सर सैयद अहमद खान पर लगे जातिवाद के आरोपों का मुंह तोड़ जवाब

Sarfraz Katihari

Asia Times Desk

मसूद आलम फलाही साहब, विभागाध्यक्ष डिपार्टमेंट ऑफ़ अरेबिक, ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती उर्दू,अरबी-फरसी यूनिवर्सिटी लखनऊ, आप इतनी इंटेलेक्चुअल बेईमानी कहाँ से लाते हैं? हाँ, बेईमानी के पहले इंटेलेक्चुअल शब्द को पढना नहीं भूलिएगा। लगता है कि ये इंटेलेक्चुअल बेईमानी आपकी आदत में शामिल है जिसका सबूत The wire और The lallantop जैसी साइटों पर छपे आपके लेख हैं। इस पर आपके वीडिओज़ भी मौजूद हैं, इस आधार पर कह रहा हू। आपको अपने लिखे हुए लेख और विडियो के कॉन्टेंट तो याद ही होंगे।
जनाब, आपके आर्टिकल “सर सैयद अहमद खां : शेरवानी के अंदर जनेऊ” को पढ़ा जिसमें आपने सर सैयद पर ऐसा आरोप लगाया जोकि लोगों को बहुत आकर्षित करेगा, मसलन आपने आर्टिकल के शुरुवात में कहा है कि:
“जो निचली जाति के लोग हैं वो देश या सरकार के लिए लाभदायक नहीं हैं जबकि ऊंचे परिवार के लोग रईसों का सम्मान करते हैं साथ ही साथ अंग्रेज़ी समाज का सम्मान तथा अंग्रेज़ी सरकार के न्याय की छाप लोगों के दिलों पर जमाते हैं, वह देश और सरकार के लिए लाभदायक हैं. क्या तुमने देखा नहीं कि ग़दर (विद्रोह) में कैसी परिस्थितियां थीं? बहुत कठिन समय था. उनकी सेना बिगड़ गयी थी. कुछ बदमाश साथ हो गए थे और अंग्रेज़ भ्रम में थे, उन्होंने समझ लिया था कि जनता विद्रोही है…ऐ भाइयों! मेरे जिगर के टुकड़ों! ये हाल सरकार का और तुम्हारा है. तुम को सीधे ढंग से रहना चाहिए न इस प्रकार के कोलाहल से कि जैसे कौवे एकत्र हो गए हों! ऐ भाइयों! मैंने सरकार को ऐसे कड़े शब्दों में आरोप लगाया है किन्तु कभी समय आएगा कि हमारे भाई पठान, सादात, हाशमी और क़ुरैशी जिनके रक्त से इब्राहीम (अब्राहम) के खून की गंध आती है, वो कभी न कभी चमकीली वर्दियां पहने हुए कर्नल और मेजर बने हुए सेना में होंगे किन्तु उस समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए. सरकार अवश्य संज्ञान लेगी शर्त ये है कि तुम उस को संदेह मत होने दो… न्याय करो कि अंग्रेजों को शासन करते हुए कितने दिन हुए हैं? ग़दर के कितने दिन हुए? और वो दुःख जो अंग्रेजों को पहुंचा यद्यपि गंवारों से था, अमीरों से न था. इसको बतलाइए कि कितने दिन हुए?…मैं सत्य कहता हूं कि जो कार्य तुम को ऊंचे स्तर पर पहुंचाने वाला है, वह ऊंची शिक्षा है. जब तक हमारे समाज में ऐसे लोग जन्म न लेंगे तब तक हमारा अनादर होता रहेगा, हम दूसरों से पिछड़े रहेंगे और उस सम्मान को नहीं पहुंचेंगे जहां हमारा दिल पहुंचना चाहता है. ये कुछ कड़वी नसीहतें हैं जो मैंने तुम को की हैं. मुझे इसकी चिंता नहीं कि कोई मुझे पागल कहे या कुछ और!‘3”
#जवाब:
जनाब, क्या ये जो उपरोक्त quotation उनके लखनऊ भाषण में मौजूद है? बिलकुल नहीं है। अगर यकीन नहीं हो तो आप लखनऊ का उनका भाषण जो के इन्टरनेट पर भी उपलब्ध है पढ़ सकते है , ऐसा कोई पैराग्राफ है ही नही. दरअसल ये विभिन्न अंशो को बखूबी कट-पेस्ट करके एक एक पैराग्राफ का शक्ल दिया गया है, जिससे प्रतीत होता है कि ये भाषण का अंश है जोकि है ही नहीं, उम्मीद है कि पुरे भाषण को पढ़ लेंगे तो आप खुद ही अपनी इस इंटेलेक्चुअल बेईमानी पर शर्मसार हो जाएंगे।
https://youtu.be/mfRlatcZ5CU
फिर आप The Loyal Mohammedans of India नामक साप्ताहिक पत्रिका को उद्धरित करते हुए कहते है, जो उर्दू एवं अंग्रेज़ी में प्रकाशित होती थी जिसका उर्दू नाम ‘रिसाला-ए-खैर ख्वाहान-ए-मुस्लिम’ था. इस में आपके अनुसार सर सैयद ने इस बात कि वकालत की थी कि ‘ऊंची बिरादरियों’ में जन्म लेने वाले मुसलमानों को अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाली मुहिम में सम्मिलित नहीं होना चाहिए.
1860 में छपी उस पत्रिका में उन्होंने लिखा:
उस मनहूस दिन (ग़दर) अगर किसी जमात (समूह) ने अंग्रेजों का साथ दिया वो थे मुसलमान, जिन मुसलमानों ने विद्रोहियों का साथ दिया उन का समर्थन हम किसी प्रकार भी नहीं कर सकते. यही नहीं बल्कि उनके व्यवहार ऐसे रहे जिस से घृणा हुए बिना नहीं रहती. जिस लिए उन्होंने बर्बरतापूर्वक इस नरसंहार में भाग लिया उस के लिए वो क्षमा योग्य नहीं.’5
आपका कहना है कि यहां पर सर सैयद साहब ने ‘मुसलमान’ शब्द का प्रयोग किया है और उनके एक लेख से पता चलता है कि उनके निकट मुसलमान केवल अशराफ़ (सवर्ण) हैं जिसका विस्तार आगे आ रहा है.
#जवाब
जनाब, साफ़ साफ़ शब्दों में ये मुस्लिम शब्द लिखा है जिसको आप भी मान रहे है लेकिन आपके अनुसार ये मुस्लिम से मतलब सवर्ण मुस्लिम से है जिसके लिए आप ये तथ्य देते है:
“क़यामत (प्रलय) के दिन जब ख़ुदा मुसलमान तेली, जुलाहों, अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे मुसलमानों को दंड देने लगेगा तो प्रार्थी सामने हो कर याचना करेगा कि ख़ुदा तआला न्याय कीजिए”
#जनाब लगता है आप निंद्रारानी के गोद में अटखेली करते हुए अपनी मंतिक़ लगाए हैं इसलिए कंफ्यूज हो गए हैं आप, जनाब इसमें भी सवर्ण मुस्लिम कहीं नहीं लिखा है, बल्कि इसमें सर सैयद साहब साफ़ शब्दों में पढ़े लिखे तबके को कह रहे है कि तुम्हारी जिम्मेदारी है के उन कम पढ़े लिखे मुसलामानों को तालीम (शिक्षा) दो क्योंकि उसने कम इल्मी (असाक्षरता) के कारण जो ग़लतियाँ की होंगी, उसकी सजा अल्लाह तुम्हें देगा… वो कहेगा कि इसमें उसकी गलती नही है क्योंकि पढ़े लिखे शोरफा उनको सही-गलत नही बताए, उनहोंने अपनी जिम्मेदारी को पूरा नहीं किया, इसलिए ला-इल्म लोगों की सजा के बदले इसके जिम्मेदारो (पढ़े लिखों ) को मिले, दरअसल ऐसा कहकर वो उन अनपढ़ तबको को तालीम की रौशनी देने के लिए पढ़े लिखे तबके को मोटिवेट कर रहे है कि अल्लाह के सामने उनकी कमियों के जिम्मेदार वो साबित होंगे, ला-इल्म और अनपढ़ लोग पढ़े लिखे अशराफ का गिरेबान पकड़ेंगे।
दरअसल आपके इस बात से ही आपके लेख का टाइटल ही गलत साबित हो जाता है कि सर सैयद अहमद खान जातिवादी थे। जबकि वो मुसलामानोंको संबोधित कर रहे है और निचले और दबे कुचले लोगो को इल्म देने की वकालत करते हुए पाए जाते है।
फिर आप कहते है:
“सर सैयद साहब की पुस्तक ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद’ के बारे में राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी अपनी पुस्तक ‘मसावात की जंग, पस-ए-मंज़र बिहार के पसमांदा मुसलमान’ में लिखते हैं:
“ध्यान देने योग्य बात ये है कि इस पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद ‘सर ऑकलैंड कोल्बिन’ एवं जी.एफ़.आई. ग्राहम’ ने किया. ये पुस्तक ‘The Cause of Indian Revolt’ के नाम से 1873 में इसलिए प्रकाशित की गयी कि अंग्रेज़ अधिकारी सवर्ण मुसलमानों कि स्वामीभक्ति और मोमिनों (जुलाहों) की गद्दारी एवं विद्रोह से परिचित हो सकें… सर सैयद अहमद खां अंग्रेजों को ये समझाने में सफल हो गए कि भारत में बड़ी जातियों के मुसलमान अंग्रेज़ी सरकार के निष्ठावान हैं. स्ट्रीच ने सरकारी तौर से कहा है कि 1894 तक उत्तरी भारत की बड़ी बिरादरियों के मुसलमान अंग्रेज़ी सरकार की शक्ति के वाहक थे.”
#जवाब
जनाब, वैसे तो कम्युनिस्ट लोग पढ़े लिखे होते है लेकिन अफ़सोस की बात है कि कम्युनिस्ट पत्रिका के संपादक रह चुके अली अनवर से बड़ी चुक हुई है, उन्होंने english ट्रांसलेशन को उद्धरित किया है, उर्दू में मिलता जुलता ऐसा कुछ दिखा भी लेकिन जो ट्रांसलेशन उनके दोनों दोस्त ने किया उसमे ऐसा कुछ है।
हाँ, उर्दू में ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द’ में निम्न लिखित इबारत ज़रूर है:
“जुलाहों का तार तो बिलकुल टूट गया था जो बदज़ात सब से ज्यादा इस हंगामे में गर्मजोश थे.”
लेकिन उसके पहले उसी उर्दू किताब में ये बात भी लिखी है कि अंग्रेजो की पालिसी के कारण मुस्लिम कौम जो का कामगार तबका था वो बुरी तरह बेहाल हो गयी था, वो कहते हैं कि अंग्रेजो की पालिसी के कारण सुई बनाने वाले और दियासलाई बनाने वालो को को कोई नही पूछता था, हालात खराब थे जिसपर अंग्रेजो ने कोई ध्यान नही दिया, इस बेरोजगारी और पालिसी ने लोगो को अंग्रेजो के खिलाफ खड़ा होने के लिए मजबूर किया जोकि उन कामगार तबक़ों के लिए हमदर्दी दर्शाता है, हाँ, उन्होंने उसके तुरंत बाद ये जरुर कहा कि:
“जुलाहों का तार तो बिलकुल टूट गया था जो बदज़ात सब से ज्यादा इस हंगामे में गर्मजोश थे.”
#जनाब, सवाल यह है कि क्या इस तरह के सख्त शब्द उनहोंने सिर्फ जुलाहों के लिए ही इस्तेमाल किया या करते थे? बिलकुल नहीं। बल्कि बग़ावत में हिस्सा लेने वाले लोगों के लिए उन्होंने ऐसे ही शब्द प्रयोग किये हैं। यहाँ ये भी ध्यान रहे कि उन्होंने सीधे “बदजात जुलाहा” नही लिखा है। बल्कि बदजात का शब्द उन्होंने जुमले के दुसरे हिस्से में किया है। वो इस तरह की बात उसी साल उनके छपने वाली दूसरी किताबचा “सरकशी ए जिला बिजनोर ” में भी लिखे हैं।
उसमें सर सैयद बिजनोर के नवाब महमूद खान को wretch मतलब नीच कहा है वो लिखते है
At the time there was no way out except to hand over the District to that wretch Mahmud Khan, उतने पर ही जनाब नही रुकते है वो जब भी नवाब का नाम लिखे तब महमूद (जो तारीफ के लायक हो ) के बदले ना-महमूद (जो बुराई के लायक हो , the Unpraised One लिखते है
फिर उसी किताबचा (सरकशी ए जिला बिजनोर ) में एक अली बंधू जो के सैयद थे, के बारे लिखते है:
“Rustam Ali and Sadiq Ali are full brothers. It would be the height of nonsense to go so far as to call Sadiq Ali a sensible man, and Rustam Ali is a complete simpleton.”
(रुस्तम अली और सादिक अली दोनों सगे भाई थे . के अगर कोई
सादिक अली को एक समझदार व्यक्ति कहे तो ये बकवास की बकवास की पराकाष्ठा होगी, और रुस्तम अली पूर्णरूप से अनाडी है।
इसके अलावा वो कई जगहों पर विद्रोह में भाग लेने वालो को जाहिल, पाजी और बदमाश लिखे है.
हा, अली अनवर साहेब जिस अंग्रेजी ट्रांसलेशन को मुद्दा बना रहे हैं उसका ऑफिसियल ट्रांसलेशन नीचे है:
“[3.6] The stoppage of charitable pensions and stipends tending in a great measure to the poverty of the Indians.
Under the old regime there was another thing which contributed to the prosperity of the people, viz., the custom of bestowing “Jagirs” (grants of land or presents). At the coronation of the Emperor Shah Jehan at Delhi, no less than 400,000 beegahs, 120 villages, and tens of thousands pounds of sterling were given away in presents. This is never done nowadays; and not only is it not the case now, but even “jagirs” (grants of land) bestowed on the recipients in former days have been forfeited. Having thus shown the unsatisfactory state into which the Zemindars and cultivators have fallen, I must also state that petty artisans have suffered severely by the opening up of the trade with England, as they cannot of course compete with machinery. No one even thinks nowadays of buying country-made thread or matches, and the country cloth weavers have been ruined. When by the Divine Will Hindustan became an appendage of the Crown of Great Britain, it was the duty of Government to enquire into and lessen as much as possible the suffenngs of its subjects. By not doing so, many who would otherwise have been staunch friends of the British joined the rebels.”
हवाला: http://www.columbia.edu/…/mealac/pr…/00urdu/asbab/index.html
इस पैराग्राफ में अली अनवर साहेब को वो चीज़ कहा दिख गई? बाकि ‘सरकशी ए जिला बिजनोर’ तो पठानों के नाम से भरा पड़ा है, जिसमे सर सैयद साफ़ साफ़ कह रहे हैं कि इसमें पठानों ने हिस्सा लिया था।
उनकी बायोग्राफी जो उनके एक अँगरेज़ मित्र ने लिखा है, उसमे जब हंटर जो के बंगाल और असम का गवर्नर था, जिसने मुस्लिमो पर सख्ती करने के लिए एक किताब लिखी थी जिसका नाम ‘इंडियन मुसलमान’ था जिसका रद्द सर सैयद ने लिखा था, उस सवाल पर बात करते हुए उन्होंने NWFP के पठानों को “wild denizens” यानी जंगली शहरी कहा।
ये सब इसलिए कहना पड़ा कि 1857 के पहले से ही मुस्लिम अंग्रेज़ो के निशाने पर थे, 1857 के पहले से अंग्रेज़ो ने मुसलमानों को हाशिए पर डालना शुरू कर दिया था जिसके बारे में गवर्नर जनरल The earl of Ellenborough ने भी लिखा है और 1857 के बाद तो ब्रिटिश सरकार की पालिसी ही बन गई थी क्योंके ब्रिटिश इस बग़ावत के लिए मुसलमानों को ही जिम्मेदार मानते थे और इसको मुसलमानों का ‘जिहाद’ मानकर तमाम मुसलमानों को परेशान करने लगे थे। अंग्रेजों ने विद्रोह के वक़्त से ही मुसलमानों हटाने की पालिसी अख्तियार कर ली थी। सर सैयद अहमद खान लखनऊ की कांफ्रेंस में भी मुख़्तलिफ़ तरीक़ों और अंदाज़ से मुसलमानों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे। अगर पूरा लेख पढ़ें तो मामला आसानी से समझ में आ जाता है। सर सैयद का मक़सद अंग्रेजों की मुस्लिम मुखालिफ पालिस का रुख बदलना था जिसके कारण उन्होंने भी तब के हिन्दुओ वाली पालिसी अपनाई जिस कारण हिन्दू समाज मुस्लिम समाज से काफी आगे बढ़ चुका था। मुस्लिम पसमांदा हो चुका था क्योंकि मुस्लिम शोरफ़ा को जमींदारी और ओहदे मिलना कम हो गए थे। जिससे मुस्लिम कामगार तबके भी बदहाल हो गए थे।
रही बात औरतो की शिक्षा पर सर सैयद के पक्ष की तो वो फूक फूक कर कदम रख रहे थे क्योंकि उस वक़्त का भारतीय समाज औरतो की आधुनिक शिक्षा तो छोड़ दीजिए, आम शिक्षा का भी विरोधी था जो कि उन्होंने “असबाब ए बगावत ए हिन्द ” में लिखा है, वो महिलाओं के लिए आम शिक्षा से शुरुवात करना चाहते थे, वो कहते थे कि जब मर्द पढ़ लेगा तो बाप, भाई, पति ख़ुद ही आधुनिक शिक्षा के लिए अपनी औरतो को आगे लाएंगे, इसलिए तब तक वो औरतो के लिए उमूमी तालीम आम करने की कोशिश कर रहे थे। वो अचानक से क्रांति नहीं करना चाहते थे जिससे उनका मुसलमानों को तालीम से आरास्ता करने का सपना समय से पहले ही कहीं टूट न जाए जाए, सर सैयद की इस मस्लिहत को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जब बाल विवाह पर ही रोक लगी तो पहले 1891 में मिनिमम आयु 12 साल, फिर 1929 में 14 साल, फिर माता पिता की सहमती से 16 और 18 साल बना.
हाँ, वो नारी की आधुनिक शिक्षा को बढावा अप्रत्यक्ष रूप से देते रहते थे, जैसे वो इंग्लैंड की यात्रा के वर्णन में मिस मैरी कारपेंटर की तारीफ में कशीदे गढ़ते हुए कहते है कि:
“Miss Carpenter who is a famous lady to whom I met on m\ way to London and \\ho worked for the betterment of’ the Indian women in the field of education in Calcutta and Bombay… we had talk on the issues of’ education for women… and for education of masses…'”
(Aligadh Institute Gazette. 21 MAY 1869)
वो उसी डायरी में आगे लिखते हैं:
“Since I heard of Miss Marry Carpenter’s benevolent and philanlhinpic intension respecting Icmalc education in India. I was extremely anxious to form acquaintance with that noble lady and must consider it a providential been that I was fortunate enough to have the pleasure of meeting her on board the steamer Baroda’ on my way to London.,, bettering the moral condition of women is in itself the proof of the benevolent intensions and noble designs of Miss Carpenter… it is very noble of Miss Carpenter that she has taken great pains in educating her Indian sisters and it is my hearty prayer that every success will attend her noble exertions …”
(Aligadh Institute Gazette. 21 MAY 1869)
वो collegiate school of .Northevn London को विजिट करने के बाद ,निम्न बात लिखते है:
“I was eagerly waiting since long time to see and to inspect the c of legiates of girls in this country and the was they provided education to the girls… it is my desire to see all of them and later to inform the same for my country.”
( Aligadh Institute Gazette, 1st ApriL ; 1870)
इसके अलावा वो नारी शिक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के लिए एक वर्कशॉप में तारीफ़ करते हुए में लिखते है कि:
“This workshop is under the supervision of a lady and the machineries which are available in this workshop and the works which assigned to her she did to her capacity in this workshop”
( Aligadh Institute Gazette, 11 मार्च; 1870)
वो कहते थे:
“When the present generation of Mohammedan men is well educated and enlightened, the circumstances will necessarily have a powerful though indirect effect on the enlightenment of Mohammedan women, for enlightened fathers, brothers and husbands will naturally be most anxious to educate their female relations.”
( Aligarh Institute Gazettee, 7 April 1876, Nurul Hasan Naqvi, Sir Syed and Indian Muslims (Urdu) Aligarh, 1979, p.13 )
नारी शिक्षा के प्रति सर सैयद की इसी “ट्रिकल डाउन” पालिसी और हौसला अफजाई के कारण अलीगढ से ही पढ़े कश्मीर के शैख़ अब्दुल्लाह ने 1906 में पहले अलीगढ में गर्ल स्कूल खोला जोकि बाद में गर्ल्स कॉलेज में परिवर्तित हुआ.
बाकि वो अपनी किताबो में कहीं “रईस”, कहीं “शरीफ”, कहीं शोरफा तो कहीं कहीं अशराफ लिखे है जोकि सोशल स्टेटस को इंगित करता है न के जाति बिरादरी को। उर्दू की किसी भी पुरानी किताब में देख लें, शरीफ, अशराफ शब्द का जाति से कोई ताल्लुक नहीं है लेकिन एक तबके के सभी लोग को कभी शरीफ या अशराफ कहा गया है, वैसे जाति का सीधा सम्बन्ध पेशे से है जबकि मुस्लिम समाज में पहले से ही व्यवसाय चुनने की आजादी थी. पठानों, शैखो जाटो, कोंकणी ज्यादातर लोग आजादी के पहले भी व्यवसाय बदलते रहते थे. भारत से बने पाकिस्तान में आज भी पहले की तरह अशराफ को वर्ग से जोड़ा जाता है न कि बिरादरी/जाति से।
हाँ, एक बात और पहले अधिकतर लोग खुद को शैख़ ही कहते थे। इसलिए आप देखिये 1931 की जनसँख्या में अधिकतर लोग खुद को शैख़ बताए थे, कुल मुस्लिम की आबादी के आधा से कुछ अधिक लोग खुद को शैख़ में इंगित किये थे. जैसे शैख़ अब्दुल्लाह भिकारी जो के एक अंसारी (जुलाहा) थे लेकिन उनके नाम में भी शैख़ लगा हुआ था. शैख़ पीरन भी कोई अरब वाले शैख़ नहीं बल्कि उनका पेशा बोरा बीनना था . अंसारी (जुलाहा ) ने ही जामिया अशरफिया, मुबारकपुर जो के बरेलवी के लोगो का देवबंद समझा जाता है की स्थापना भी अन्सारियो ने किया, आजादी के पहले ही असीम बिहारी देवबंद से पढे थे तो अतिकुर रहमान (जिनको अब मंसूरी बना दिया गया है) दारुल उलूम देवबंद में अहम ओहदे पर थे, बरेलवी के सबसे बड़े आलिम आला हजरत “अहमद रजा खान, बरेलवी ” ने अपनी वसीयत में अमजद अली साहेब जो कि एक अंसारी थे जनाज़े की नमाज पढ़ाने के लिए कहा था, कारी अमानत रसूल एक बड़े आलिम भी अंसारी ही थे, आजादी के पहले भी चाहे देवबंद हो या बरेलवी, हर जगह बड़े बड़े अंसारी (जुलाहा) आलिम रहे हैं। मुसलमानों के हर धार्मिक समाज में लगभग बिरादरियों के आलिम रह चुके हैं।
हाँ, आपने जो अपनी विडियो में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सिर्फ अशराफ (जिसको आप जाति बना दिए है) का अड्डा क़रार दिया है और कहा है कि आजादी के बाद बाकियों को पढने की आजादी मिली, जोकि बिलकुल ही झूठ है, आजादी के पहले ही सभी पढ़ते थे चाहे पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री
जाट बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले लियाकत अली खान हो या ब्रिटिश पंजाब के प्रीमियर सिकंदर हयात खान जोकि जाट थे, मोमिन कांफ्रेंस के एक अहम नेता अब्दुल कय्यूम अंसारी भी उस वक़्त अलीगढ यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रह चुके है. इस तरह कटिहार के सबसे बड़े जमींदार जोकि इराकी (कलाल ) बिरादरी से थे तो पुराने पुरनिया जिले में कुल्हैया जमींदार थे उनके परिवार में भी लोग अलीगढ से पढ़ चुके है, कई गुज्जर और अन्य बिरादरी के लोग भी अलीगढ में पढ़ चुके है… दुआ है कि अल्लाह आपके दिलो दिमाग को सच व हक़ को क़ुबूल करने के लिए खोल दे और उम्मीद है कि आप सर सैयद के तअल्लुक़ से अपने स्टैंड पर।पुनर्विचार करेंगे और उससे एलानिया तौर पर रुजू फरमाएंगे। आमीन
Masood Alam Falahi and Shad Naved in conversation on Caste like practices among Muslims and textual transmission of the caste idea in South Asian Islamic textual tradition. Masood also talk about His book “Hindustan Mein Zaat-Paat Aur Musalmaan” (The Problem of Caste among Indian Muslims) and responses he received after the publication of this book. Masood Alam Falahi, a graduate of the Jamiat ul-Falah madrasa, and later he completed his Phd from JNU. Now he is working as a Professor of Department of Arabic, Language Literature and Cultural Studies, Kwaja Moinuddin Chishti Urdu, Arabi-Farsi University.

https://youtu.be/vf8fExhemR0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *