बाबरी मस्जिद विवाद: 24वां दिन: बाहरी हिस्सा VHP द्वारा ज़बरदस्ती कब्ज़े में लिया गया – सुन्नी बोर्ड

Awais Ahmad

अयोध्या विवाद मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में 24 वें दिन की सुनवाई हुई। सुनवाई की शुरुआत करते हुए मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि जब देवता अपने-आपको प्रकट करते है तो किसी विशिष्ट रूप में प्रकट होते है और उसकी पवित्रता होती है। जस्टिस बोबडे ने पूछा कि क्या आप कह रहे हैं कि एक देवता का एक रूप होना चाहिए?

राजजीव धवन ने कहा कि हाँ, देवता का एक रूप होना चाहिए जिसको भी देवत माना जाए, भगवान का कोई रूप नहीं है, लेकिन एक देवता का एक रूप होना चाहिए। धवन ने कहा कि पहचान के उद्देश्य से एक सकारात्मक कार्य होना चाहिए, वह सकारात्मक अभिव्यक्ति के लिए दावा नहीं कर रहे हैं वह विश्वास के आधार पर दावा कर रहे हैं

राजीव धवन ने कहा मूर्ति की पूजा की हमेशा बाहर के चबूतरे पर होती थी 1949 में मंदिर के अंदर शिफ्ट किया जिसके बाद यह पूरी ज़मीन पर कब्ज़े की बात करने लगे हैं। राजीव धवन ने कहा कि आप मंदिर या मस्जिद की भूमि का अधिग्रहण कर सकते हैं, लेकिन आप एक देवता भूमि नहीं प्राप्त कर सकते हैं।

राजीव धवन ने आरोप लगाया कि रामजन्मभूमि न्यास पूरी ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाह रहा है और एक नया मन्दिर बनने की बात कर रहा है। राजीव धवन ने कहा कि 1949 तक विवादित ढांचे के बाहरी आंगन में पूजा की जाती थी, मूर्ति अंदरूनी हिस्से पर किसी भी तरह का दावा नही किया गया था, बाहरी हिस्सा VHP द्वारा ज़मर्दस्ती कब्ज़े में लिया गया था।

धवन ने कहा कि अगर 1885 से भी प्रारंभिक अधिकार की मांग को देंखे तो उन्होंने बाहरी आंगन की मांग की है क्योंकि मूर्ति बाहरी आंगन में रखी हुई थी। हिन्दू पक्ष के पूजा के अधिकार के दलील पर राजीव धवन ने कहा कि ‘पूजा के अधिकार पर जो दलीलें रखी गई हैं, उससे लगता है कि वेटिकन पर केवल ईसाइयों का और मक्का पर केवल मुसलमानों का हक है। पूरे जन्मस्थान को पूजा की जगह बताकर मुस्लिम पक्ष के दावे को कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है।

राजीव धवन ने जन्मस्थान की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि जन्मस्थान ‘ज्यूरिस्ट पर्सन’ यानी न्यायिक व्यक्ति नहीं हो सकता। राजीव धवन ने दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब जमीन यानी जन्मस्थान ही देवता हो गयी तो फिर किसी और का दावा ही नहीं बन सकता इसलिए जन्मस्थान को इस उद्देश्य से पार्टी बनाया गया है। दलील में यह भी कहा गया कि ‘जन्मस्थान’ को सदियों से विवादित स्थान पर होने की दलील देकर यह कोशिश की गई है कि उस पर न तो कानून के सिद्धांत ‘लॉ ऑफ लिमिटेशन’ लागू हो और न ही ‘एडवर्स पोजेशन’।  लॉ ऑफ लिमिटेशन के तहत किसी सिविल सूट में वाद दायर करने की समयसीमा तय होती है जबकि ‘एडवर्स पोजेशन’ का मतलब होता है प्रतिकूल कब्जा। प्रतिकूल कब्जे के मामले में असली मालिक के पास प्रॉपर्टी टाइटल हो सकता है, लेकिन कानून के जरिए वह इस तरह दावा करने का अधिकार खो देता है। राजीव धवन कल भी अपनी जिरह जारी रखेंगे।

 

कोर्ट रूम के बाहर इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मध्यस्थता के जरिये अयोध्या मामले की समाधान की कोशिश एक बार फिर शुरू हो सकती है। मुस्लिम पक्ष से सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और हिन्दू पक्ष से निर्वाणी अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मध्यस्थता पैनल को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि मध्यस्थता की प्रक्रिया को दोबार शुरू किया जाना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या केस की पैरवी कर रहे मुस्लिम और हिन्दू पक्षकारों में से किसी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि ऐसी कोई चिठ्ठी लिखी गयी है।
लेकिन दोपहर के बाद जस्टिस कलीफुल्ला कमेटी की तरफ से इस संबंध में संविधानपीठ को जब ज्ञापन भेजकर कोर्ट से दिशानिर्देश की मांग की गई तो सबको भरोसा हुआ और चर्चा तेज हो गयी। कोर्ट के बाहर मुस्लिम पक्षकारों इस तरफ के किसी प्रयास के खिलाफ दिखे तो हिन्दू पक्षकार भी निर्वाणी अखाड़े के ऐसे प्रयास के खिलाफ दिखे। हालांकि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और निर्वाणी अखाड़े ने सुनवाई रोकने की मांग नहीं की है। खैर, अयोध्या मामले की सुनवाई करने वाली संविधानपीठ को तय करना है कि मध्यस्थता कमिटि की इस मांग पर क्या फैसला करना है! गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले के समझौते से समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस कलीफुल्ला की अगुवाई में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था जिसमें धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर और मशहूर मध्यस्थ एडवोकेट श्रीराम पंचू शामिल थे। मध्यस्थता की कोशिशें 155 दिनों तक चली थीं लेकिन कोई हल नहीं निकला था।

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