युवा पत्रकार शरीफ़ूल पर पुलिस ने लाठियाँ बरसायीं

Ashraf Ali Bastavi

ये शरीफ़ूल हैं, एक युवा पत्रकार जो बंगाल के रहने वाले हैं और दिल्ली में रहते हैं। यहीं पर छात्रों व युवाओं की एक अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका The Companion के लिए काम करते हैं। बहुत ही शान्त स्वभाव है इनका और अपने काम के प्रति समर्पित हैं। आज Janpath, Road 4, New Delhi में #SSCScam के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन था जिसे cover करने शरीफ़ूल गए थे।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज की और प्रदर्शनकारियों के बहाने इस युवा पत्रकार पर भी लाठियाँ चलायी गयीं। लोकतंत्र को बचाने के लिए इस युवा पत्रकार पर भी लाठी चलीं ताकि लोकतंत्र में शांति बनी रहे।
मध्यमवर्गीय परिवार का ये युवा पत्रकार पुलिस की लाठीचार्ज में घायल हो गया। कई जगह चोटें आयी हैं और मोबाइल टूट गया।
विरोध प्रदर्शनों में पत्रकारों का घायल होना तो आम बात है मगर विगत कुछ वर्षों में सुनियोजित तरीक़े से पत्रकारों पर हमला होना ये संदेह पैदा करता है कि अब देश में वही मीडिया हाउस सुरक्षित है जो पूँजीपतियों द्वारा पोषित है।
आम पत्रकारों की सुरक्षा दिन प्रतिदिन ख़तरे में पड़ती जा रही है। अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पूँजीवादी स्तंभ बन चुका है जिसके छत्र छाया में ही पत्रकार सुरक्षित है।
जो भी सरकार विरोधी नीतियों को cover करेगा उसपर जानबूझ कर लाठियाँ बरसायी जायेंगीं। तुम क्या कर लोगे आर्थिक रूप से कमज़ोर पत्रकारों? तुम्हारी रोटी कपड़ों की आवाज़ें आस्था की आवाज़ों में दबा दी जायेंगीं, तुम्हारे रोज़गार के मुद्दों को राष्ट्रवाद के मुद्दे निगल जायेंगें, तुम्हारी सरकार विरोधी ध्वनि मंदिर मस्जिद के शोर में गुम हो जायेंगीं।
ये सरकारें शरीफ़ूल और ऐसे सैंकड़ों पत्रकारों पर लाठियाँ तो बरसा सकती हैं मगर इनके हौसलों को पस्त नहीं कर सकतीं, इन्हें डरा नहीं सकतीं, इन्हें ख़ामोश नहीं कर सकतीं। ये चंद पत्रकार हैं जिनकी क़लम और जिनके हौसले बदलती सरकारों के साथ अपना रूख नहीं बदलते, अपने ज़मीर का सौदा नहीं करते। ये उन पूँजीवादी पत्रकारों की तरह नहीं हैं जिनके लिए बशीर बद्र ने कहा था:
“ये ज़ुबाँ किसी ने ख़रीद ली, ये क़लम किसी का ग़ुलाम है”
आइए, शरीफ़ूल के साथ खड़े होते हैं उसके हौसले को नयी उड़ान देने के लिए ताकि फ़ासिवादी लाठियों का ग़ुरूर टूट जाए। इस युवा पत्रकार से कहें कि शरीफ़ूल, तुम अकेले नहीं हो, हम सब तुम्हारे साथ हैं मज़लूमों की आवाज़ बनने और अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए।
मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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