बाबरी मस्जिद विवाद : सुन्नी बोर्ड ने कहा कि जबरन रामलला की मूर्ति रखकर विवाद खड़ा किया गया

Awais Ahmad

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की 19वें दिन की सुनवाई के दौरान सुन्नी वक़्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने अपनी जिरह जारी रखी। सुनवाई शुरू होते ही अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्षकार इक़बाल अंसारी पर हुए हमले के बारे में कोर्ट को बताया। राजीव धवन ने कहा कि मैं नहीं जानता कि इस हमले की जांच कराए जाने की जरूरत है या नहीं लेकिन इस घटना पर कोर्ट की सामान्य टिप्पणी भी मायने रखती है, इसके लिए दूसरे पक्ष पर आरोप नहीं लगा रहा हूं, उनसे मेरे अच्छे संबंध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम देखेंगे कि इस मामले में क्या किया जा सकता है और जो कुछ जरूरी होगा हम करेंगे।

सुनवाई के दौरान राजीव धवन ने कहा कि विवादित ज़मीन के एक हिस्से में निर्मोही अखाड़ा पूजा करता था। ज़मीन के एक हिस्से में अखाड़ा का पूजा करने का अधिकार है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने पूछा कि अगर ज़मीन के एक हिस्से में निर्मोही अखाड़ा के पूजा करने का अधिकार है तो फिर देवता का भी अधिकार हो जाता है और देवता का अधिकार पूरे ज़मीन पर हो सकता है। पूजा के अधिकार से ज़्यादा अधिकार देवता का होता है। इसपर धवन ने कहा कि सवाल ये है कि पूजा का अधिकार ज़मीन के किस हिस्से पर है।

जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने फिर पूछा कि क्या आपको निर्मोही अखाड़ा के पूजा के अधिकार से कोई आपत्ति नहीं है। इस पर धवन ने कहा कि कोई आपत्ति नहीं है। जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि यानी आप मान रहे हैं कि उस विवादित ज़मीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों एक साथ मौजूद थे। धवन ने फिर समझाया कि दरअसल मस्जिद का एक बाहरी हिस्सा है जहां राम चबूतरा स्थित थ। राम चबूतरा के आगे एक दरवाजा हुआ करता था जहां से लोग मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाया करते थे। राम चबूतरा का जो हिस्सा है वहां निर्मोही अखाड़ा को पूजा का अधिकार है। लेकिन पूरे विवादित ज़मीन पर मालिकाना हक नहीं है। पूरे ज़मीन पर मुस्लिम पक्षकारों का ही मालिकाना हक है। हां ये ज़रूर है कि राम चबूतरा पर निर्मोही अखाड़ा पूजा कर सकता है।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि ये समझना होगा कि पूजा का अधिकार और ज़मीन का मालिकाना हक दोनों अलग-अलग चीज है। निर्मोही अखाड़ा को राम चबूतरा पर पूजा का अधिकार हो सकता है लेकिन अखाड़े का मालिकाना हक नहीं है।

राजीव धवन ने कहा कि हम निर्मोही अखाड़ा के शेबेट के अधिकार को नहीं छीन रहे जस्टिस भूषण ने धवन से पूछा कि इसका मतलब है कि आप स्वीकार कर रहे हैं कि वह बाहरी आंगन में प्रार्थना कर रहे थे। धवन ने कहा कि 1885 में उन्होंने अंदरूनी हिस्से पर अधिकार की बात कही और पूजा के अधिकार की बात कही, शेबेटशिप उनकी न्यायिक स्थित है। निर्मोही अखाड़ा, प्रबंधन अधिकारों की मांग कर रहे हैं, वह प्रबंधन अधिकारों के हकदार हैं, लेकिन बाहरी आंगन में क्या था और पूजा कहां की जा रही थी इसका फैसला होना है।

धवन ने सुनवाई के दौरान कहा कि देवता के अधिकार सीमित हैं। 1885 में शेबेट ने दावा दायर किया लेकिन उपाधित्व का दावा नहीं किया गया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि शेबेट का अधिकार देवता के प्रबंधन के बारे में है लेकिन देवता का अधिकार अल्पविकसित है।

राजीव धवन ने कहा कि आधुनिक ऐंग्लो मस्लिम कानून के साथ हमको चलना होगा हम यह नहीं कह सकते कि वह अच्छे लोग थे या बुरे। जस्टिस बोबडे ने कहा कि आप कह रहे हैं कुरानिक कानून मस्जिद पर लागू नहीं होगा। धवन ने कहा कुरानिक कानून को भारतीय कानून ने माना है आप कुरानिक कानून की अनदेखी नहीं कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि बाहरी अहाता तो शुरू से निर्मोही अखाड़े के कब्जे में रहा है। राजीव धवन ने कहा कि झगड़ा तो आंतरिक आंगन को लेकर है जिस पर जबरन कब्ज़ा किया गया। राजीव धवन ने कहा कि जिस ढांचे को तोड़ा गया वहां पहले मन्दिर होने के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले।

राजीव धवन ने कहा कि एडवर्स पोजिशन को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया है। हाईकोर्ट के फैसले के हवाले से राजीव धवन ने कहा कि बीच वाले गुम्बद के नीचे जबरन रामलला की मूर्ति रखकर विवाद खड़ा किया गया, क्योंकि उन्होंने इस बारे में एक कहानी भी गढ़ ली गई।

जस्टिस खान और जस्टिस शर्मा के बाद अब धवन फैसले में उस बेंच के प्रमुख जस्टिस अग्रवाल की टिप्पणियों की चर्चा करते हुए राजीव धवन ने कहा कि जस्टिस अग्रवाल ने भी साथी जजों की तरह मुकदमों को मेंटनेबल यानी नहीं माना था। उसके अलग-अलग कई कारण बताए थे।

वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने जस्टिस मुखर्जी के फैसले के हवाले देते हुए कहा कि बौद्ध काल से मूर्तियों की पूजा का प्रचलन ज़्यादा बढ़ा, मन्दिर कैसे ज्यूरिस्टिक पर्सन हो सकता है जब वो खुद ही किसी का बनाया और समर्पित किया हुआ है। वकील राजीव धवन ने कहा कि वैदिक काल मे तालाब और कुएं भी संरक्षित किए जा रहे थे ईश्वर खुद अपनी घोषणा कर रहे हैं।

देवता की सम्पत्ति पर जिरह करते हुए राजीव धवन ने कहा कि धवन ने कहा कि देवता किसी संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता, ये सब कल्पना है, देवता उस संपत्ति का सुख नहीं ले सकता, यह तो उसके ट्रस्टी ही करते हैं। राजीव धवन ने कहा कि काले पत्थरों के खंभों के ज़रिए भी हिन्दू इस जगह पर दावा करते हैं, लेकिन गवाह भी बताते हैं कि मूर्ति वहां रखी गई थी।

निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने 1885 में स्वीकार किया है कि उनका बाहरी अहाते में पूजा का अधिकार था। राजीव धवन ने हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पक्षकारों द्वारा अपने दावे के समर्थन में पेश किए गए दस्तावेज़ों पर ही सुनवाई करे। हाईकोर्ट में पक्षकारों में से निर्मोही अखाड़े और मुस्लिम पक्षकारों ने मालिकाना हक को लेकर 24 दस्तावेज़ दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई दस्तावेज़ ऐसे भी हैं जो पेश तो किए गए लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया गया। वहीं कई दस्तावेज़ प्रमाणित तो थे लेकिन वो पेश नहीं किए गए

राजीव धवन ने कहा कि जब निर्मोही अखाड़ा ने कब्जा किया उसके बाद प्रशासन द्वारा यह प्रोजेक्ट किया गया कि कब्जा अखाड़ा का है, जबकि इससे पहले मुस्लिम लोग नमाज अदा करने जाते थे।

राजीव धवन ने अपनी जिरह कके दौरान कहा कि पी कारनेगी ने अपने विवरण में यह लिखा है कि संरचना में स्तंभ बुद्धिष्ट स्तंभों के समान थे, हिन्दुओं और मुसलमानों की संयुक्त संपत्ति का भी उल्लेख किया गया है, इससे स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम मस्जिद के आंतरिक कक्ष में नामज़ अदा करते थे और हिन्दू भी बाहर पूजा करते थे।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि 1828 के गजेटियर में हेमलटन ने मस्जिद का कोई जिक्र नहीं किया है, जबकि मार्को पोलो ने तो ज़िक्र किया है। यह दावा किया गया कि 360 मन्दिर ध्वस्त किए गए थे।

वकील राजीव धवन ने कहा कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के गजेटियर में भी कहा गया है कि वहां मस्जिद थी जिसे बाबर का बनाया हुआ कहा जाता है और वहीं हिन्दू राम का जन्मस्थान मानते हैं। धवन ने कहा कि ऐतिहासिक कार्नेगी के स्केच और वर्णन भी बाबर के बनाई मस्जिद की बात कहते हैं। कारनेगी ने खंभे बौद्ध मठ का हिस्सा होने का अनुमान लगाया गया था। हिंदुओ ने तीन बार विवादित इमारत पर कब्जे की कोशिश की थी। 1528 में बाबर के अयोध्या आने और मस्जिद बनाने की बात कही जाती है।

राजीव धवन ने कहा कि शिलाओं पर लिखे आलेख पर कोई शक ओ शुबहा नहीं किया जा सकता है। गजेटियर में दर्ज है कि जन्मस्थान के पास मस्जिद थी वहां निर्मोही अखाड़ा ने चबूतरा बनाया। धवन ने कहा कि 1825 के आसपास वहां सिंहद्वार बनाने की इजाजत पर भी हंगामा हुआ था, फिर अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया यानी अंदर मस्जिद बाहर पूजा का। मामले की सुनवाई कल भी जारी रहेगी।

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