बाबरी मस्जिद विवाद: सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने कहा राम जन्मभूमि न्यास का सूट राजनीति से प्रेरित

Awais Ahmad

अयोध्या विवाद मामले में सुनवाई के 37वें दिन यह तय हुआ कि सुनवाई नियत समय यानी 18 अक्टूबर से एक दिन पहले ही पूरी हो जाएगी। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि सूट नम्बर पांच यानी राम जन्मभूमि  न्यास का सूट राजनीति से प्रेरित है। जन्मभूमि न्यास में 14 ऐसे लोग हैं जो विश्व हिंदू परिषद द्वारा चुने जाते हैं और देवकीनंदन अग्रवाल बीएचपी के सदस्य हैं। 1989 में पहली बार स्थान देवता का कॉन्सेप्ट  लाया गया। उससे पहले हिन्दुओ ने कभी स्थान देवता की बात नहीं की थी। धवन ने कहा कि 1855 से पहले और उसके बाद 22-23 दिसम्बर 1949 जब मूर्तियां रखीं गयी तबतक वहां मुस्लिमों का कब्जा था।

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की तरफ से राजीव धवन ने कहा कि कोई भी यह नहीं दावा खारिज कर रहा कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ है, लेकिन विवादित स्थल में ही जन्म हुआ, यह कैसे? धवन ने कहा कि विवाद इस पर है कि भगवान राम का जन्म सेंट्रल डोम के नीचे हुआ।

धवन ने कहा कि हिन्दू पक्ष की दलील है कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाया था। जबकि तथ्य यह है कि बाबर कोई विध्वंसक नहीं था। धवन ने निर्मोही अखड़ा की याचिका का अंश पढ़ते हुए कहा कि याचिका में कहा गया है बाबर ने नही मीर बाकी ने मन्दिर को गिराया, उसने ऐसे इसलिए किया क्योंकि वह एक फकीर से बहुत प्रभावित था। धवन ने दलील दी कि 1528 में बाबर ने मीर बांकी को मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। 1528 से लेकर 1855 तक हिंदुओं का कोई दावा नहीं था कि वहां पूजा पाठ करते रहे हैं।

धवन ने दलील दी कि पहले यही विश्वास था की भगवान राम का जन्म अयोध्या में कहीं हुआ था। लेकिन हिन्दुओं ने दावा किया की मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे ही भगवान राम का जन्म हुआ था। हम जानना चाहते है कि 1885 से पहले विवादित स्थल पर क्या हुआ था। दरअसल 1885 में ही पहली बार ये मामला कोर्ट में आया था। मुस्लिम पक्ष की दलील है की 1885 से पहले का कोई भी दस्तावेज कोर्ट को नहीं मानना चाहिए।

पोजेशन के अधिकार पर जुरह करते हुए राजीव धवन ने कहा कि 1855 से पहले और उसके बाद 22-23 दिसम्बर 1949 जब मूर्तियां रखीं गयी तबतक वहां मुस्लिमों का कब्जा था।23 दिसम्बर के बाद उनका डिस्टर्ब पोजेशन माना जायेगा। उनकी दलील थी कि वहां अगर 6 दिन नमाज नहीं पढ़ी गयी तो उनका मालिकाना चला नहीं गया।

धवन ने कहा कि 16 दिसंबर 1949 , शुक्रवार को आखरी नमाज पढ़ी गयी थी। 22 दिसम्बर को हिंदुओं ने अंदर के हिस्से में मूर्ति रख दी और पूजा की। लिमिटेशन एक्ट के तहत सूट दायर करने की लिमिटेशन 12 साल की थी। धवन की दलिल थी कि उनका सूट फाइल करने की लिमिटेशन थी 22 दिसंबर 1961 और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने 18 दिसम्बर को सूट दायर कर दिया था।

ऐसे हाईकोर्ट ने जो लिमिटेशन के ग्राउंड पर सूट रद्द किया था वह सही नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट के वह फैसला रद्द करने के योग्य है। गौरतलब है कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के सूट को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिमिटेशन के ग्राउंड पर ही रद्द कर दिया था।

बाबरी मस्जिद को मिलने वाले ग्रांट को लेकर भी बहस हुई

राजीव धवन ने कहा कि बाबर के ज़रिए मस्जिद को अनुदान दिया जाता था। जिसको लखनऊ के नवाबों ने जारी रखा। धवन ने कहा कि बाबर ने बाबरी मस्जिद के रखरखाव के लिए 302 रु का सालाना ग्रांट दिया जाता था।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या बाबर द्वारा दिए गए अनुदान के लिए कोई प्रमाण है? राजीव धवन ने कहा कि हमारे द्वारा कोई रिकॉर्ड नहीं दिया जा सकता है और यहां तक ​​कि हिंदू भी अपनी कहानियों के अलावा कुछ भी नहीं दिखा सकते हैं।

जस्टिस नज़ीर कहा कि अनुदान का मतलब यह है कि वह अनुदान सिर्फ मस्जिद के लिए था ना कि पूरी ज़मीन के लिए। सूट 5 में भी मस्जिद की बात मानी गई है।

राजीव धवन ने कहा कि 1934 में मस्जिद पर हमले के दौरान मुसलमानों को मुआवजा दिया गया था। यहां तक ​​कि इसके रखरखाव के लिए मस्जिद को साफ करने की अनुमति भी दी गई थी।एक निरंतरता थी।

इस्लाम में दैवीय के होने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया

सुनवाई के दौरान पांच सदस्यीय बेंच के जस्टिस बोबड़े ने राजीव धवन से पूछा कि क्या इस्लाम में देवत्व को किसी वस्तु पर आरोपित किया जा सकता है ?

इस पर धवन की ओर से जवाब दिया गया कि दोनों धर्मों ( हिन्दू, मुस्लिम ) में ऐसा ही होता है, इस्लाम में मस्जिद इसका उदाहरण है।

जस्टिस बोबड़े ने कहा कि ” हम हमेशा सुनते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है। आप अल्लाह की पूजा करते हैं ना कि किसी वस्तु की। हम देखना चाहते हैं कि क्या किसी संस्था ने मस्जिद को पूज्य माना है, क्योंकि सिर्फ अल्लाह की इबादत किये जाने की बात आती है।”

राजीव धवन ने कहा कि मुस्लिम पांच बार अल्लाह की पूजा करते हैं। नमाज़ मस्जिद में अदा की जाती है।

इस पर जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि क्या मस्जिद दैवीय है? धवन ने जवाब में कहा कि यह हमेशा से ही दैवीय रहती है। मुस्लिम दिन में पांच बार नमाज पढ़ते हैं अल्लाह का नाम लेते हैं। ये अल्लाह को समर्पित ही है।

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की दलील, लिमिटेशन के तहत ही दायर हुआ था सूट

राजीव धवन ने दलील दी कि 1855 में अंग्रेजों के वहां आने के बाद हिंदुओं ने हंगामा करना शुरू किया। उसके बाद 1886 और 1886 में मजिस्ट्रेट का आदेश आया कि जिसमें हिंदुओ के मंदिर बनाने की मांग खारिज कर दी गयी थी। इसी फैसले के आलोक में धवन ने दलील दी कि जब 1886 में मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं की मंदिर बनाने की मांग को खरिज कर दिया था।रेस ज्युडिकेटा के सिद्धांत के तहत हिन्दू दोबारा सूट दायर नहीं कर सकते थे और उनको कोई रिलीफ़ नहीं दी जा सकती।

धवन ने कहा कि 5 जनवरी 1950 में वहां पर रिसीवर नियुक्त किया गया, तो हम कह सकते हैं कि 1950-1990 के बीच किसी को भी वहां पर तस्वीर लेने की इजाज़त नही थी। हिंदू पक्षकार की तरफ से सुनवाई के दौरान कई तस्वीरें दिखाई गई थी।

जाने सुनवाई के दौरान सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने क्या कहा 

राजीव धवन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपरिहार्य शक्तियों के तहत दोनों ही पक्षों की गतिविधियों को ध्यान में रखकर इस मामले का निपटारा करे। इस मामले में मस्जिद पर जबरन कब्जा किया गया। लोगों को धर्म के नाम पर उकसाया गया। रथयात्रा निकाली गई, लंबित मामले में दबाव बनाया गया। मस्जिद ध्वस्त की गई और उस समय मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने एक दिन की जेल अवमानना के चलते काटी। अदालत से गुजारिश है कि तमाम घटनाओं को ध्यान में रखे।

धवन ने कहा कि हम कैसे देखते हैं कि इतिहास महत्वपूर्ण है। केके नायर के खिलाफ लगे आरोप पब्लिक डोमेन में हैं। गलत तरीके से आरोप लगाए गए, एक व्यक्ति को भी वहां पर सोने की अनुमति नहीं थी। धवन ने कहा कि वक़्फ़ की ज़मीन पब्लिक इस्तेमाल के लिए होती है। कोर्ट मानता है यह वक़्फ़ की प्रॉपर्टी है, लेकिन ये पब्लिक इस्तेमाल के लिए है ऐसा क्यों कहा गया?

धवन ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधि वह होती है, जहां दो समुदाय बंट जाएँ, क्योंकि हिंदू पक्ष की ओर से ऐसा हुआ जो 1934 की घटना से 6 दिसंबर, 1992 में हुआ, जिससे शांति भंग हुई। मस्जिद तोड़ने की घटना के बाद भारी तोड़फोड़ और हिंसक घटनाएं हुईं। इस पूरे मामले में अदालत यह गौर करे कि भारत के सेक्यूलरजम को भारी क्षति हुई, जबकि अदालत में मामला लंबित था। हिंदू पक्ष कहता है कि 12वीं शताब्दी में मंदिर था तो उसके तीन शताब्दी बाद बाबर आया। अदालत को यह देखने कि जरूरत है कि ऐतिहासिक घटनाओं में कितना गैप रहा।

धवन ने कहा कि वेदों में भी नहीं बताया गया है कि न्यायिक व्यक्ति क्या होता है और यह दावा किया जा रहा है कि भगवान राम का जन्मस्थान न्यायिक व्यक्ति है। धवन ने कहा कि क्या न्यायिक व्यक्ति होने के लिए धार्मिक विश्वास होना काफी है? कोर्ट को तय करना है कि न्यायिक व्यक्ति क्या होगा? अगर सिर्फ विश्वास पर मामला आधारित है तो सभी मुस्लिम का विश्वास है वहां पर मस्जिद थी।

धवन ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति के हिसाब से वहां पर शेबेट का अधिकार किसका होगा यह भी सवाल है। धवन ने कहा कि वह किसी पूजा कर रहे हिंदुओं के ट्रैवलर का हवाला दिया गया और उसके अनुसार वहां एक धर्मिक स्थान था। देश की सभी मस्जिद भी धर्मिक स्थान हैं, इसलिए हमको 1885 से 1989 के बीच देखना चाहिए कि वह कहां पूजा कर रहे थे। सभी पूजनीय स्थल न्यायिक व्यक्ति नहीं हो सकते। धवन ने कहा हिंदू कहते हैं कि वह भगवान की पूजा कर रहे हैं। यह बिल्कुल सही है कि भगवान होंगे, तभी पूजा होगी। पिछले 140 सालों से वह किसी की पूजा कर रहे हैं। आप यह नहीं कह सकते वो स्वयंभू न्यायकि व्यक्ति हैं और हम उसकी पूजा कर रहे हैं।

धवन ने दलील दी कि अयोध्या विवाद को लेकर हिंदू पक्षकार कहानी बना रहे हैं। हिंदू पार्टियों के बयान में विरोधाभास है। वो ये नहीं साबित कर पा रहे हैं कि वहां पर मस्जिद बनाई गई थी या नहीं। मस्जिद को बाबर ने बनाया था या औरंगजेब ने इस पर भी एकमत नहीं हैं।

राजीव धवन ने कहा कि जब बाबर 1526 में आया था तो उस जगह पर कुछ नहीं था। वहां पर खाली जमीन पड़ी थी।मस्जिद एक जगह है, जो सीधे अल्लाह से जोड़ती है।इस्लाम में दिन में 5 बार नमाज़ होती है, जो अल्लाह से जोड़ती है।मस्जिद अल्लाह का घर है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा किआप जो कह रहे हैं हम उससे जुड़ी हुई और जानकारी चाहेंगे। मुस्लिम धर्म में सिर्फ अल्लाह से दुआ करते हैं न कि परमशक्ति के अलग-अलग अवतारों से।

धवन ने कहा कि मध्यस्थता से पहले ट्विटर और सोशल मीडिया पर फैलाया गया था कि 500 मस्जिद ऐसी हैं, जिसकी लिस्ट तैयार की गई है. जो मंदिर की जगह पर बनाई गई हैं। CS वैद्यनाथन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कोर्ट में इस तरह से ड्रामा नहीं होना चाहिए। धवन ने कहा कि हिंदू पार्टी की तरफ से मध्यस्थता की बातों को भी मीडिया में बताया गया। इस पर भी CS वैद्यनाथन ने आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह के आरोप कोर्ट में नहीं लगाने चाहिए। धवन ने नाराजगी जाहिर करते हुुए कहा कि हम ड्रामा नहीं कर रहे हैं। हम कानूनी पहलू पर बात कर रहे हैं।

धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा की जो दलीलें हैं, वह पूरी तरह से गलत हैं। उनकी ओर से कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं दिए गए हैं। धवन ने कहा कि मस्जिद को गिराने की योजना मार्च 1992 में थी, जिसे दिसंबर में अंजाम दिया जा सका। यह एक सोची समझी साजिश थी।

धवन ने कहा कि हिंदुओं ने हमारी मस्जिद को गिरा दिया और हिंदुओं ने उलटा कहा कि उनको प्रताड़ित किया गया। दो राष्ट्र की बात कही गई।

धवन ने निर्मोही अखाड़ा की याचिका का अंश पढ़ते हुए कहा कि याचिका में कहा गया है कि वहां पर तीन गुम्बद की कोई मस्जिद नहीं थी। भारतवर्ष में इस्लामिक कानून लागू नहीं होता। यह भी कहा गया कि गुम्बद वैदिक समयकाल से मिलता जुलता है। धवन ने निर्मोही अखाड़े की याचिका का अंश पढ़ते हुए बताया कि याचिका में कहा गया है कि बाबर ने नहीं मीर बाकी ने मंदिर को गिराया। उसने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वह एक फकीर से बहुत प्रभावित था।

धवन ने बताया कि 1885 में गैरकानूनी तरीके से चबूतरे को मस्जिद के पास बनाया गया। आपकी ट्रैवलर की स्टोरी है लेकिन उसमें चबूतरे के बारे में नहीं बताया गया है।

धवन ने कहा कि हिंदुओं को पहले यह साबित करना होगा कि वह मंदिर था और उसके बाद यह साबित करना होगा कि मुस्लिम ने उस पर कब्ज़ा किया। हम जानना चाहते हैं कि 1885 से पहले वहां पर क्या हुआ? दरअसल 1885 में पहली बार यह मामला कोर्ट में आया था, जिसको लेकर मुस्लिम पक्ष का कहना है 1885 से पहले का कोई भी दस्तावेज कोर्ट को नही मानना चाहिए। धवन ने कहा कि चबूतरे को मस्जिद के अंदरूनी हिस्से में एक मक़सद के तहत बनाया गया।

धवन ने कहा कि हिंदुओं ने पहले सिर्फ बाहरी आंगन में पूजा के अधिकार की मांग की जिसको कोर्ट ने स्वीकार भी किया। मस्जिद के बाहरी दीवार पर अल्लाह लिखा हुआ था। धवन ने कहा कि 1882 में मुस्लिम ने एक याचिका दाखिल की थी, जिसमें कहा गया कि बाबरी मस्जिद के गेट के पास या बाबरी मस्जिद के अहाते में राम चबूतरा है जिसके किराया की मांग रघुबरदास से की गई थी। जिसको कोर्ट ने खारिज कर दिया था।बाबरी मस्जिद के मुतावल्ली मोहम्मद अज़गर ने इसको चैलेंज नहीं किया । जस्टिस नज़ीर ने पूछा कि कोर्ट ने किस आधार पर इसको खारिज किया था। धवन ने कहा कि वह इस बारे में चेक करके कोर्ट को बताएंगे।

जिरह के दौरान राजीव धवन की अनोखी टिप्पणीयां

धवन ने कहा कि कल कहा गया कि यह क्रिकेट टूर्नामेंट की तरह है, इस पर SC ने कहा था कि यह एक केस ही है। धवन ने कहा कि हमारे लिए भी यह एक केस की तरह है। राजीव धवन ने कहा कि वह इस तरह की टिप्पणी करके राज्यसभा नहीं जाना चाहते हैं।

धवन ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी बहस के नोट का कंपाइलेशन दिया। धवन ने कहा कि दलीलों को सुनने के बाद ऐसा लगा कि फेल अभिनेता एक्टिंग कर रहे हैं। रियल अभिनेता जैसी की गई एक्टिंग देखने को नहीं मिली। जैसे राजकपूर और आमिर खान करते हैं।

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