‘चाय खाना’ और चुनाव

वसीम खान वसीम

Asia Times Desk

वैसे तो भारत में एक ही संसद भवन है जिसमें एक प्रधानमन्त्री है।
सांसदगण और मन्त्रीगण मिलकर देश के विकास, खुशहाली और अन्य समस्याओं
पर चर्चा व उसका निराकरण करते हैं। परन्तु इस देश में चायखाने भी किसी
संसद भवन से कम हैसियत नहीं रखते, फर्क सिर्फ इतना रहता है कि संसद भवन
में चुने हुए मन्त्री सदस्य होते हैं और चायखाने में ऐसी कोई शर्त
नहीं होती। संसद भवन में सदस्य व मन्त्रीगण के बोलने की समय सीमा
निर्धारित होती है। जिसके अन्दर रहकर ही वे अपनी बात कह पाते हैं यदि कोई
उसकी अनदेखी करता है तो उसे बिठा दिया जाता है। परन्तु चायखानों में
ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं होता।

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ग्रामीण अंचल  के एक ‘चाय खाना’  पर चुनावी चर्चा करते कुछ फिक्रमंद ग्रामीण

वास्तव में असली और शुद्ध लोकतन्त्र यहीं देखने को मिलता है

यही वह स्थान है जहां हर नागरिक बोलने के अधिकार
का भरपूर प्रयोग कर पाता है यह वह महापंचायत होती है जहां अल्लामा इकबाल
”दस्तूरे जबान बन्दी“ की शिकायत नहीं कर पाते यहां हर व्यक्ति अपने बोलने
की समय सीमा स्वयं तय करता है। चायखाने आमतौर पर देश भर में पाये जाते
हैं और आमतौर पर हमेशा आबाद ही नजर आते हैं। रमजान और चुनाव के
दिनों में इन चायखाने में कुछ ज्यादा ही चहल-पहल देखने को मिलती
है।चुनाव और चायखानों का चोली-दामन का साथ होता है कहा जा
सकता है कि चाय के बेगैर चुनाव और चुनाव के बेगैर चाय अधुरे होते हैं
अर्थात दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।

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दिल्ली में ‘चाय खाना’  पर चुनावी चर्चा करते कुछ फिक्रमंद युवक

चाय के बेगैर चुनाव की कल्पना

भी बेकार है अलबत्ता चुनाव के बेगैर चाय पी तो जा सकती है परन्तु
वो चाय जो चुनाव में पी और पिलायी जाती है उसका आनन्द ही कुछ और
है।कल्पना कीजिए कि जब चाय की दुकान चहाड़ियों से खचाखच भरी होती है
एैसे में जुम्मन मियां चाय की तलाश में आ धमकते हैं जहां पहले से ही
इनके चहाड़ी मित्र मौजूद रहते हैं एैसे में जुम्मन मियां चाहकर भी चाय
नहीं पीते की आखिर अकेले-अकेले चाय पीये तो कैसे जेब भी इस बात की
इजाजत नहीं देती कि सबका भार उठाया जाए जबकि मियां जुम्मन के चहाड़ी मित्र
एैसे स्वभाव के हैं कि उन्हें जरा सा इशारा मिला कि साहब चाय पीओगे? तो
बिना क्षण भर रूके बोल पड़ते हैं कि और नही तो क्या, जुम्मन मियां चाय
की तलब अपने होठों में दबाये उचित अवसर के इन्तजार में रहते हैं कि
अचानक कोई नेता अपना काफिला लेकर पहुंचता है, बस फिर क्या, जुम्मन
मियां और उनके चहाड़ी मित्रों कि परेशानी दूर, ये सब म-हजये हुए खिलाड़ी
की तरह उन नेता की ओर एहसानमन्द निगाहों से देखर मुस्कुरातें हैं और
दिल ही दिल में दुआ करते हैं कि अल्लाह इनको लम्बी उम्र दे ताकि ये
बार-ंउचयबार चुनाव लड़ सकें।अक्सर देखा गया है कि बड़े-बड़े नेता भी
चायखानों की अहमियत से इनकार नहीं कर पाते और अपनी चुनावी मुहिम सर

चायखानों के चक्कर काटते नजर आते हैं यह ये नेता

करने के लिए चायखानों के चक्कर काटते नजर आते हैं यह ये नेता अपने
कारिन्दो को अलग-अलग होटलों पर बिठा देते हैं जो दिन भर अपने
शिकार को चाय की जाल में फंसाने की कोशिश में लगे रहते हैं कुछ एैसे
भी म-हजये हुये नेता पाये जाते हैं जो एकमुश्त रकम चायखाने के मालिक को
अदा कर देते हैं कि हर आने वाले को यहां तक की राहगीरों को भी
बुला-बुला कर इनके नाम से चाय पिलाते रहें इस तरह गरीब जनता कम से कम चुनाव
तक लाभ उठाती रहे चुनाव में चाय की अहमियत से कभी इनकार नहीं किया जा
सकता इसका अन्दाजा युं भी लगाया जा सकता है कि चुनाव में चाय का नशा
अभी तक शराब के नशे से भी ज्यादा असरदार होता है ये वो जगह है जहां
दिनभर एैसी तगडी-तगड़ी चुनावी जुमलेबाजियां होती हैं कि पल भर में
सरकारें बनाके बिगाड़ दी जती हैं

पल भर में सरकारें बनाके बिगाड़ दी जती हैं

चुनावी पंचायत के शौकीन दिनभर यहां चुनाव के उतार-ंउचयच-सजय़ाव और उसकी बारीकियों पर गौर किया करतें हैं और
चुटकी बजा के प्रत्याशियों को जीत और हार दिला दिया करते हैं चायखानों
की एक विशेषता यह भी है कि ये अच्छे खासे मीडिया हाउस भी होते हैं।
समाचारों के प्रसारण में ये अपना उदाहरण नहीं रखते जिस समाचार के प्रसारण की
प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया हिम्मत नहीं जुटा पाती उसको यह बड़ी
आसानी से प्रसारित कर देते हैं उदाहरणतः चुनाव में किस नेता ने कितने
वोट खरीदे,कितने पैसे खर्च किये,इन पैसों का स्रोत क्या है, कहां कितनी
साड़ियां और शराब बांटी गयीं किस वोट के व्यापारी ने कितना पैसा लेकर
कितने वोट दिलाने का वादा किया है इस प्रकार की जितनी भी खबरे होती हैं
यह चायखाने बिना किसी दिक्कत के प्रसारित कर देते हैं

न तो किसी सुबुत की जरूरत और न किसी गवाह की

चायखाने चुनाव लड़ रहे किसी प्रत्याशी की हार-जीत में अहम किरदार अदा करते
हैं।यहां हर घड़ी ताजा दम वक्ता बिना थके बेगैर किसी खोज के अपने
भाषण का उदगार करते रहते हैं। एक खोज के अनुसार पता चला कि इन
चायखानों पर हवायें भी बनाई-बिगाड़ी जातीं हैं। सुनकर आश्चर्य तो
होता है परन्तु पता चला कि यहां नेताओं की हार और जीत की हवा
बनाई-ंउचयबिगाड़ी जाती है। चुनाचें अब नेतागण चायखानों को बड़ी
आशा भरी नजरों से देखते हैं और हर हाल में यहां की सेवा लेना चाहते
हैं। जो नेता यहां की सेवा लेने में सफल हो जाता है तो सम-हजयो उसकी
हवा बन गयी और फिर जीत भी पक्की जिसने सुस्ती बरती उसकी हवा यह चायखाने
खराब कर देते हैं।चायखाने से ये भी पता चला कि कुछ नेता इस बात के लिए
प्रयासरत्न है कि इन चायखानों को राष्ट्रीय राजनीतिक खानकाह का दर्जा मिले,
उनका कहना है कि भारत सरकार को इस बात पर मजबुर किया जाएगा कि इन राष्ट्रीय
चुनावी खानकाहो में आवश्यकतानुसार वक्ताओं की तैनाती की जाए जो
यहां 24 घंटे चुनावी पंचायत में लीन रहें।

 

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