हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो

कलीमुल हफ़ीज़

हिन्दुस्तान एक प्राचीन देश है। उसकी अपनी एक संस्कृति है। हज़ारों साल से यह देश अपनी विशाल-ह्रदयता, उच्च-मानसिकता और मेहमान-नवाज़ी के लिये जाना जाता था। मुसलमानों के आने से पहले यहाँ ऊँच-नीच का भेदभाव और छूत-छात की एक आम वबा थी, जिसमें मुसलमानों के आने से काफ़ी हद तक कमी आ गई है। मुस्लिम दौरे-हुकूमत में यहाँ की ग़ैर-मुस्लिम आबादी को मज़हबी तौर पर कभी कोई परेशानी नहीं हुई, पाँच हज़ार साल से पहले ग़ैर-मुस्लिम इबादतगाहें और आठ सौ साला मुस्लिम दौरे-हुकूमत के बावजूद आज भी मुसलमानों की सिर्फ़ 15% आबादी इसका सुबूत है।


हिन्दुस्तान न केवल भाईचारे के लिये जाना जाता था बल्कि यहाँ के इल्म और तहक़ीक़ को भी दुनिया सराहती थी। ब्रिटिश राज में भी मुल्क ने इन्सानी भाईचारे की एक छाप छोड़ी थी। आज़ादी की जंग में तो मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम भाइयों ने मुहब्बत, क़ुर्बानी और एकता की जो मिसालें क़ायम कीं वो दुनिया भर के लिये रास्ते का चिराग़ और हमारी पाठ्य पुस्तकों का हिस्सा बनीं।

आज़ादी के बाद हज़ारों साम्प्रदायिक दंगों के बावजूद, जिसमें कुल मिलाकर लाखों इन्सान मारे गए, मुल्क में भाईचारे की फ़िज़ा इसलिये क़ायम रही कि मुल्क के हुक्मरानों ने देशवासियों में मज़हब की बुनियाद पर भेदभाव नहीं किया। देश का संविधान जिसे सभी धर्मों के लिये क़ाबिले-क़बूल बनाया गया था उसकी हिफ़ाज़त की गई।

सत्तर सालों तक देश में ऐसा कोई क़ानून नहीं बना जो देशवासियों में धर्म की बुनियाद पर भेदभाव करनेवाला हो। यही ख़ूबी इस देश को सारी दुनिया में आँख का तारा बनाए हुई थी।मोदी सरकार के पहले टर्म 2014-2019 में देश को आर्थिक तौर पर बहुत नुक़सान हुआ। लेकिन देश के संविधान की आत्मा को किसी हद तक बाक़ी रखा गया।


मुसलमानों को ये अहसास तो रहा कि NDA की सरकार मुसलमानों के लिये कोई भलाई के काम नहीं करनेवाली लेकिन इनको ये इत्मीनान था कि संविधान में दिये गए बुनियादी हक़ महफ़ूज़ रहेंगे। लेकिन मोदी सरकार की दूसरी ताजपोशी के बाद और उनके शाही सलाहकार के सरकार में शामिल हो जाने के बाद जिस तरह से एक के बाद एक देश के संविधान का मज़ाक़ बनाया गया है और बनाया जा रहा है उसने कई सतह पर मुल्क को नुक़सान पहुँचाया है।सबसे बड़ा नुक़सान विदेशों में देश की तस्वीर को पहुँचा है।

जैसा कि मैंने पहले कहा कि सारी दुनिया में देश की शोहरत इसकी विशाल-ह्रदयता की वजह से थी, यहाँ सारे धर्मों को इज़्ज़त व सम्मान हासिल था मगर मौजूदा सरकार के फ़ैसलों और हुकूमती रवैयों ने सारी दुनिया पर वाज़ेह कर दिया कि हिन्दुस्तान में अल्पसंख्यक ख़ास तौर से मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। CAA लागू करने के बाद मुस्लिम दुश्मनी की जो तस्वीर बनी है ऐसी तस्वीर तो बाबरी मस्जिद गिराने के वक़्त भी नहीं बनी थी, इसलिये कि उस वक़्त की केन्द्र सरकार ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर अफ़सोस और दुःख जताया था।

मगर मौजूदा सरकार तो ख़ुद एक ऐसा क़ानून लाई है जो मज़हब की बुनियाद पर लोगों को बाँटने वाला है, जब राजा ही अन्याय करने लगे तो न्याय कौन करेगा? सारी दुनिया हिन्दुस्तान को संकीर्णता और तंग-दिली का ताना दे रही है। UNO सहित सारी मुस्लिम दुनिया और ग़ैर-मुस्लिम दुनिया की संसदों में, सिवाय म्यांमार और इस्राईल के, आरएसएस की निन्दा हुई और उसे फासीवादी कहा गया। म्यांमार और इस्राईल चूँकि ख़ुद मुस्लिम दुश्मन हैं इसलिये ख़ामोशी इख़्तियार की वरना वो भी निन्दा करनेवालों में शामिल होते। ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी क़ानून के ख़िलाफ़ UNHRC सुप्रीम कोर्ट में चला गया है।

ये देश की बदतरीन तस्वीर है।देश की तस्वीर केवल विदेशों में ही ख़राब नहीं हुई बल्कि ख़ुद देश के दानिशवरों और बीजेपी के समर्थकों तक में सरकार के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित हुए, कुछ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी, सरकार के सलाहकार तक ने कहा कि दिल्ली पुलिस अगर दंगे रोकने में नाकाम है तो मानो जम्हूरियत (लोकतंत्र) नाकाम है।

दूसरा नुक़सान देशवासियों में असुरक्षा की भावना का पैदा हो जाना है। देश की एक बड़ी अल्पसंखयक आबादी की नागरिकता पर सवाल खड़ा करके उसको देश के विकास के मैदान से बाहर कर देना है। इसी के साथ देश के दूसरे अल्पसंख्यकों के भी कान खड़े हो गए हैं। इनको अन्दाज़ा हो गया है कि आरएसएस की विचारधारा में इनका क्या स्थान है और श्री राम के नाम पर बनने वाले राज्य में उनकी हालत क्या होनेवाली है। इसलिये वो भी खुलकर इस काले क़ानून के ख़िलाफ़ हैं। किसी देश के नागरिकों में ख़ुद सरकार की तरफ़ से असुरक्षा की भावना पैदा होना बहुत बड़े-बड़े नुक़सानात की ख़बर देता है। देश असुरक्षा का शिकार होता है। उसका विकास रुक ही नहीं जाता बल्कि पतन का दौर शुरू हो जाता है। ये असुरक्षा जब सरकार के साथ-साथ नागरिकों की तरफ़ से भी पैदा हो जाए तो और ज़्यादा नुक़सान होता है। दिल्ली दंगों की वजह CAA के समर्थकों का सड़क पर आ जाना है।


ये भी एक अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि सरकार ने एक क़ानून बनाया, उसको लागू भी कर दिया, उसका विरोध हुआ और हो रहा है। यह विरोध तो समझ में आता है लेकिन उसके समर्थन में रैलियाँ करना और सड़क जाम करना और क़ानून का विरोध करनेवालों को गालियाँ देना और इससे आगे बढ़कर उनपर हमला करना देश को गृह-युद्ध (Civil War) के रास्ते पर डाल देना है। नागरिकों को आपस में लड़ाने की नीति अंग्रेज़ों की थी। ये पॉलिसी आज मौजूदा सरकार ने अपना ली है। हालाँकि जिस बड़े पैमाने पर सरकार नुक़सान पहुँचाना चाहती थी वह नुक़सान नागरिकों की दूरदर्शिता के कारण नहीं होने पाया, बल्कि स्थानीय नागरिकों ने एकता और प्रेम दिखाकर सरकार के अरमानों पर पानी फेर दिया। सरकार की असंवैधानिक कार्रवाइयों का नुक़सान आरएसएस को भी हुआ। अभी तक संघ परिवार एक सोशल NGO की हैसियत से जानी जाती थी, पढ़े-लिखे ग़ैर-मुस्लिम लोग इसे एक फ़लाह और कल्याण की तन्ज़ीम समझते थे मगर शाही ग़ुण्डागर्दी ने उसकी सौ साल की मेहनत पर पानी फेर दिया। अब संघ परिवार से देश और विदेश में नफ़रत में बढ़ोतरी हुई। मैं यह नहीं कहता कि सारा देश या सारे लोग संघ की नीति और मोदी जी की नीतियों के विरोधी हुए हैं लेकिन अल्पसंख्यक व दलित वर्ग में विरोध बढ़ा है।

अगर सरकार ने अपने क़दम वापस नहीं लिये और जैसा कि शाह साहब के तैवर बता रहे हैं कि वो एक इंच पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, तो देश का नुक़सान तय है और उसकी ज़िम्मेदार आरएसएस और केन्द्र सरकार होगी।इन नुक़्सानों के अलावा देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई, देश के तीन बड़े बैंक डूब गए और बाक़ी बैंक भी मँझधार में हैं और किसी वक़्त भी डूब सकते हैं।


इसके बावजूद इन हालात से मुसलमानों को फ़ायदा पहुँचा, आज़ादी के बाद जिस क़ौम को कांग्रेस ने थपकी देकर सुला दिया था और किनारे लगा दिया था, मोदी सरकार के पिछले छः महीनों के फ़ैसलों ने उसे बेदार कर दिया, उसे नाक, कान और आँखें दे दीं। उसे न सिर्फ़ अपने वुजूद और हक़ों की फ़िक्र हुई बल्कि वो देश की सुरक्षा के लिये खड़ी हो गई, आगे जितनी भी उनके ख़िलाफ़ हिंसा होगी मुसलमान बेदार होंगे। अब मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वो मायूस न हों, हिम्मत न हारें, अब किसी देश के हालात बदलने में देर नहीं लगती, दुनिया के हालात बदलने से भी देश के हालात बदल जाते हैं, अलबत्ता ये ज़रूरी है कि मुसलमान अपना तामीरी (Constructive) रोल जारी रखें, सकारात्मक (Positive) सोच के साथ रहें, ग़ैर-मुस्लिमों की एक बड़ी तादाद अभी न्याय-प्रिय है, हर बस्ती और हर मोहल्ले में, हर जगह शान्ति और न्याय-प्रिय लोग मिलकर नफ़रत और हिंसा का मुक़ाबला करें। सच्चाई के मुक़ाबले झूट और इन्साफ़ के मुक़ाबले ज़ुल्म ज़्यादा देर नहीं ठहर सकता।

 
ये फ़ितना आदमी की ख़ाना वीरानी को क्या कम है।हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो।

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