हरियाणा में महिलाओं पर बढ़ते हमले और ज़ोर पकड़ते डांस कल्चर में क्या कोई तालमेल है?

Ashraf Ali Bastavi

एशिया टाइम्स : (अशरफ अली बस्तवी की स्पेशल रिपोर्ट ) हरियाणा में महिलाओं पर बढ़ते हमले और ज़ोर पकड़ते डांस कल्चर में क्या कोई तालमेल है? सख्त कानून , और भी बहुत  कुछ कर लेने के बाद भी हालत बिगडती जा रही है तो  समय  आ गया है की  एक बार नए सिरे से अपने कामों का जाएजा लिया जाये और  इस सवाल का जवाब  तलाश  किया जाये  की हमारी कोशिश नाकाम क्यों है ?

कुछ सवाल जो  जवाब तलब हैं 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी  ने इस वर्ष विश्व  महिला दिवस राजस्थान के झुझुनो में मनाया , वहाँ एक पब्लिक मीटिंग में हरियाणा में लड़कियों की पैदाइश  में बढ़ोतरी पर हरियाणा को सम्मानित भी  किया .

लेकिन आप को याद होगा ठीक एक दिन पहले 7 मार्च को मीडिया में एक शर्मनाक रिपोर्ट आई  की हरियाणा  महिलाओं पर हमले के मामले में देश में अव्वल आया है .

लेकिन इस अवसर पर हरियाणा को सम्मानित करते समय मोदी चाहते तो एक लाइन की नसीहत भी कर देते , लेकिन ऐसा नहीं किया . यह भी हो सकता है उनकी नज़र रिपोर्ट पर न गई हो या उनके लोगों ने ऐसी नामाकूल रिपोर्ट जिस से उनको मतली आ सकती थी दूर रखना मुनासिब समझा  हो .

उन्हों ने इस अवसर पर  एक अच्छी बात यह कही की अगर कोई सास चाह ले की घर में बेटी पैदा होगी तो यह समस्या बाकी नहीं रहेगी , ठीक बात है इस में घर की बड़ी बूढियों का ही अहम् रोल  होता है जो बेटी का पता चलते है गर्भ पात कराने पर बहु और बेटे को उकसाती हैं . इसी तरह दहेज प्रथा का भी मामला है इस में भी महिलाएं ही महिलाओं को तंग करती हैं, अगर सास यह ख्याल कर ले की मैं भी कभी बहु थी तो ऐसे हालात न खराब हों .

रही बात हरियाणा में महिलाओं के साथ बदसलूकी की तो इसके  सामाजिक और सांस्क्रतिक कारणों का जायजा लेने की ज़रुरत है .

वैसे तो डांस कल्चर हरियाणा में बहुत पहले से आम है ,लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हरियाणा में कल्चरल प्रोग्राम के नाम पर यह बुरी तरह फैला है , गली गली डांस के स्टेज सज रहे हैं , जिन में 12 से 70 वर्ष उम्र की नस्ल साथ बैठ कर फूहड़ता का नज़ारा करते हैं .

अब यह बताएं ऐसे प्रोग्रामों से उठने  वाले लोग यहाँ  से क्या सबक लेकर उठते हैं ? अब ऐसे प्रदेश में महिलाओं पर हमले नहीं होंगे तो और क्या होंगे .

हरियाणा की नौजवान नस्ल को यह मालूम ही नहीं की उसे इसी भूल  भुलैया के जंगल में गुमराह किया जा रहा है .

बेहतर होता की  जगह जगह नौजवानों के करियर गाइडेंस सेंटर के प्रोग्राम किये जाते , नौजवान अपने उज्जवल भविष्य की फ़िक्र करते , बड़ी उम्र के लोगों को उनकी समाजी जिम्मे दारियां याद दिलाई जातीं और बुज़ुर्ग  नई नसल और  समाज को दिशा देने का काम करते .

इसके बजाये बेरोजगार नौजवानों की शकल में  भेडियों की फ़ौज तैयार की जा रही है  जो पांच साल तक किसी डांसर के ठुमके पर झूमे और जब चुनाव का एलान हो तो फिर यही भीड़ चंद सिक्कों के लिए  अपने हाथों में झन्डा थामे खड़ीं रहे . यह रुझान देश हित ,समाज हित,महिला हित अर्थात  किसी हित में नहीं है

यह बात महिला  सुरक्षा के लिए स्कीमें बनाने वालों को  सोचना होगा की वो कैसी नस्ल देखना चाहते हैं .

आखिर क्या वजह है की दिल्ली की स्थिथि  निर्भया 2012 के बाद अभी तक नहीं बदली  दिल्ली  महिलाओं के लिए डेंजर जोन आज भी है , कानून तो हमने सख्त कर लिया है फिर भी ऐसा क्यों है की महिलाओं के खिलाफ  क्राइम  नहीं कम हो रहे है .

कमी कहाँ है , महिलाओं की आजादी को लेकर सड़कों पर कैंडल मार्च करने वाली सोसाइटी को भी अपनी मांगों की लिस्ट में संशोधन करना होगा   .ऐसे मांगें तर्क करनी होगी   जो महिला उत्पीडन की वजह बनती  हैं . क्या सिविल सोसाइटी , महिल समाज , देश के नेता , सियासी पार्टियां , इस मुद्दे पर मिल बैठ कर सोचने के लिए कोई समय  निकाल रहे हैं ?


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