बाबरी मस्जिद विवाद: 1949 में भी बाबरी मस्जिद में नामज़ पढ़ी गई : सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड

Awais Ahmad

अयोध्या मामले में सुनवाई के 23वें दिन मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी ने यह साबित करने की कोशिश की किन1934 के बाद भी बाबरी मस्जिद में नामज़ पढ़ी जाती थी। जिलानी ने इसके लिए कोर्ट के सामने कुछ मुस्लिम गवाहों की गवाही और  दस्तावेजों का संदर्भ पेश पेश किया। जफरयाब जीलानी ने मुस्लिम पक्ष के गवाहों के बयान पर यह साबित करने की कोशिश की कि 1934 के बाद भी विवादित स्थल पर नामज़ पढ़ी गई। जिलानी ने बाबरी मस्जिद में 1945 -46 में तरावीह की नामज़ पढ़ाने वाले हाफ़िज़ के बयान का भी ज़िक्र किया। जीलानी ने एक गवाह का बयान पढ़ते हुए कहा कि उसने 1939 में मगरिब की नमाज़ बाबरी मस्जिद में पढ़ी थी।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के  वकील ज़फरयाब जीलानी ने मोहम्मद हाशिम और हाजी मेहबूब के बयान का हवाला देते हुए कहा कि मोहम्मद हाशिम और हाजी मेहबूब ने अपनी गवाही में कहा था कि उन दोनों ने 22 नवंबर 1949 को बाबरी मस्जिद में नामज़ अदा की थी। जिलानी ने एक गवाब के बारे में बताते हुए कहा कि 1954 में बाबरी मस्जिद में नामज़ पढ़ने की कोशिश करने पर उस व्यक्ति को जेल हो गई थी।

जफरयाब जिलानी ने पीडब्ल्यूडी की उस रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि 1934 में मस्जिद पर कुछ लोगों ने हमला किया था जिससे मस्जिद का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था और पीडब्ल्यूडी ने उसकी मरम्मत कराई थी। जीलानी ने कहा कि मस्जिद में तीन जगहों पर अल्लाह लिखा हुआ था, 1934 में मस्जिद के विध्वंस के बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर उसको 1935 में दुबारा लिखा गया।

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फरयाब जिलानी ने दलील दी कि 1934 में बैरागियों ने जब मस्जिद हमला किया था मस्जिद में हुए नुकसान को लेकर मस्जिद के ट्रस्टी ने सरकार से मुआवजा मांगा। चूंकि हर्जाने के लिए सिर्फ मुसलमानों ने ऑथोरिटी का रुख किया। ये दर्शाता है कि मुस्लिम मस्जिद के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे।

जिलानी ने दलील दी कि मस्जिद की एक बाद सफाई हो जाये तो वहाँ दुबारा नामज़ पढ़ी जा सकती है। 1943 अयोध्या में हुए दंगे के कुछ महीने बाद मस्जिद में दुबारा नामज़ पढ़ने की इजाज़त दे दी गई थी, यह नहीं कहा जा सकता है वहां पर नामज़ नहीं पढ़ी गई। हिन्दू पक्ष की तरफ से जिरह के दौरान यह दलील दी गई थी कि 1934 के बाद विवादित स्थल पर नामज़ नही पढ़ी गई थी।

लंच के बाद मुस्लिम पक्ष के लिए राजीव धवन ने एक बार फिर जिरह शुरू की। राजीव धवन ने निर्मोही अखाड़े की इस दलील का विरोध किया कि वहां पर उनकी मौजूदगी सदियों पुरानी है। धवन ने कहा कि ‘इस बात का कोई सबूत नही है कि निर्मोही अखड़ा वहां पर प्रचीनकाल से मौजूद है। लोगों का विश्वास है 11 हज़ार साल पहले उस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था, श्रीराम जन्मभूमि पहली बार 1989 में कहा गया,1989 में ही पहली बार कहा गया कि जन्म स्थान न्यायिक व्यक्ति है।इससे पहले कभी ऐसा दावा नही किया गया।’

सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़े के पास ऐसे सबूत नहीं, जिससे साबित हो सके कि उनका शास्वत काल से सेवादार का हक़ रहा है,अखाड़े ने भी सिर्फ सेवादार/प्रबंधन का अधिकार मांगा है, ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर दावा नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान राजीव धवन ने कहा कि पहले हिन्दू बाहर के अहाते में पूजा करते थे लेकिन 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति को गतल तरीके से मस्जिद के अंदर शिफ्ट किया गया, इसका कोई सबूत नही बीच वाले गुम्बद के नीचे भगवान राम जन्मस्थान है। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखड़ा का कहना है वह शेबेट है और मेमेजन्मेंट के अधिकार से वंचित है अगर कोई नया मन्दिर बन जाता है तो निर्मोही अखाड़ा  उसका शेबेट रहेगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस DY चन्द्रचूड़ ने पूछा कि मूर्ति एक न्यायिक व्यक्ति है या नही इसकी क्या विशेषताएं है? जस्टिस बोबड़े ने पूछा की क्या काबा भी स्वयंभू है?

राजीव धवन ने यह भी दलील दी कि रामलला विराजमान की तरफ से दलील दी गयी थी कि हिंदू नदियों, पहाड़ों को पूजते आये हैं और इसी तर्ज पर राम जन्मस्थान भी वंदनीय है। मेरा कहना है कि यह एक वैदिक अभ्यास है। हिन्दू सूरज की पूजा करते है, लेकिन उस पर अपना मालिकाना हक़ तो नहीं जताते। सोमवार को भी राजीव धवन अपनी जिरह जारी रखेंगे।

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