“हमारे रंग को देखकर लोग अंदाज़ा लगाते थे कि हम कौन हैं?”

 

40 घर, तंग गलियां, पानी, संडास के लिए लगती लम्बी कतारें और लोगों की नफरतों को मिलाकर बनती थी हमारी बस्ती। बस्ती से जुड़े बहुत से पल हैं जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को बहुत प्रभावित किया हैं। मेरे व्यक्तित्व को बनाने में बस्ती की परवरिश की एक अहम भूमिका रही है।


शाम के समय किसी घर से मोहब्बत भरे रफी साहब और लता मंगेश्कर के नगमों‌ की आवाज़ें आती थीं, तो किसी दूसरे घर में भजन-आरती होने के दौर की सुबुगाहट।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, तस्वीर साभार: पिक्साबे

बस्ती हर रोज़ करती है संघर्ष


बस्ती के हर घर में एक अलग तरह की कहानी और संघर्ष चलता रहता था। इन अलग-अलग कहानियों में भी खुद बस्ती की अपनी कहानी और संघर्ष हुआ करता था।


बस्ती के लोगों का पानी और संडास के लिए आपसी संघर्ष तो मानो रोज़ाना की ही बात थी। लाइन लगाकर खड़े रहना और अपनी बारी का इंतज़ार करना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं था। कमाल की बात तो यह थी कि इन लाइनों के इंतज़ार में भी मज़ाकियां पल जुड़ जाते थे। ऐसे में कुछ दिन तो उसी की चर्चा चलती रहती थी।


रोज़ाना के संघर्षों से बड़ा संघर्ष हम सभी बस्ती वाले कई सालों तक करते रहे लेकिन यह संघर्ष बस्ती के बीच का नहीं था, बल्कि बस्ती से दूर और बाहर रहने वाले लोगों की वजह से था। यह वह संघर्ष था जो बाहर रहने वालों की उस नफरत से जूझने की कहानी बयां करता था जो उन बाहरी लोगों के दिलो-दिमाग में थी।

 

क्या है नफरत की वजह?

नफरत की बहुत-सी वजह होंगी लेकिन उनमें से एक वजह थी कि उस बस्ती में सारे घर सफाई कर्मचारियों और दलितों के थे। यही कारण था कि बाहर के लोगों के मन में हमारे लिए इतनी नफरत भरी हुई थी।


आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि उन लोगों की हमसे नफरत करने की यह वजह मानो कानूनी अधिकार जैसी लगती थी।


रंगों से पहचानने की होती है कोशिश

भले ही हम कितने ही साफ और सुन्दर कपड़े पहन लें लेकिन हमारे रंग को देखकर लोग अंदाज़ा लगाते थे कि हम कौन हैं? उनकी नज़र में हम दानव से कम नहीं थे। यह इसलिए भी हो सकता है कि पौराणिक कथाओं में काले रंग वालों को ज़्यादातर दानव के रूप में दिखाया जाता था।


हमारे सिर पर सींग ओर मुंह पर लंबे-लंबे दांत वह अपनी कल्पनाओं में ही लगा लेते होंगे। बस्ती से दूर रहने वाले परिवार अपने बच्चों को हमारे खतरनाक, गन्दे और बदतमीज़ होने के किस्से सुनाते थे। यह इसलिए भी सुनाए जाते थे कि उनके बच्चे भी हमसे उन्हीं की तरह नफरत करें और दूर बनाकर रहें।


स्कूल से आते समय उन परिवारों के बच्चे हमें गन्दे और बदतमीज़ होने का एहसास भी कराते थे। कभी-कभी तो हम उनसे गुस्से में लड़ पड़ते थे। कभी-कभी गुस्से में कहते थे, “हां, हैं हम खतरनाक, गन्दे और बदतमीज़ और दूर रहो हमसे।”


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प्रतीकात्मक तस्वीर

झेलेना पड़ता है सामाजिक बहिष्कार


युथ की आवाज़  पर छपे लेख   के मुताबिक़  लोगों की नफरतों के साथ-साथ सामाजिक स्वीकार्यता ना होने की वजह से बस्ती के बच्चे भी किसी के साथ मिलना-जुलना पसन्द नहीं करते थे। ऐसे अनुभव सिर्फ बस्ती में ही नहीं हुए, बल्कि कॉलेज और नौकरी के दौरान भी हुए। कई बार ज़िन्दगी में ऐसे लोग मिले जिनकी आंखों और लच्छेदार बातों से वह नफरत अपने-आप झलक जाती थी।

इस नफरत से मानसिक तनाव, करियर में नुकसान और ना जाने क्या-क्या झेलना पड़ता है। कमाल की बात तो यह थी कि उनकी लच्छेदार बातों का जादू इतना गहरा था कि सभी को सिर्फ उन पर विश्वास था। शायद वह इंसानियत की बातें बहुत अच्छे तरीके से लोगों के सामने प्रस्तुत करते थे कि लोगों को सिर्फ अच्छा-अच्छा नज़र आता था।


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प्रतीकात्मक तस्वीर

स्पष्ट और अस्पष्ट नफरतों के बीच मुझे आज भी स्पष्ट नफरत करने वाले अच्छे लगते रहे हैं। उनकी स्पष्ट नफरतों से किसी तरह की कोई गलतफहमी तो नहीं होती क्योंकि जो मन में है वही ज़ुबान पर भी होता है। दिक्कत ज़्यादा अस्पष्ट नफरतों से होती रही है क्योंकि वह जो बातें करते हैं वह उनकी मन की सच्चाई नहीं है।


जो सच्चाई है वह लच्छेदार बातों में नहीं है लेकिन जिसने तमाम उम्र नफरतों को झेला हैं, उन्हें उनकी लच्छेदार बातों की गहराइयों का सच समझ आ जाता हैं।

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