितों ने इसी सरकार के खिलाफ मोर्चा निकाला।

किसी ने सच ही कहा कि अगर दलितों को इतनी बड़ी परेशानी पैदा हो गई है तो संसद में बैठे सभी दलित सांसदों को इस्तीफा दे देना चाहिए , यह सरकार ही गिर जाएगी, सड़कों पर निकल कर क्या होगा।

वैसे भारतीय समाज में दलित का महत्व कच्चे माल की तरह है। एक अच्छा उद्योग घराना इससे अपने मन के मुताबिक़ उत्पाद तैयार कर लेता है। इसकी वजह यह है कि दलित कभी दलित का नहीं हुआ। अब देखिए जिस आरक्षण के लिए राजनीति की जाती है। ज़रा सोचीए उस आरक्षण ने दलितों को क्या दिया है। जो दलित डी एम और ऐस पी बन जाता है क्या वह अपनी जाति के लिए कोई काम करता है। क्या वे अपने गांव वालों की मदद करता है। वह सिर्फ इतनाn करता है कि अपने बच्चों को डी एम और ऐस पी बनाता है। होना तो यही चाहिए था कि जिसे एक बार आरक्षण का लाभ मिल गया उसके घर वालों को आरक्षण से मुक्त कर देना चाहिए ताकि अन्य दलितों को इसका अधिकार मिल सके।
गौर कीजिए तो अम्बेडकर ने दलितों को आरक्षण दिया और खुद हिंदू धर्म छोड़कर चले गए। समय समय पर कई दलित नेताओं ने हिंदू धर्म को त्याग दिया, उदित राज ने भी हजारों दलितों के साथ बौद्ध मत अपनाया, लेकिन क्या यह कोई समाधान है। जिसके पास थोड़ी सी शक्ति है वह अपने समुदाय को ही छोड़ कर चला जाता है। होना तो यही चाहिए कि वे इसी समुदाय में रहकर अपने समाज के लिए लड़ाई लाडे , लेकिन ऐसा होता नहीं है। रामविलास पासवान और प्रकाश अंबेडकर का संघर्ष साफ दिखा रहा था कि दलितों के विकास से पहले वह अपना राजनीतिक हित देख रहे थे।

गंभीरता से अगर दलितों को अपनी लड़ाई लड़नी है तो लिंगायत की तरह वह हिंदू समाज का साथ छोड़ दें। लिंगायत ने अदालत में भी अपनी लड़ाई लड़ी। नतीजा यह हुआ कि 7 करोड़ लिंगायत हिंदू धर्म से अलग हो गए। यानी उन्होंने बिना खून बहाए हिंदुओं की 7 करोड़ आबादी कम कर दी। अगर यही चाल दलित चलें तो हिंदुओं के सवर्ण होने का भरम स्वतः मुंह के बल गिरेगा। ब्राह्मण और ठाकुर भारत में अल्पसंख्यक हो जाएंगे और अपने लिए आरक्षण की भीख मांगेंगे।

यह अभी तक समझ में नहीं आया कि दलित हिंदू समाज को क्यों पकड़े हुए है। न ही उनका कोई भगवान है और न ही उनके लिए कोई मंदिर है। तो केवल मनःस्थिति को सांत्वना देने के लिए कि जब तक वह ब्राह्मणों का मुफ्त सेवक नहीं बनेंगे बैकुंठ नहीं जाएंगे। क्या दलित के डीएम भी यही मानते हैं।

लोग कह रहे थे कि दलितों की तर्ज पर मुसलमानों को भी अपनी सुरक्षा के लिए भारत बंद करना चाहिए और एकता का प्रदर्शन करना चाहिए तो एक वीडियो देखा जिसमें हाफिज सिबघत उल्लाह अपनी अंतिम यात्रा पर रवाना हुआ और लोगों की भीड़ उसे कब्रिस्तान तक पहुंचाने के लिए निकल पड़ा, सही तो कहते हैं कि मुसलमान एक साथ तभी निकलते हैं जब किसी मुस्लमान का जनाज़ा उन के कन्धों पर होता है।

लेखक: जैन शम्सी (सीनियर पत्रकार, Consulting Editor Asia Times)

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