कहानी कुस्तुन्तुनिया से इस्तांबुल बनने की

डॉ० उमैर अनस

 

डॉ० उमैर अनस

इतिहास की सबसे अच्छी और सबसे खराब बात ये है की जितनी दूर से देखो तो एक बनी बनाई फिल्म जैसी आसान प्लाट वाली कहानी लगती है. पास जाते जाएँ तो लगता है की एर्तुग्रुल जैसा न खत्म होना वाला ड्रामा है. और पास जाएँ तो लगेगा की एर्तुग्रुल तो सिर्फ एक हिस्सा है और कहानी तो और लम्बी है. तुर्की में आया सोफ़िया नाम का बाज़ीनटाईन एम्पायर का किला उस्मानी एम्पायर में मस्जिद बन गया और कमाल अतातुर्क ने उसे म्यूज़ियम बना दिया और अब उसका म्यूज़ियम का स्टेटस खत्म कर दिया गया है.

 तुर्की में और तुर्की के बाहर बहुत से मुसलमानों और गैर मुसलमानों को भी लगता है की ये इस्लाम की ईसाई मत पर जीत दर्ज की जा रही है. कई मुसलमान अल्लाहू अकबर कहकर जश्न मना रहे हैं और कई गैर मुसलमान दुखी हैं. अगर दुनिया बिलकुल आदर्शवादी तरीकों पर चल कर यहाँ तक पहुंची होती तो आया सोफिया को चर्च से मस्जिद और मस्जिद से म्यूज़ियम और म्यूज़ियम से फिर मस्जिद बनाने का सारा ड्रामा नाजायज़ लगता.

 

क्या ज़रूरत थी की ईसाई मत के लोग अरस्तु और अफलातून जैसे फ़लसफ़ियों वाले इलाकों में जाते. लेकिन ये काम को खुद सिकंदर महान ने भी किया था और सिकंदर महान ने इसलिए किया था क्योंकि उसके मुल्क को फ़ारसी एम्पायर ने परेशान कर रखा था. खैर से हम फलसफी देश से ईसाई बनते हुए इलाके को ध्यान में रखें. लेकिन जैसे जैसे ईसाई धर्म का प्रचार यूरोप में होता गया तो इटली का रोम इस्तांबुल से भी ज़्यादा शक्तिशाली होता चला गया जिससे उनके अंदर खुद को इस्तांबुल के चर्च से ज़्यादा महत्वपूर्ण होने का दंभ होने लगा. इस्तांबुल और रोम के ईसाई पादरियों की रस्साकशी इतनी बढ़ी की सन 1054 में रोमन चर्च ने खुद को इस्तांबुल के चर्च से आज़ाद होने का ऐलान कर दिया और इस्तांबुल चर्च को पूरे यूरोप में अलग थलग करने की साज़िश करने लगा. ये वैसे ही है जैसे सऊदी अरब से इस्लाम शुरू हुआ और ईरान ईरान मिस्र पहुंचा लेकिन थोड़े ही समय में सब आपस में लड़कर अपने अलग अलग इस्लामी राज्य का एलन कर दिया. यही भारत के हिन्दू राजाओं के बीच हुआ यही सेंट्रल एशिया के फ़ारसी और तुर्की बोलने वाले पठानों के बीच हुआ. धर्म एक केंद्रीय राज्य की बुनियाद नहीं बन सकता यह बात सबको मालूम थी और यही राजनीती है. इस ज़माने में मज़हब ही राजनीती थी और राजनीति ही मज़हब था.

 

रोम के चर्च ने ईसाई दुनिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए सलीबी जंगों यानी क्रूसेड का एलान 10 91 में कर दिया लेकिन इस्तांबुल यानी कुस्तुंतुनिया का चर्च इस ऐलान को लेकर शंका में था और क्योंकि उसे ये डर था कि इस बहाने रोमन चर्च कुस्तुन्तुनिया को अपने दायरे में लाने की साज़िश कर रहे हैं. ये डर कुस्तुन्तुनिया के चर्च और मुसलमानों के बीच अंदरखाने सहयोग का कारण बना. पहले क्रूसेड में जब रोमन चर्च कमज़ोर पड़ा तो उसने बाज़ीनटाईन के कोमेनोस (1143–1180) पर आरोप लगाया कि वह मुसलामानों से मिल गया है. और जब रोमन चर्च ने सीरिया के कई इलाको पर कब्ज़ा कर लिया और उसे कुस्तुन्तुनिया के राज्य का हिस्सा बनाने से मन कर दिया तो पश्चिमी और एशिया के चर्चों के बीच अविश्वास खुल कर सामने आगया. रोमन चर्च फैलने और फूलने लगा. वेनिस दुनिया में एक बड़े व्यवसायिक केंद्र बन कर उभरने लगा और कुस्तुन्तुनिया के चर्च के पास बलकान देशों के ऊपर ही सारा भरोसा रह गया था. जब एड्रोनिक्स कुस्तुन्तुनिया की गद्दी पर बैठा तो लैटिन मूल ईसाइयों के खिलाफ नफरत थी कि 80000 लैटिन ईसाईयों का नरसंहार हुआ. 1185 में एड्रोनिक्स  का भी तख्ता पलट हो गया.

 

12 अप्रैल 1204 को चौथी क्रूसेड फ़ौज रोम से चल कर इस्तांबुल पहुंची और इस्तांबुल में भयानक उथल पुथल थी. राजा अलेक्सो भाग निकला और उसकी जगह अलेक्सो चतुर्थ को गद्दी पर बिठाया गया. लेकिन जनता ने अलेक्सो चतुर्थ को मार डाला क्योंकि वह लैटिन चर्च का सहयोगी माना जा रहा था और उसकी जगह अलेक्सो पंचम को लाया गया जो क्रूसेड में शामिल होने का विरोधी था. उसने हज़ारों क्रूसेडर जो इस्तांबुल के बाहर इन्तिज़ार कर रहे थे शहर में आने से मना कर दिया और आखिरकार क्रूसेडर ज़बरदस्ती घुस आये और इस्तांबुल की ईंट से ईंट बजा दी. उस वक़्त आया सोफ़िया में सबसे ज़्यादा तोड़ फोड़ की गई. बचे खुचे बाज़ीनटाईन सरदारों ने अपने-अपने इलाकों को स्वायत्त घोषित कर दिया और अनडोलीस के अंदर निकैया एम्पायर स्थापित हुआ.

अलेक्सो बंधू पोंटस राज्य बना कर अलग हुए. 1261 में निकैया के बाज़ीनटाईन राज्य दुबारा इस्तांबुल को वापस पाने में सफल हुए. निकेटस कोनिएट्स ने तेरहवी सदी में आया सोफिया पर लातिनी चर्च के कब्ज़े की बहुत ही दर्द भरी कहानी अपनी किताब हिस्टोरिआ में लिखी है.

 

यह लम्बी कहानी इसलिए सुनाना ज़रूरी है क्योंकि इस्लाम और ईसाई मत के बीच में कथित संघर्ष और तुर्क कबीलों का तुर्की में फैलाव कोई खाली हवा में नहीं शुरू हुआ. यह भी कोई कम दिलचस्प बात नहीं है कि इस्लाम के उदय से पहले ही से कुस्तुन्तुनिया और अरब कबीलों के बीच बहुत दोस्ताना था. कारण था फ़ारसी सम्राज्य जिससे अरब क़बीले हमेशा भयभीत रहते थे और उसको बैलेंस करने के लिए कुस्तुनस्तुनिया से मदद लेते रहते थे.


अरब कबीलों का सबसे बड़ा शायर इमरुल केस अपने बाप की हत्या का बदला लेने में कुस्तुन्तुनिया में बाज़ीनटाईन राजा से मदद मांगने गया था लेकिन वापसी में तुर्की के अंकारा में उसकी मौत हो गई. जुदित हेर्रेन लिखते हैं कि अगर छटी सदी में बजिनतीन अपना विस्तार अरब देश की तरफ जो अब मुसलमान हो रहे थे न रोकते तो अरब फौजी तुर्की कबीलों से आठ सौ साल पहले ही इस्तांबुल पर कब्ज़ा कर चुके होते. इस्लाम के उदय के बाद कबीले, कबीलों की सियासत से बाहर निकल कर धर्म की सियासत में ईसाईयों और फारसियों की बराबरी करने के लायक हो गये लेकिन वह जल्दी ही बिखरने लगे.

 

तुर्क और फ़ारसी कबीले इस्लाम क़ुबूल करके उनकी जगह लेने लगे. इस बीच मंगोलों का हमले भी तुर्की तक पहुँच गए और अगर मुस्लिम बादशाह उनको यूरोप की तरफ मोड़ देते और उनसे न भिड़ते तो आज दुनिया का नक्शा बहुत अलग होता. 1291 में रोमन पोप ने बाज़ीनटाईन इलाके में लातिनी बोलने वाले ईसाईयों को लाकर आबाद करने की योजना का एलान किया जिसने तुर्क सरदारों और बाज़ीनतान चर्च दोनों के कान खड़े कर दिए.

 

इस्तांबुल पर उस्मानी जीत से पहले कम से कम तीन उस्मानी बादशाहों या शहज़ादों ने बाज़न्टीन राजा की लड़कियों या रिश्तेदारों से राजनीतिक विवाह किये. हालांकि मुसलमान इतिहासकार अक्सर अपने राजाओं की जीत को बहुत मज़हबी रंग देकर दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन ऐसी मिसालों को चुपके से नज़र अंदाज़ करके आगे बढ़ जाते हैं. उसमें से एक बात यह भी है कि क्या इस्तांबुल की जीत सचमुच में इतनी बड़ी बात थी जितना की बाद के इतिहासकारों ने उसको पेश किया है? ये बात तो सभी इतिहासकार मानते हैं की जिस बाज़ीनटाईन एम्पायर के केंद्र पर उस्मानी राजाओं ने कब्ज़ा किया वह कुछ किलोमीटर का इलाका था. क्योंकि ज़्यादातर इलाका वह बहुत पहले ही रोमन एम्पायर के साथ टकराव और आपसी लड़ाई में खो चुके थे. अगर तैमूर लंग ने 1423 में अंकारा पर हमला करके उस्मानी राजा एल्ड्रीम बेयाजित को हरा कर कैदी न बना लिया होता तो शायद इस्तांबुल उसी साल जीत लिया जाता लेकिन तैमूर लंग के हमले बाद बाज़ीनटाईन राजा ने उस्मानी राजाओं से किया समझौता तोड़ दिया और अपनी खोई ज़मीन वापस लाने के लिए बाहरी मदद लेने लगे. लेकिन फिर हार गए और इसबार बाज़ीनटाईन राजा के बेटो में इलाके बाँट दिए गए. जिस पर बाद में फिर रोमन सम्राज्य ने कब्ज़ा कर लिया. आखरी सालों की लड़ाई में भी उस्मानी राजा इस्तांबुल के बजाये यूरोप की तरफ बढ़त बनाना चाहते थे लेकिन इस्तांबुल उनको दुबारा वापस खींच लेता था. इस बार उन्होंने यूरोप के सारे राजाओं को पत्र लिख कर मदद मांगी लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया. आखिरकार इस्तांबुल उस्मानी राज्य का 1453 में हिस्सा हो गया और सुल्तान मेहमेत इस्तांबुल में पहली बार विजेता के रूप में दाखिल हुए.

 

वैसे इस्लाम में किसी भी धार्मिक केंद्र को युद्ध के बाद भी मस्जिद बनाने का या उसे तोड़ने और नुकसान पहुंचाना साफ़ साफ़ मना है लेकिन आया सोफिया को मस्जिद बनाया गया. उसका मुख्य कारण यह था कि आया सोफ़िया मात्र एक चर्च नहीं था वह बाज़ीनटाईन सत्ता का केंद्र भी था. धार्मिक राज्य होने के नाते राजा आया सोफ़िया धर्म के अलावा हर तरह की राजनितिक गतिविधियों का भी केंद्र था. उसको तोड़ नहीं सकते थे क्योंकि वह चर्च के रूप में इस्तेमाल में था इसलिए उसे मस्जिद बनाया और ईसाई धर्मगुरुओं को वहां आने जाने की अनुमति रही. ये फर्क भी महत्वपूर्ण है कि स्पेन में मुसलमानों और यहूदियों को जब निकाला गया तो बाकायदा लिखित आदेशों के साथ निकाला गया और उनकी सभी सम्पति पर कब्ज़ा किया गया. लेकिन इस्तांबुल के ईसाईयों को लिखित रूप से इस्तांबुल में पूरे अधिकारों से रहने की आज़ादी दी गई. क्योंकि उस्मानी राजाओं को अच्छी तरह पता था की ऑर्थोडॉक्स ईसाईयों को तो खुद रोमन कैथोलिक ईसाईयों ने ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है और इस्तांबुल छोड़ कर वह कहीं नहीं जा सकते.

 

पुरानी किताबों में ये किस्सा भी लिखा गया है कि तीन ईसाई पादरी जिसको उनके राजनितिक अपराध के कारण देश निकाला का आदेश दिया गया था उन्होंने ये कहकर माफ़ी मांगी की उन्हें कैथोलिक ईसाई मार देंगे इसलिए वह मुसलमानों के साथ रहना पसंद करेंगे तो मेहमेत सुलतान ने उनको इस काम पर लगाया की वह पूरे राज्य में मुसलमान अफसरों के कामों में कमियां निकाल कर लाएं और उनको बताएं. पोप निकोलस ने 1452 में कार्डिनल इसिडोर को इस्तांबुल भेजा की वह ऑर्थोडॉक्स नेताओं को रोम के साथ मिलजाने के लिए तैयार करें. इसीडोर करीब 1000 तीर अन्दाज़ के साथ इस्तांबुल पहुंचा लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं था. ऑर्थोडॉक्स बारहवीं सदी में रोमन चर्च के क्रूसेड द्वारा इस्तांबुल पर कब्ज़े और आया सोफिया की पामाली का ज़ख्म भूले नहीं थे. और इसीडोर आया सोफ़िया में लड़ते लड़ते पकड़ा गया और फिर किसी तरह जान बचा कर भाग निकला. जुदित हरेन लिखते हैं कि सुल्तान मेहमेत ने कुस्तुन्तुनिया जीता तो आया सोफ़िया के एक पादरी लुकास नोतरास को चर्च का पैट्रिआर्क बनाया. लेकिन रोमन चर्च की तरफ से उसको लालच दिया गया की वहां वापस आजायें और मिलकर इस्तांबुल वापस लेने की कोशिश करेंगे तो लुकास ने जवाब दिया कि तुर्क पगड़ी मंज़ूर है लेकिन पोप का ताज नहीं. और उधर रोम में बैठे पोप जॉन अष्टम ने सुल्तान मेहमेत को इस्तांबुल जीतने की बधाई भेजी.

 

(डॉ० उमैर अनस ने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) से वेस्ट एशियन स्टडीज़ में रिसर्च किया है और मध्य पूर्व मामले के जानकार हैं. वर्तमान में तुर्की की Ankara Yildirim Beyazit University, Turkey में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.) 

साभार : इंडिया टुमारो डॉट  नेट 

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