47वें आईएचजीएफ-दिल्ली मेला स्प्रिंग2019 में विदेशीखरीदारों के स्वागत को तैयार इंडिया एक्सपो सेंटर ऐंड मार्ट

  ग्रेटर नोएडा (एशिया टाइम्स ) दुनिया का सबसे बड़ा हस्तशिल्प मेला, 47वें ‘आईएचजीएफ- दिल्ली मेला स्प्रिंग 2019′, ग्रेटर नोएडा के

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क्या ‘असतो मा सद्गमय’ धर्मनिरपेक्ष नहीं?

सुफियान अहमद  सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अब इस पर विचार करेगी कि केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों को संस्कृत में प्रार्थना

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विज़न 2030’  ने  सऊदी महिलाओं को कितना सशक्त किया ?

दुनिया के तेज़ी से बदलते सामाजिक,आर्थिक एवं राजनैतिक परिवेश में सऊदी अरब ने 2017 में विज़न 2030  के नाम से एक  बड़ा क़दम उठाने

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जब भी देश तबदीली की तरफ देखता है ,कांग्रेस की जानिब रुख करता है / जावेद अशरफ खान

नई दिल्ली : (एशिया टाइम्स ) वो अरबी भाषा में स्नातक है और क्रिकेट का अच्छा खिलाड़ी भी । वो

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दो बुरों में से कम बुरे को चुनना मुसलमानों की मजबूरी क्यों?

बीजेपी और कांग्रेस के संदर्भ में बुद्धिजीवियों की तरफ से यह जुमला अक्सर सुनने को मिलता है कि ‘दो बुरों

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अतहर  खान के  कांग्रेस में आने से  पूर्वांचल  एवं अवध क्षेत्र  में पार्टी काफी  मज़बूत  हुई है/जावेद अशरफ खान

नई दिल्ली : ( एशिया टाइम्स )  कांग्रेस नेता जावेद अशरफ खान ने मोहम्मद  अतहर  खान को कांग्रेस कमेटी  का

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वक़्फ तकिया चांदशाह मार्केट में हुए अवैध निर्माण के विरूद्ध जिला कलेक्टर को दिया ज्ञापन

जोधपुर, 01 फरवरी। वक़्फ तकिया चांदशाह अल्पसंख्यक मामलात विभाग के अधीन वक़्फ बोर्ड की सम्पत्ति है। मारवाड मुस्लिम एज्यूकेशनल एण्ड

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एशिया टाइम्स शुरू कर रहा है चुनावी परिचर्चा “ भारतीय मुस्लिम युवा और चुनावी राजनीति” अपने वोट की क़ीमत जानें

एशिया टाइम्स के प्रिय दर्शकों!  आज के समय में जैसी राजनीति की जा रही है, वो आप के सामने है

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एक रईस मुस्लिम का कला संग्रह जो राष्ट्रीय खजाना बना

हैदराबाद। चारमीनार व गोलकुंडा किले और जवाहरात व महलों वालों इस शहर में सालार जंग म्यूजियम की अलग शान है। यह प्राचीन  वस्तुओं (एंटीक) और कलाकृतियों का दुनिया का सबसेबड़ा एकल-संग्रह माना जाता है। आप जैसे ही पुराने शहर में दाखिल होते हैं मुसी नदी के किनारे बसे सालार जंग म्यूजियम पर आपकी नजर पड़ती है। यह इलाका अपने ऐतिहासिक स्मारकों, भव्य महलों, स्वादिष्ट व्यंजनों औरएक विशिष्ट संस्कृति के लिए मशहूर है। इस विराट संग्रहालय की चालीस गैलरियों में दर्शकों के अवलोकन के लिए राजशाही इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संग्रह उलपब्ध है। भारत के इस तीसरे सबसे बड़े संग्रहालय में विभिन्नअवधियों और स्थानों की बेजोड़ कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यह म्यूजियम वैसे तो एकल-संग्रह के लिए प्रसिद्ध है लेकिन वास्तव में यहां उस खानदान की तीन पीढ़ियों का संग्रह मौजूद है जो निजाम के प्रधानमंत्री थे। हैदाराबाद राज्य के तत्कालीन शासकोंको निजाम कहा जाता था। एक परिवार को सालार जंग का खिताब मिला हुआ था जो दुनिया भर से कलाकृतियों को जमा करने का धुनी था। यह परंपरा नवाब मीर तुराब अली खां, सालार जंगप्रथम से शुरू हुआ। उनके खजाने में रोम से 1876 में लायी गयी चकाचौंध करने वाली पत्थर की मूर्ति थी जो ‘वेल्ड रेबेका (बुर्कापोश रेबेका)’ नाम से जानी जाती है। मीर लईक अली खान सालार जंग द्वितीय की 26 साल की युवावस्था में मौत हो गयी थी। इस म्यूजियम की करीब 50 हजार कलाकृतियों में से अधिकतर नवाब मीर यूसुफ अली खान, सालारजंग तृतीय ने संगृहीत किया था। वह कलाकृतियों के पारखी थे। उन्होंने 1914 में निजाम के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपना पूरा जीवन दुनिया भर से कलाकृतियों के संग्रह के लिएसमर्पित कर दिया। चालीस सालों में उन्होंने बहुत से बहुमूल्य और नायाब कलाकृतियां का संग्रह किया। ये कलाकृतियां सालार जंग म्यूजियम के पोर्टल पर मौजूद हैं। इतिहास व कला प्रेमी और धरोहर के छात्र इन्हेंदेखकर दंग रह जाते हैं। यूसुफ अली खान ने कलाकृतियों के संग्रह के लिए यूरोप और विश्व के दूसरे हिस्सों का भ्रमण किया। बाद में दूसरे देशों के व्यापारी अपनी कलाकृतियां बेचने हैदराबाद आने लगे। नवाब एहतेराम अली खान सालार जंग परिवार के वंशज हैं और सालार जंग म्यूजियम बोर्ड के मेम्बर हैं। आईएएनएस से बातचीत में वे कहते हैं, ‘उन्होंने (यूसुफ ने) कभी अपने पैसे तड़क-भड़कपर खर्च नहीं किये, कभी बड़ी महफिल या गीत-संगीत के कार्यक्रमों में पैसे नहीं उड़ाये। उन्होंने अपने पैसे नायाब कलाकृतियों को खरीदने में लगाये और इस तरह कुछ समय के बाद उनके महलदीवान डेवढ़ी में हजारों चीजें जमा हो गयीं। उनपर अधिक से अधिक संग्रह का धुन सवार था और जब उन्हें लगा कि अब उनके महल में जगह नहीं बची है तो उन्होंने उन चीजों को दूसरे महल मेंरखने की योजना बनायी लेकिन उससे पहले ही वे चल बसे।’ यूसुफ अली खान ताउम्र कुंवारे रहे। उनकी मौत 1949 में हुई तो बहुमूल्य कलात्मक वस्तुओं और लाइब्रेरी के उनके विशाल संग्रह को दीवान डेवढ़ी में म्यूजम की शक्ल दी गयी ताकि सालार जंगका नाम दुनिया के प्रसिद्ध कला प्रेमी के रूप में लिया जाता रहे। इस संग्रहालय को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 16 दिसंबर, 1951 को जनता को समर्पित किया था। इस तरह सालार जंग म्यूजियम अस्तित्व में आया। इसकी देखरेख 1958 तक सालार जंगइस्टेट कमिटी के हाथ में थी। इसके बाद सालार जंग परिवार ने संपूर्ण संग्रह भारत सरकार को दान कर दिया। एहतेराम अली ने कहा कि ‘अगर इस संग्रह को शेयरधारकों में बांट दिया जाता तो आज न कल बेच दिये जाते या देश से बाहर भेज दिये जाते। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह संग्रह भारत सेबाहर न जाए और यहीं म्यूजियम में रहे ताकि इसे देखने के लिए रखा जा सके।’ एहतेराम अली के दादा नवाब तुराब अली खान यारजंग सालार जंग तृतीय के चचेरे भाई थे। तुराब यारजंग का ख्याल था कि इस संग्रह को देश को समर्पित कर वे कोई अहसान नहीं कर रहे बल्कि अपनी चीजों को ही महफूज कर रहे हैं क्योंकि इस बात का अंदाजा था कि इन्हें बचाये रखनेऔर इनकी देखरेख में काफी खर्च आएगा। उनकी राय थी कि इतना बड़ा काम भारत की सरकार ही कर सकती है। इस अमूल्य संग्रह को बिना शर्त दान किया गया था। एहतेराम अली खान कहते हैं, ‘दुुनिया में किसी ने ऐसा कारानामा नहीं किया है। इसके लिए इस परिवार को सम्मान मिलना चाहिए लेकिनबेहद बदकिस्मती की बात है कि उन्हें लगता है कि खानदान के एक मेम्बर को बोर्ड की मेम्बरशिप दे देना ही उन पर बड़ा अहसान है।’ सन 1961 में संसद के विधेयक द्वारा सालार जंग म्यूजियम को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया और इसके बाद से इसके मामलों की देखरेख एक बोर्ड करता है जिसके अध्यक्षराज्यपाल होते हैं। 1968 में इस संग्रह को मुसी नदी के बगल में बनायी गयी इमारत में स्थानांतरित कर दिया गया। सन 2000 में दो ब्लॉक बनाये गये, मीर तुराब अली खान (वेस्टर्न ब्लॉक) अरैीमीर लईक अली खान भवन (ईस्टर्न ब्लॉक)।

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