एक छात्र का मर जाना….एक राष्ट्र का मर जाना…?

विश्वविद्यालय चलाने वाले लोग भी अपनी सत्ता लोलुपता के कारण राजनेताओं पर कितना निर्भर रहते है और अपने शैक्षणिक धर्म की भी धज्जियाँ उड़ा देने से भी नहीं हिचकते।

एशिया टाइम्स

दिल्ली:- हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दलित स्कॉलर रोहित वेमुला ने आत्महत्या नहीं की बल्कि व्यवस्था ने उसको मौत के घाट उतार दिया। इस व्यवस्था में पढ़े लिखे विद्वान और देश के नवनिर्माण के दम्भ भरने वाले लोग थे। जिसे उसकी पीड़ा अब तक न सुनाई पड़ रही है न दिखाई दे रही है। रोहित की आत्महत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ये सवाल हमारी दमघोंटू शिक्षा व्यवस्था से है ,शिक्षा तंत्र के कर्ताधर्ताओं और तथाकथित कुलीन मानसिकता में पल रहे समाज से भी । शायद ये सवाल रोहित ने अपने अंतिम पत्र में सबसे की है, हमसब से।

उसका अंतिम पत्र इतना मार्मिक हैं कि कोई भी संवेदनशील समाज दहल जायेगा, रो पड़ेगा। उसके पत्र में आक्रोश नहीं है किसी को अपराधी साबित करने की कोशिश नहीं है,कोई बदले की भावना नहीं है। उसने अपने दोस्तों को सुभकामना दी है तो दुश्मनों से भी कोई गिला-शिकवा नहीं किया, उनसे भी नहीं जिसने उसकी पूरी ज़िन्दगी बरबाद कर दी । उसने अपने अंतिम पत्र में सिर्फ एक दलित छात्र की पीड़ा को दर्शाया है,एक असीम पीड़ा जो उसने अपने जन्म के साथ ही सहा था और उस पीड़ा को वह देश के उस प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय तक सहा।

उसके शब्दों में ‘ उसके दलित परिवार में जन्म एक घातक दुर्घटना थी’। वह अपने उस पीड़ा से बाहर नहीं निकल पाया या हमारी क्रूर व्यवस्था ने उसे इस अदम्य पीड़ा से बाहर नहीं निकलने दिया। रोहित और उसके चार साथियों को शायद इस वजह से निलंबित कर दिया गया क्यूंकि वे हर अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ लड़ते रहे। चाहे शिक्षा के सैकड़ों सवाल हो,याक़ूब मेमन की फांसी या मुज़फ्फरनगर और दादरी हो या अन्य दबे कुचले शोषित पीड़ितो की आवाज़ हो। शिक्षण संस्थाओं में दलितों और अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म और जातीय भेदभाव के खिलाफ मुखर हो कर उसने आवाज़ उठाई। लेकिन शैक्षणिक संस्थाओं की ‘व्यवस्थित गुंडागर्दी’ और फासीवादी मानसिकता ने उसे मार दिया।

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ये वही व्यवस्थित गुंडे हैं जो कभी उज्जैन में प्रोफेसर की हत्या करते हैं तो मोदी के खिलाफ टिप्पणी पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश राय की पिटाई, कैंटीन का मुद्दा उठाने पर छात्रा पर भी हमला करने पर बाज़ नहीं आते। विरोधी छात्र संगठनों के साथ गुंडागर्दी की तो एक लम्बी फेहरिस्त है। शिक्षण संस्थान दरअसल कई वैचारिक संघर्षों की प्रयोगशाला होती हैं। यहाँ दलित- वामपंथ और दक्षिणपंथ में टकराव का एक पुराना इतिहास रहा है। ये टकराव कभी कभी हिंसक और क्रूर हो जाती है जहाँ संवाद की जगह केवल हिंसा और फासीवाद रह जाता है। रोहित भी इसी सामूहिक फासीवाद का शिकार हुआ। जिसमे उसके अपने विश्वविद्यालय के तथाकथित छात्र नेता भी थे (जिस से रोज़ उसकी वैचारिक लड़ाई होती थी), उनके प्रोफेसर व कुलपति भी थे और देश की सत्ता तंत्र में बैठे राजनेता भी। रोहित इनसब के साथ अकेला लड़ रहा था। अपने विश्वविद्यालय से निलंबन और सामाजिक बहिष्कार पर कुलपति को पत्र लिखते हुए कहा था कि ‘ प्लीज़, जब दलित छात्रों का एडमिशन हो रहा हो तब ही सभी छात्रों को दस मिलीग्राम सोडियम अज़ाइड दे दिया जाए. इस चेतावनी के साथ कि जब भी उनको अंबेडकर को पढ़ने का मन करे तो ये खा लें. सभी दलित छात्रों के कमरे में एक अच्छी रस्सी की व्यवस्था कराएं और इसमें आपके साथी मुख्य वार्डन की मदद ले लें. कुलपति को ये चिट्ठी रोहित ने अपने मौत से एक महीना पहले लिखी थी फिर भी कुलपति अप्पा राव को कोई फर्क नहीं पड़ा और अब तक कोई कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

संघ का शिक्षण संस्थानों में दखल पहले भी होता रहा है लेकिन भाजपा के सत्ता में आते ही शिक्षण संस्थाओं का ‘अकादमिक स्वायत्ता’ खतरे में पड़ गया है। रोहित के मामले में भी यही दिखा। जब संघ की छात्र ईकाई अखिल भारतीय विधार्थी परिषद ने केंद्रीय मंत्री बंदारु दत्तत्रेय को दलित छात्रों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की तो मंत्री महोदय ने अगस्त 2015 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिखते हुए कहा कि विश्वविद्यालय कैंपस जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्र विरोधी राजनीति का अड्डा बनता जा रहा है. दरअसल बंदारु दत्तत्रेय के इस पत्र ने ही रोहित और उनके साथियों के लिए मुश्किलात पैदा कर दिए थे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने इस मुद्दे पर जिस तरह से गुपचुप कार्रवाई करवाई उसने इसके संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है। मंत्रालय की ओर से विश्वविद्याल को करीब पांच पत्र लिखे गए और ‘वीआईपी के पत्र ‘ पर जवाब माँगा गया।

दरअसल मामला जिस असंवेदनशील तरीके से बढ़ाये जा रहे थे उसने कई सवालों को जन्म दिया है। विश्वविद्यालय चलाने वाले लोग भी अपनी सत्ता लोलुपता के कारण राजनेताओं पर कितना निर्भर रहते है और अपने शैक्षणिक धर्म की भी धज्जियाँ उड़ा देने से भी नहीं हिचकते। शायद यही कारण है कि पिछले 10 सालों में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में जातीय भेदभाव और और दम घोंटू व्यवस्था से आज़िज़ आकर 11 छात्रों ने आत्महत्या की या वो इस ‘ अकादमिक क़त्लगाह’ के शिकार हुए।

वर्ष 2006 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मंत्रालय, भारत शासन ने ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साईंसेस (AIIMS), नयी दिल्ली, के दलित और आदिवासी विद्यार्थियों द्वारा संस्थान में व्याप्त जाति भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए तत्कालीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो एस के थोरात के नेतृत्व में एक 3 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 5 मई 2007 को सौंपी जिसमे न सिर्फ देश के इस ख्याति प्राप्त शिक्षण संस्था के दलित और आदिवासी विद्यार्थियों के प्रति जाति विद्वेष की भयावह दास्तान सामने आई बल्कि संस्थान के कुछ अनुसूचित जाति और जनजाति के शिक्षको की भी व्यथा प्रकट हुई. परन्तु इसके बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया. इस रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर न तो कार्रवाही की गई और न ही किसी दोषी को दण्डित किया गया। पिछली सरकारों की तरह इसमें भी जांच कमिटी बनाई गई है पर अब भी शिक्षा और छात्रों के सवाल शायद कैंपस के इन्ही फंदों के सहारे झूल रहे हैं।

शारिक़ अंसर

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