नवेद हामिद ने किया मोदी को ट्वीट पुछा: NCPUL 8 माह से मृत  है  NCMEI 3 साल से बिना चेयरमैन के और NMCME में 4 साल से कोई मीटिंग नहीं हुई , क्या यही है ‘सब का साथ सबका विकास’ ?

AIMMM president Navid Hamid asked PM Modi in a tweet: Why NCPUL is dead from 8 months and NCMEI is without Chairman for 3 years?

Ashraf Ali Bastavi

नई दिल्ली : (एशिया टाइम्स ) भारतीय मुसलमानों की उचच बॉडी ‘आल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत’ के प्रेसिडेंट नवेद हामिद ने , मोदी सरकार की लापरवाही को निशाना बनाते हुए कल दो ट्वीट किया है .जिस में अल्पसंख्यकों से सम्बंधित  तीन संस्थानों का ज़िक्र किया है .

उन्हों ने लिखा ‘यह न सिर्फ आश्चर्य जनक बल्कि अफसोसजनक है की  मानवसंसाधन विकास  मंत्रालय के पास National Council for Promotion of Urdu Language(NCPUL ) के  पुनर्गठन का समय नहीं है . यह पिछले 8 माह से  पूरी तौर पर मृत है , उन्हों  ने प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी और मानवसंसाधन मंत्री  प्रकाश जावडेकर को टैग करते  हुए पुछा   है कि यह जानबूझकर या अनजाने में है .

दूसरे ट्वीट में उन्हों ने दो संस्थानों (NCMEI ) और (NMCME)  के बारे में सवाल किया है

“ दुर्भाग्यपूर्ण है कि @HRDMinistry  ने  लगता संस्थानों को मृत अवस्था में पहुंचा दिया है “कहाँ  है ‘सब का साथ सब का विकास” अल्पसंख्यकों में एजुकेशनल एम्पोवेर्मेंट के लिए काम करने वाले  एक संसथान  National Commission for Minority Educational Institutions (NCMEI)को 3 साल से चेयरमैन के बिना  छोड़ रखा है  और (NMCME) National Monitoring Committee for Minorities’ Education में  4 साल कोई मीटिंग तक नहीं हुई है “.

सरकार इन दोनों संस्थानों को सुचारू रूप से चलाने के लिए पहल करे , नवेद हामिद के ट्वीट से मामला सामने आने के बाद सरकार के एक्शन का इंतज़ार है . अब मामला सरकार के पाले में है की वह ‘ सब का साथ सब का विकास  का नारा’ सच साबित करे.

National Council for Promotion of Urdu Language(NCPUL )

उर्दू भाषा के संवर्धन के लिए राष्ट्रीय परिषद (एनसीपीयूएल) मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी)उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संस्था है एनसीपीयूएल उर्दूभाषा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है एनसीपीयूएल उर्दू भाषा और उर्दू शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्राधिकरण निगरानी प्रमुख है.

NMCME अल्प्संख्यकों के शक्षिक विकास की  निगरानी कमीटी

इस की स्थापना 2005 में हुई थी इसका चेयरमैन शिक्षा मंत्री होता है , मोदी सरकार आने के बाद से इस की कोई मीटिंग नहीं हुई है , जबकि सरकार ने इसके कुछ नए मेम्बर बनाये हैं .

अल्पसंख्यकों शक्षिक  स्कीमो के जमीनी सतह पर लागू करना 

अल्पसंख्यकों  की शिक्षा की आवश्यकताओं का पता लगाना  रीजन और जिलावार 

अल्पसंख्यकों की व्यावसायिक शिक्षा और स्किल के विकास के लिए कार्य करना 

लड़कियों की  शिक्षा

उर्दू भाषा के प्रमोशन और अल्पसंख्यकों में इंग्लिश भाषा के द्वारा उनकी छमता बढ़ाना 

 National Commission for Minority Educational Institutions (NCMEI)

पार्लियामेंट से पास किये गए कानून से पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह  के कार्यकाल में बना था , जस्टिस सुहैल एजाज़ सिद्दीकी  इस के दो बार चेयरमैन रहे , उनके रिटायरमेंट के बाद 3 साल से से कोई चेयरमैन नहीं है , और इसके बाकी दो मेम्बर भी रिटायर हो गये हैं .

  1. वर्ष 2004 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग की स्थापना की गई थी। आयोग की स्थापना करने के लिए नवंबर 2004 में सरकार एक अध्यादेश लायी। इसके बाद दिसंबर 2004 में संसद में एक विधेयक लाया गया और दोनों सदनों में विधेयक को पारित किया गया। जनवरी 2005 में एन.सी.एम.ई.आई. अधिनियम को अधिसूचित किया गया था। प्रधानमंत्री के नए 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत अल्पसंख्यकों के कल्याण हेतु लक्ष्यि निश्चित गए जिन्हें एक विशिष्ट समय सीमा में पूरा करना होता है। उच्च प्राथमिकता के आधार पर शिक्षा के लिए अवसर में बढ़ोत्तरी की जाती है।
  2. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्था की स्थापना एवं संचालन करने के लिए तथा उनके अधिकारों के वंचन अथवा उल्लंघन के संबंध में विशिष्ट शिकायतों पर विचार करने के लिये आयोग अधिकृत है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 30 में प्रतिष्ठापित है जिसमें कहा गया है कि “किसी भी धर्म अथवा भाषा के सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्था ओं की स्थापना करने एवं संचालन करने का अधिकार होगा”।
  3. इस प्रकार, अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं संचालन करने के लिए तथा उनके अधिकारों के वंचन एवं उल्लंघन के संबंध में किसी भी शिकायत पर आयोग विचार कर सकता है।
  4. यह आयोग अर्ध-न्यायिक निकाय है और सिविल न्यायालय की शक्तियों से संपन्न है। इसकी अध्यक्षता अध्यक्ष द्वारा की जाती है जो उच्च न्या यालय में न्यायधीश रहा हो। केंद्र सरकार द्वारा इसके तीन सदस्य् नामित किए जाते हैं। आयोग की 3 भूमिकाएं होती हैं जैसे न्यायिक कार्य (फंक्शन), परामर्श कार्य एवं सिफारिशी शक्तियां ।
  5. एक विश्वविद्यालय के लिए अल्पसंख्यंक शैक्षणिक संस्था की सम्बद्धता के संबंध में आयोग का निर्णय अंतिम होगा।
  6. आयोग को प्रेषित किसी भी प्रश्न पर, जो अल्पसंख्यकों की शिक्षा से संबंधित हो, आयोग केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकारों को परामर्श देने के लिए अधिकृत है।
  7. आयोग अनुच्छेद 30 में निहित अल्पसंख्यक समुदाय को उनके शैक्षिणिक अधिकारों से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से वंचन संबंधी किसी भी मामले में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों को सिफारिश कर सकता है।
  8. आयोग के सशक्तिकरण ने अल्पंसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को उनकी शिकायतों को उजागर करने एवं तत्परता से राहत पाने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है। याचिका/शिकायत संबंधी मामलों के अधीन राज्य सरकारों द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन.ओ.सी.) नहीं जारी करना, अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन.ओ.सी.) को जारी करने में विलम्ब/अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं के लिए अल्पसंख्यक दर्जा (स्टेटस) जारी करने में अस्वीकृति/विलंब, अल्पसंख्यकों को नए महाविद्यालयों/विद्यालयों/संस्थानों को खोलने की अनुमति न देना, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं में अतिरिक्त पाठ्यक्रम की अनुमति न देना, सहायता अनुदान की अस्वी‍कृति, वित्तीय सहायता देने हेतु अस्वीकृति, संस्थान के विद्यार्थियों की संख्या मॆं वृद्धि होने के बावजूद अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षकों के नए पदों के सृजन की अनुमति देने से इनकार करना, शिक्षकों की नियुक्ति का अनुमोदन देने से इनकार करना, सरकारी विद्या‍लय के शिक्षकों की तुलना में अल्पसंख्यक विद्यालयों के शिक्षकों के वेतनमान में असमानता, सरकारी संस्थाओं के बराबर अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को शिक्षण सहायता और अथवा अन्य, सुविधाएं जैसे कंप्यूटर्स, पुस्तकालय, प्रयोगशाला इत्या्दि देने से इनकार करना, उर्दू विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए सभी विषयों में उर्दू की पुस्तककों की अनुपलब्धता, उर्दू जानने वाले शिक्षकों की नियुक्ति नहीं करना, मदरसा कर्मचारियों को अपर्याप्त भुगतान, मदरसा को अनुदान जारी न करना, अल्पसंख्यक विद्यालयों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान न करना, अल्प‍संख्यक संस्थान विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों आदि को सर्वशिक्षा अभियान का विस्तार देने से वंचित रखना इत्यादि मामले आते हैं ।

 

 

 

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