पाकिस्तान की ज़ैनब के नाम ख़त

नन्ही परी! एक ये दुनिया है जहां गीति पे रेखाएं खिंची हैं, तुम उस पार तड़पी हो, में इस पार तड़पता हूँ।

एशिया टाइम्स

मेरी भांजी! अज़ीज़ अज़ जान प्यारी गुड़िया ज़ैनब!

नेक तमन्नाएं! ये लिखते लिखते रुक गया कि तुम्हारी तमन्नाओं का किस क़दर ख़ून हुआ है। मुझे उम्मीद है तुम उस जगह होगी, जहां तुम अपनी जैसी मासूम हमजोलियों के हमराह, तितली बनी, रंग बिखेर रही होगी। वहां लातादाद ख़ूबसूरत और मासूम बच्चों ने, जिन्हें शाम, इराक़, फ़लस्तीन, रोहिंगिया और अफ़्ग़ानिस्तान में ज़ुल्म का शिकार बनाकर हलाक कर दिया गया, तुम्हारा ख़ुश-दिली से इस्तिक़बाल किया होगा। तुम उस संसार में अब कोई दर्द नहीं पाओ गी!

अच्छा क्या तुम वहां चली गईं; इस करीह सूरत-ए-आलम से हमेशा बाकी रहने वाली दुनिया की जानिब रुख किया, जहां तुम्हें कोई तकलीफ नहीं पहुंचाएगा; ग़लीज़ निगाह ना डालेगा। वही मुक़ाम जन्नत है, जहां महफ़ूज़ हो, ख़ुश हो।

नन्ही परी! एक ये दुनिया है जहां गीति पे रेखाएं खिंची हैं, तुम उस पार तड़पी हो, में इस पार तड़पता हूँ। एक ये दुनिया कि हम दूर हो के भी जुड़े हैं। मैंने तुम्हारी दिल-दोज़ कहानी अख़बारों के पन्नों पर पढ़ी, सोशल मीडीया पर देखी। ये साइबर वर्ल्ड है कि हम दूर होकर भी बाख़बर हैं।

ज़ैनब! तुम्हारी उम्र की मेरी भी भांजियां हैं, जो मुझे बेहद अज़ीज़ हैं; वो मेरे पास होती हैं, तो उन्हें कहानियां सुनाता हूँ। उनके साथ खेलता हूँ। वो बहुत ख़ुश होती हैं। तुम भी उन ही की तरह हो , इस लिए तुम भी मेरी भांजी हुईं ।

सो मेरी भांजी ज़ैनब! गावं से अब मैं दिल्ली चला आया; और अब मेरी उनसे भी कई सालों से मुलाक़ात नहीं हो सकी; लेकिन तुम्हें बताउं, कि वो रोज़ाना फ़ोन पर मुझसे कहानी सुनती हैं। मुझे उनकी अदाऐं बहुत अच्छी लगती हैं, जिस तरह तुम्हारी अम्मी और अब्बू को तुम्हारी प्यारी और मासूम अदाऐं भाती थीं ।

तुम्हारी ख़बर सुनकर मैं निराश बैठा था, कि मेरी भांजियों ने फ़ोन किया और ज़िद करने लगीं कि मामा! कोई कहानी सनाईए; मैंने सोचा, तोता मैना, ख़रगोश और चीते की कहानी सुनाने के बजाय, उनसे तुम्हारी कहानी कह डालूं, लेकिन मुझमें हिम्मत ना हुई ; भला इतनी नन्हियों को मैं तुम्हारी कहानी क्यूँ-कर सुनाता; तुम्हारी दास्तान सुनकर तो शैतान भी शर्मसार हो जाएगा। सो जैसे-तैसे करके, उन्हें कुछ फ़र्ज़ी क़िस्से सुनाए, लेकिन मुझ बदनसीब से तुम्हारी कहानी चिपकी रही।

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आज मैंने अपनी भांजियों को फ़ोन नहीं किया, सोचा तुम्ही से बात करता हूँ,उन्हीं की तरह तुम्हें आज कहानियां सुनाता हूँ, तो सुनो एक कहानी। हमारे हिंदुस्तान की आप-बीती। इस की एक रियासत है गुजरात। दो हज़ार दो में वहां फ़साद हुआ था। वहां एक दुखियारी रहती है , बिल्क़ीस। गुजरात के फ़सादाद से 6 माह क़बल उस की शादी हुई थी। उस फसाद में उस के चौदह रिश्तेदारों को क़तल कर दिया गया; बिल्क़ीस की इस्मत को यूं तार-तार किया गया, कि उस का पाँच माह का गर्भ भी नुकसान हो गया। लाशों के ढेर में पड़ी जब वो होश में आई तो मुकम्मल तौर पे बे-लिबास थी। बिल्क़ीस नहीं, इन्सानियत बरहना थी। उसे गुजरात के थानों से ये जवाब मिला कि हम रिपोर्ट बाद में लिखेंगे, पहले अस्पताल में मुआइना होगा और वहां ज़हरीली सोई लगादी जाएगी, तो कहाँ रिपोर्ट लिखवाओगी? जाओ कहीं और जा बसो। बिल्क़ीस की एफ़ आई आर सुप्रीमकोर्ट के हुक्म से, यहां की सी बी आई ने लिखी थी।

सुनो मेरी प्यारी गुडिया ! दूसरी कहानी भी आज ही सुन लो । मुझे दिल्ली में हुए दो हज़ार बारह के निर्भया की कहानी याद आ गई, जिसे ऐसे ही दिसंबर की ठिठुरती रात में कुछ ज़लील लोगों ने अपनी हवस का निशाना बना के मार डाला था।

निर्भया भी तुम्हारी तरह ;पढ़ लिख कर डाक्टर बनना चाहती थी , मगर जैसे तुम्हारा ख़ाब शर्मिंदा ताबीर न हुआ , उस का सपना भी पूरा नहीं हो सका था ।उस सर्द रात में उस के साथ जो हुआ , उस की कहानी बहुत ग़मगीन कर देने वाली है ; उस दिन निर्भया की चीख़ इस क़द्र-दिल दोज़ थी कि पूरा हिंदुस्तान लरज़ उठा था।

मेरी बच्ची! उस के बाद इस दर्दनाक और शर्मनाक वाक़ए से बेचैन हज़ारों लड़कीयां और लड़के अपने हाथों में कैंडल लिए दिल्ली की सड़कों पर निकल आए थे; जिस तरह आज तुम्हारे दर्द को लेकर कराची से ख़ैबर पख्तून तक हर तरफ बेचैनी दिखाई दे रही है ।

जिस तरह से तुम पर बीते ज़ुल्म ने हर दर्दमंद को तड़पा दिया है, वैसे ही हमारे यहां भी उस हादसे ने पूरे सियासी और समाजी माहौल को मुंतशिर कर दिया था। लोक सभा और राज्य सभा की ख़वातीन मेम्बेर्स ने, ऐवान को सर पर उठा लिया था; सोशल मीडीया, टीवी हो या अख़बार, उसी ख़बर से अट गए थे; हकूमत-ए-हिन्द ने दिल्ली से सिंगापुर तक, बेहतरीन अस्पताल में उस का ईलाज कराया , लेकिन वो बच ना सकी; प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ख़ुद उस का जनाज़ा लेने एयरपोर्ट पहुंचे थे।

निर्भया के लिए विषेश अदालत बनाई गई थी, जिसने हर-रोज़ समाअत करके मुजरिमों को फांसी की सज़ा तजवीज़ की, जिसे दिल्ली की हाईकोर्ट ने बहाल रखा और आख़िरी अदालत के तीन फ़ाज़िल जजों ने फांसी की सज़ा पर मुहर लगा कर मुजरिमों को साढे़ पाँच साल में सज़ा दे दी। निर्भया तो लौट ना सकी, लेकिन माता पिता के दर्द का कुछ तो मुदावा हुआ। तारीख़ में ये भी पहली बार हुआ कि था हमारी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सुनकर जनता ने तालियाँ बजाई थीं।

प्यारी गुड़िया! बिल्क़ीस के साथ जो कुछ हुआ, उस के दर्द को तुम जैसी कोई दुखियारी समझ सकती है। तुम्हारे और निर्भया के बारे में तो फिर भी सब लिख बोल रहे हैं, लेकिन बिल्क़ीस दुखियारी के बारे में बहुत कम लोगों ने लिखा। हाल ही में 41 क़ातिलों को हाईकोर्ट से उम्रकैद की सज़ा दी गई है, लेकिन उन पाँच पुलिस वालों को छोड़ दिया गया, जो ख़ुद उस ख़ूनी ड्रामे में शरीक थे, क्या ऐसे ही मुहाफ़िज़ होते हैं? उनके साथ सफेद कोट पहने हुए दो डाक्टर भी थे, जिन्हें मसीहा कहते शर्म आती है। उनके बारे में हाईकोर्ट ने दुबारा से सी बी आई को जांच करने का हुक्म दिया है।

प्यारी गुड़िया! अब तुमसे कैसे कहूं कि इस मक्कार दुनिया में लोग हादसों और सानेहों को भी मज़हब से जोड़ कर देखते हैं। ऐसे में तुमने इस रियाकार दुनिया को ख़ैराबाद कह दिया तो अच्छा ही किया।

तुम वहां हो, तो गुजरात फ़साद में हवस की भेंट चढ़ जाने वाली बच्चीयों से मुलाक़ात करना, वहां तो पड़ोस भी कोई नहीं कि तुम एक ही घर की मकीन होगी। दर्द के मारों की जन्नत में।

मेरे पास लिखने को और किया है, फिर ये भी तुम तक क्यों पहुँचेगा! इजाज़त दो।

ख़ुदा-हाफ़िज़!
तुम्हारा दुखी मामूं
मुहम्मद अलमुल्लाह
नई दिल्ली, भारत

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