असम के डिटेंशन सेंटरों में बंदी क्यों मर रहे हैं यह जानने के लिए पढ़ें अल जजीरा की ग्राउंड रिपोर्ट

तीनों परिवारों ने कहा कि शव को लेने से इनकार करने के बाद उन पर अपने प्रियजनों का दाह संस्कार करने का दबाव डाला गया

फालू अपने पीछे एक पत्नी और छह बच्चे, चार बेटियाँ और दो बेटे छोड़ गए हैं (फोटो- विद्या कृष्णन/अल जज़ीरा)

 

असम (अलजज़ीरा /एशिया टाइम्स ) पिछले साल अक्टूबर में दिहाड़ी मजदूर दुर्योधन दास को जब एक फोन कॉल आया तब वो काम की तलाश में थे। उन्हें भारत के पूर्वोत्तरी राज्य असम की राजधानी गुवाहाटी में मेडिकल कॉलेज में आने को कहा गया, जहां उनके 70 वर्षीय पिता फालु दास को ‘बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति’ के चलते भर्ती कराया गया था।


फोन कॉल के पांच दिन बाद 24 अक्टूबर 2019 को फालु दास ‘अस्पष्ट’ परिस्थितियों में मरने वाले गोलपारा हिरासत केंद्र का 28वें कैदी बन गए। उनकी 30 वर्षीय पत्नी कोरबुला दास ने अल जजीरा को बताया कि हमें नहीं पता था कि वह अस्वस्थ हैं। इससे पहले कि वो हमसे संपर्क करते वह पांच दिनों से अस्पताल में थे। भारत सरकार ने मेरे पति को मार डाला है।

 

बंगाली मूल के एक हिंदू फालु को जुलाई 2017 में गोलपारा जिले में हिरासत कैंप में रखा गया था क्योंकि वह फॉरेन ट्रिब्यूनल में अपनी नागरिकता साबित करने में सफल नहीं हो पाए थे। इस तरह की 100 फॉरेन ट्रिब्यूनल हैं जो विदेशी या संदिग्ध नागरिक होने पर लोगों की नागरिकता तय करते हैं। फॉरेन ट्रिब्यूनल के इस कंसेप्ट की शुरुआत 1997 में शुरुआत की गई थी।

राज्य के छह हिरासत केंद्रों में अबतक 1,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। चूंकि 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान सैकड़ों शरणार्थियों ने असम में प्रवेश किया था इसलिए इमिग्रेशन (आव्रजन) राजनीति पर हावी है।

1960 के दशक की शुरुआत से पूर्वोत्तर सीमावर्ती राज्य में 4,000 से अधिक अधिकारियों की सीमा पुलिस बल भी है, जो पड़ोसी बांग्लादेश से आने वाले लोगों का ‘पता लगाने और निर्वासन’ करने का काम करते हैं और उन्हें ‘विदेशी’ के रूप ब्रांड करते हैं।



सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में अगस्त 2019 में नागरिकता की एक्सरसाइज की गई थी जिसमें फालु और बंगाली मूल के लगभग 20 लाख लोग शामिल थे।

गुस्साए फालू के परिवार ने उनका शव लेने से भी इनकार किया। उनकी पत्नी ने कहा कि मेरे परिवार को जिस तरह से प्रताड़ित किया गया है, ऐसा किसी के साथ भी नहीं होना चाहिए। मुझे अभी भी नहीं पता कि मेरे पति की मौत कैसे हुई। हमारे पास मृत्यु प्रमाण पत्र या पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक नहीं है।

फालु के छोटे बेटे भागु दास गुस्से में कहते हैं, ‘हमने उनके नाम का हर वैध दस्तावेज दिखाया और फिर भी उन्हें ‘विदेशी’ घोषित किया गया। अगर वह वास्तव में विदेशी थे तो उनके शव को बांग्लादेश भेज दिया जाना चाहिए। भारत सरकार ने उन्हें जेल में डाला और माना कि वह उस देश के ही थे।’

भागु दास आगे कहते हैं, ‘मेरे पिता ने अदालत में भारतीय नागरिकता साबित करने में विफल होने पर पिछले दो साल जेल में बिताए। अब वे कैसे मानते हैं कि हम उनका परिवार हैं जब उनका अंतिम संस्कार करने का समय है?’

फालु अपने पीछे एक पत्नी और छह बच्चे, चार बेटियां और दो बेटे, अपने पति और बच्चे छोड़ गए हैं। उनमें से ग्यारह (उनकी पत्नी, दो बेटे, उनकी पत्नियां और छह पोते) एक साथ सीतामढ़ी में रहते हैं जहां के वे गरीब परिवारों में से एक हैं।

 


एक मंदिर के पास उनकी दो छोटी-छोटी झोपड़ियाँ हैं जिसमें कुछ रसोई के बर्तन, प्लास्टिक की कुर्सियाँ, चारपाइयाँ (रस्सी के बिस्तर) और उनकी सबसे कीमती संपत्ति सरकारी दस्तावेज जो एक पॉलिथीन बैग में रखे हुए हैं।

 


30 वर्षीय दुर्योधन उन दस्तावेजों को दिखाते हैं जो उनके पिता ने मौत से पहले छोड़ दिए हैं। जिननमें एक वोटर आईडी कार्ड, फालू के बैंक का एक पत्र और नालबारी के डिप्टी कमिश्नर के दो पत्र, फालू की बीमारी की पहली जानकारी के पत्र हैं।

सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लॉ के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. मोहशिन आलम भट कहते हैं कि अगर कोई हिरासत में मर जाता है तो यह भारतीय राज्य और दायित्व के अंतराष्ट्रीय कानून के तहत आता है। इसके लिए पारदर्शी जांच की जाती है।



नौकरी और आवास का वादा
फालु की मौत के बाद मीडिया का सर्कस शुरु हो गया और सबको उनके परिवार की याद आ गयी। नलबारी जिले के अधिकारी और हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के सदस्य फालु के परिवार पर शव को लेने का दबाव डाल रहे थे जबकि विपक्षी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता और नेता उन्हें दूसरी ओर से खींच रहे थे और उन्हें सलाह दे रहे थे कि वह शव को तब तक स्वीकार न करें जब उन्हें एक ‘भारतीय नागरिक’ घोषित न किया जाए।

दुर्योधन बताते हैं कि भाजपा के नेताओं ने उनके परिवार को उनके विरोध को समाप्त करने और फालु के शव को लेने के बदले में उन्हें नकद मुआवजा, नौकरी और आवास की पेशकश की थी। दुर्योधन और उनके भाई इन बातों के बीच फंसे हैं क्योंकि कोई नौकरी नहीं, कोई बचत नहीं, अंतिम संस्कार के खर्च के लिए कोई पैसा नहीं और कोई नागरिकता नहीं है। दुर्योधन ने बताया, ‘मेरी मां और दो बड़ी बहनों के नाम अंतिम एनआरसी में हैं। मेरा भाई, दो बहनें और मैं सूची में नहीं हैं।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय भाजपा सरकार द्वारा पिछले साल 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पारित करने के बाद असम में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया, बांग्लादेश सहित तीन पड़ोसी देशों से गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने के लिए प्रक्रिया फास्ट ट्रैक किया गया है।

सीएए के प्रावधानों के तहत बंगाली मूल के मुस्लिम (जो एनआरसी से छूटे हुए 19 लाख लोगों में से हैं) को स्वाभाविक रूप से नागरिकता नहीं दी जाएगी। आलोचकों का कहना है कि यह देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ जाता है लेकिन कई असमियों ने कानून को कम कर दिया है जिसमें कहा गया है कि सभी अप्रवासियों को उनके विश्वास के बावजूद निर्वासित किया जाना चाहिए।

 


दुर्योधन ने कहा, ‘भाजपा नेताओं ने हमें बताया कि हमें नागरिकता के लिए विरोध करने की आवश्यकता नहीं है। जब सीएए लागू किया जाता है तो हमारे नाम स्वतः ही सूची में आ जाएंगे क्योंकि हम हिंदू हैं।’

 

 

रहस्यमय परिस्थितियों में मौत
असम के हिरासत केंद्रों में पिछले अक्टूबर के बाद से रहस्यमय परिस्थितियों में तीन तथाकथित विदेशियों – दुलाल पॉल, फालू दास, और नरेश्वर कोच की मौत हो चुकी है। उनकी कहानियों की डिटेल में जाएंगे तो वो भी इसी तरह से परेशान हैं।

फालु दास के बेटे भागु दास ने कहा कि अदालत में भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाने के कारण मेरे पिता ने पिछले दो साल जेल में बिताए। तीनों परिवारों ने बताया कि उन पर अपने प्रियजनों के शव को स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया था। तीनों मामलों में परिवारों को मृत्यु के कारण को स्पष्ट करते हुए मेडिकल रिकॉर्ड नहीं दिया गया था।

65 साल के दुलाल की पिछले साल 13 अक्टूबर को फालू से दो हफ्ते पहले मौत हो गई थी। उनका बेटा अशोक एक परिचित कहानी सुनाता है। उन्हें अक्टूबर में एक फोन आया और शीर्ष जिला अधिकारी की ओर से एक नोटिस के जरिए उनके परिवार सूचना मिली कि दुलाल को बिगड़ते स्वास्थ्य के चलते गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। दुलाल तेजपुर हिरासत केंद्र में 2017 से थे।

दुलाल के परिवार ने कहा कि स्थानीय राजनेताओं ने उन्हें शव लेने के लिए मजबूर किया। अशोक कहते हैं, ‘उन्होंने मुझे नौकरी देने की पेशकश की थी, स्थानीय भाजपा विधायक गणेश लिंबू ने परिवार के लिए आर्थिक सहायता की पेशकश की थी।’

अशोक कहते हैं कि कोई भी परिवार मेरे परिवार की तरह परेशान न हों। मुझे अभी तक मालूम नहीं कि मेरे पिता की मौत कैसे हुई। हमारे पास न ही मृत्यु प्रमाण पत्र है और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। मैं जब तक जिंदा हूं अपने पिता के भारतीय घोषित होने के अधिकार के लिए संघर्ष करूंगा। दुलाल के सभी तीन बेटों को NRC सूची से बाहर कर दिया गया है।



स्थानीय भाजपा नेता नारायण डेका, जो कि फालू के परिवार के संपर्क में थे और भाजपा विधायक गणेश कुमार लिम्बू, जो कि दुलाल के परिवार के संपर्क में थे, उन्होंने ईमेल और फोन कॉल का जवाब नहीं दिया। इसी तरह भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता नलिन कोहली ने प्रकाशन के समय ईमेल और फोन कॉल का जवाब नहीं दिया था।

ऐसा होने के तुरंत बाद अशोक ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को बताया कि उसके पिता की मृत्यु बहुत ही संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। मुझे जेल अधिकारियों ने यह कहते हुए बुलाया कि मेरे पिता बीमार हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। मैं तेजपुर अस्पताल गया था। वह वहां नहीं थे। फिर मैं जिला जेल गया, जहां अंदर आने और बैठने के लिए जेलर ने पहली बार मुझे कहा था।

 


अशोक आगे बताते हैं कि उन्होंने मुझसे कहा ‘नागरिक समाज निकायों के साथ कोई नजदीकियां न बढ़ाएं, लेकिन आपके पिता की स्वास्थ्य स्थिति बहुत खराब हो गई थी, इसलिए हमने उन्हें गुवाहाटी भेज दिया है, जहां सरकार उनके अस्पताल के खर्च का ख्याल रखेगी।’ इससे  संदेह हुआ।’

 


जब अशोक गुवाहाटी के अस्पताल पहुंचे, तो उन्होंने अपने पिता को फर्श पर पड़ा देखा। अशोक कहते हैं, ‘उसने कहा कि कोई भी उसे पानी देने वाला नहीं था। उसने मुझसे कहा कि उसे घर ले जाओ वरना वह जेल के अंदर ही मर जाएगा।’

विदेशी ट्रिब्यूनल ‘कहर बरपा रहा है’
दुलाल के परिवार ने शुरू में शव लेने से इनकार कर दिया था, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय सहित सत्ताधारी पार्टी के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने 10 दिनों के बाद अंतिम संस्कार किया। मानवाधिकार संगठनों ने हिरासत केंद्रों में लोगों के इलाज को लेकर अधिकारियों की आलोचना की है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साथ एक मिशन के साथ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लॉ काम करता है। इसके एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. मोहसिन आलम भट कहते हैं, ‘भारतीय राज्य और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति हिरासत में मर जाता है, तो पारदर्शी जांच की जा सकती है। सरकार को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का आदेश देना चाहिए और इसे परिवार के साथ साझा करना चाहिए।’



मोहसिन ने अल जज़ीरा के हवाले से कहा, ‘हिरासत के तहत लोगों को भारतीय संविधान और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार और क्रूरता और अमानवीय व्यवहार के खिलाफ अधिकार प्राप्त हैं।’

5 जनवरी को नरेश कोच (असम की एक स्वदेशी कोच जनजाति) की गोलपारा के एक हिरासत केंद्र में मौत हुई। कोच न तो बंगाली मूल के मुसलमान थे, न ही बंगाली हिंदू। कोच की मौत के तुरंत बाद परिवार से मिले एक मानवाधिकार शोधकर्ता अब्दुल कलाम आज़ाद ने कहा कि इस तथ्य के बावजूद कि उन्हें और उनके पूर्वजों का असम की मिट्टी के अलावा किसी भी विदेशी देश से कोई संबंध नहीं था, उन्हें ‘विदेशी’ घोषित किया गया था।

उन्होंने आगे बताया कि उन्हें कामरूप जिले में 2017 में एक दुकान से उठाया गया था और उनकी पत्नी जीनी को पता था कि वह कहां हैं। हमें अंततः पता चला लेकिन उसके पास गोलपारा की जेल में यात्रा करने के लिए पैसे नहीं थे। दो साल बाद दिसंबर 2019 में जीनी को बताया गया कि उसके पति की तबीयत बिगड़ने के बाद गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। जब तक वह अस्पताल पहुंची, तब तक कोच को दौरा पड़ा था जिससे उन्हें लकवा मार गया था। अगले दो हफ्तों तक उसने पुलिसकर्मियों के साथ खड़े गार्ड की देखभाल की।

बोंगाईंगांव में अपने घर के आंगन मं बैठी जीनी पूछती हैं कि वो विदेशी अब कैसे भारतीय बन गए हैं जब उनकी मौत हुई है?  जीनी के परिवार को भी कोच की मौत की परिस्थितियों बताने वाला कोई मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु प्रमाण पत्र भी नहीं मिला है।

एक्सक्लूजन के लिए डिज़ाइन की गई एक रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने असम में लोगों को उनकी नागरिकता से वंचित करने के लिए विदेशी ट्रिब्यूनलों की आलोचना की। रिपोर्ट में तर्क दिया गया कि फॉरेन ट्रिब्यूनल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं।

उन तीनों परिवारों ने कहा कि शव को लेने से इनकार करने के बाद उन पर अपने प्रियजनों का दाह संस्कार करने का दबाव डाला गया। हालांकि राजनेताओं ने उनसे जो वादे किए थे (नौकरियों, नकदी और आवास के) अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। उन्होंने अल जज़ीरा को बताया, किसी ने भी वादे को पूरा नहीं किया है।

(अल जजीरा की इस रिपोर्ट का अनुवाद निर्मलकांत विद्रोही ने जनज्वार के लिये किया है। यह रिपोर्ट जनज्वार से साभार प्रकाशित की गई है।)

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