अयोध्या विवाद में तीसरे पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट

Awais Ahmad

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की तरफ से इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इस मामले में किसी अन्य को अब पक्षकार न बनाया जाए। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी से पूछा कि उनकी अर्जी को कोर्ट क्यों सुने जबकि वो मामले में मुख्य पक्षकार नहीं है। सुब्रमण्यम ने कहा कि ये मेरा अधिकार (व्यक्तिगत पूजा का अधिकार है)। इसलिए मैंने याचिका दाखिल की है। पहले कुछ लोगों ने मेरे कपड़ों पर एतराज़ किया। अब उन्हें मेरी मौजूदगी पर ही एतराज़ है।

यूपी सरकार के तरफ से पेश हुए वकील तुषार मेहता ने भी कहा कि तीसरे पक्षों को इस मामले में नहीं सुना जाना चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि अयोध्या मुख्य मामले की सुनवाई के साथ स्वामी की याचिका पर सुनवाई कोर्ट नही करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्य पक्ष कारों के अलावा बाकी तीसरे पक्ष की ओर से दायर हस्तक्षेप अर्जियों को खारिज किया। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले में वो आगे से किसी तीसरे पक्ष की हस्तक्षेप याचिका को स्वीकार ना करे।

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने  शिया वक़्फ़ बोर्ड की याचिका पर  फिलहाल कुुुछ नहीं कहा। कोर्ट ने कहा कि कोई भी इस मामले में समझौता करने के लिए दबाव नहीं डाल सकते। सुप्रीम कोर्ट ने मसले के कोर्ट के बाहर सुलझाने के मुद्दे पर कहा कि वह कोर्ट के बाहर आपसी सेटलमेंट के लिये किसी को नियुक्त नही करने जा रहे है। लेकिन अगर कोई समझौता के लिए वार्ता कर रहा है तो वह उसे रोक भी नही रहे है। कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों पक्ष के वकील कोर्ट मे खड़े होकर कहते हैं कि हमने मामले को आपसी समझौते से सुलझा लिया है तो कोर्ट उसे रिकार्ड करेगा। लेकिन कोर्ट अपनी तरफ़ से नही कहेगा।

सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की तरफ से मामले संवैधानिक पीठ के समक्ष भेजने की भी बात कही गई। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले को हम संवैधानिक पीठ के समक्ष नही भेजेंगे। पहले आपको कोर्ट को इस मुद्दे पर संतुष्ट करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान हमें लगा कि मामले के हिस्से को संवैधानिक पीठ के समक्ष भेजा जाए तो उसे भेज सकते हैं। लेकिन पूरे मामले को हम संवैधानिक पीठ के समक्ष नही भेजेंगे।

अयोध्या विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान नया मोड़ तब आ गया जब मुस्लिम पक्ष की तरफ से संवैधानिक पीठ के 1994 के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए कहा गया।

बता दें कि 1994 में पांच जजों के पीठ ने राम जन्मभूमि में यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया था ताकि हिंदू पूजा कर सकें। पीठ ने यह भी कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का इंट्रीगल पार्ट नहीं है। वहीं 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला देते हुए एक तिहाई हिंदू, एक तिहाई मुस्लिम और एक तिहाई राम लला को दिया था। हाईकोर्ट ने संविधान पीठ के 1994 के फैसले पर भरोसा जताया था और हिंदुओं के अधिकार पर मान्यता दी थी।

मुस्लिम पक्षकार की ओर से पेश राजीव धवन ने कोर्ट से संविधान पीठ के 1994 के फैसले पर विचार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि उस आदेश ने मुस्लिमों के बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार को छीन लिया है।  चीफ जस्टिस ने कहा कि वो अगली सुनवाई के दिन 23 मार्च को इस मुद्दे पर अपने कानूनी पहलुओं को रखे।


    Warning: Invalid argument supplied for foreach() in /home/asiatimes/public_html/urdukhabrein/wp-content/themes/colormag/content-single.php on line 85

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *