दिल्ली दंगों में अपना सब कुछ खो चुके अब्दुल मन्नान की दिल का दौरा पड़ने से मौत

 

नई दिल्ली, 27 जून | नार्थ ईस्ट दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों में जान माल का भारी नुकसान हुआ था. दंगों में 54 जानें गई थीं. दंगा तो ख़त्म हो गया मगर उसके प्रभाव अलग-अलग रूप में अब भी देखने को मिल रहे हैं. दंगों का दंश झेल रहे कुछ परिवार ऐसे हैं जो ज़िन्दगी को फिर से शुरू करने की चाहत और मुआवज़े की आस में पल-पल मर रहे हैं. उन्हीं में से एक दंगा पीड़ित परिवार ऐसा भी है जिसके मुखिया मुआवज़े के इंतज़ार में दुनिया से चल बसे.

 

जो सरकार दिल्ली में दंगा रोकने में पूरी तरह नाकाम रही वही सरकार अब पीड़ितों को मुआवज़ा देने में भी विफल साबित हुई है.

 

दिल्ली के खजुरी ख़ास में दंगों के दौरान अपना सब कुछ खो चुके 60 वर्षीय अब्दुल मन्नान की पिछले दिनों दिल का दौरा पढ़ने से मौत हो गई. दंगों के बाद से वो सदमें में थे और ज़िन्दगी भर की कमाई से बनाया गया घर और कारखाना जल कर राख हो जाने से उन्हें काफी अघात पहुंचा था.

 

 इंडिया टुमारो  के  मसीहुज़्ज़मा अंसारी  की रिपोर्ट  के  मुताबिक़  बिहार के सीतामणी जिले के थाना परिहार, गाँव सिसवा मुसहर्नियाँ के रहने वाले 60 वर्षीय अब्दुल मन्नान दिल्ली में पिछले 45 वर्षों से रहते थे. उनका कपड़ों का काम था. पांच वर्ष पूर्व दिल्ली के खजुरी ख़ास में फातिमा मस्जिद के पास अपना घर बना कर 8 बेटों और तीन बेटियों के साथ रहते थे.

 

इंडिया टुमारो से बात करते हुए अब्दुल मन्नान के बेटे इर्शाद ने बताया, “मुआवज़े की पूरी रक़म नहीं मिलने से वालिद इन दिनों काफी परेशान थे. मेरे वालिद का 20 जून को दिल्ली में ही इंतक़ाल हो गया. उनकी मिटटी 21 जून की शाम को बिहार के सीतामणी में हमारे गाँव में हुई.”

 

मृतक अब्दुल मन्नान के बेटे इर्शाद ने बताया, “ईद के बाद भाई और बहन की शादी होनी थी मगर दंगे में घर और कारखाना जल जाने और सामान, ज़ेवर, कैश लूट लिए जाने के बाद मेरे वालिद काफी परेशान थे.”

 

इर्शाद ने बताया, “दिल्ली में हमारा चार मंज़िला मकान है जिसमें हम सभी भाई बहन रहते थे. हमारा कपड़ों की कढ़ाई का काम था जो इसी मकान में होता था. महंगे लहंगे और कपड़ों पर कढ़ाई होती थी और 8-10 कारीगर पर्मानेंट काम करते थे. तैयार कपड़े भी घर में ही रखे होते थे. दंगों में सभी माल जल गए जिससे हमें लगभग 18-20 लाख रूपय का नुकसान हुआ था.”

 

नार्थ ईस्ट दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों में जान और माल का भारी नुकसान हुआ था. घरों को लूटने और आग लगाने के बाद दंगाई भीड़ ने सैकड़ों दुकानें भी लूटीं और अनगिनत दुकानों को आग के हवाले कर दिया था. दिल्ली सरकार द्वारा मुआवज़े की घोषणा के बाद भी बहुत से पीड़ित परिवारों ने ये दावा किया था कि उन्हें अब तक पूरा मुआवज़ा नहीं मिला है.

 

दिल्ली चैंबर ऑफ कॉमर्स ने हिंसा में तबाह हुए कारोबार का शुरुआती अनुमान लगाया था जिसके अनुसार दंगों में कम से कम 25,000 करोड़ का नुकसान हुआ है. हालांकि यह सिर्फ शुरुआती अनुमान था. दावा किया गया था की स्थिति सामान्य होने पर तबाह हुए कारोबार के आंकड़े बढ़ने की आशंका है.

 

दंगे में हुए नुकसान के बारे में इंडिया टुमारो से बात करते हुए इर्शाद कहते हैं, “दंगों में 8 लाख रुपय कैश जो रोज़ाना कारखाने के माल लाने और बेचने के लिए होते थे, बहन की शादी के ज़ेवर, 4 भाभियों के ज़ेवर भी दंगाइयों ने लूट लिया. जो सामान नहीं लूट सके उसमें उन्होंने आग लगा दी.”

 

इर्शाद ने इंडिया टुमारो को बताया कि, “24 फरवरी को दिन में लगभग 11 बजे दंगाइयों ने जब खजुरी खास में तोड़-फोड़ शुरू की तो हमारी गली में सबसे पहले फातिमा मस्जिद और उससे लगे मेरे घर पर ही आग लगाई थी. जान बचाने के लिए हम सभी लोग घर की छत पर चले गए थे.”

 

दंगे की भयावहता का ज़िक्र करते हुए इर्शाद ने बताया, “हमने देखा कि दंगाई 5 मिनट में दुकानों के शटर तोड़ दे रहे थे जो आम लोगों के लिए बहुत मुश्किल होता है. उसके बाद वो दुकानों के सामान लूट कर आग लगा देते. वो बहुत तैयारी से आए थे. सभी हेलमेट पहने हुए थे.”

 

खजुरी ख़ास के ही एक और युवा इंडिया टुमारो को बताते हैं, “24 फरवरी की सुबह 8-9 बजे जब माहौल ख़राब होने लगा तो मोहल्ले के कुछ असरदार हिन्दू पड़ोसियों ने कहा था कि आप परेशान न हों हम यहां संभाल लेंगे मगर जब स्थिति बिगड़ी और दंगाइयों ने हमला किया तो कोई भी माहौल को संभालने के लिए नहीं आया.”

 

खजुरी खास के ही एक और युवा इंडिया टुमारो से नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, “हम दस साल से यहां रहते हैं मगर कभी ये नहीं जान सके कि कौन सी दुकान हिन्दू की है और कौन सी मुस्लिम की. जानने की ज़रूरत भी नहीं है. मगर जब दंगे हुए तो चुन-चुन कर मुस्लिम दुकानों में आग लगाई गई और लूटा गया. आखिर दंगाइयों को किसने बताया कि मुसलमानों की दुकानें कौन सी हैं?”

 

इर्शाद अपने वालिद की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए कहते हैं, “हम दंगे में सब कुछ लुट जाने के बाद भी नहीं रोए क्योंकि अल्लाह पर यक़ीन था कि फिर से सब कुछ बना लेंगे लेकिन वालिद की मौत पर हमें रोना आया. वालिद को साया नहीं रहा. ऐसी हालत में जब सब कुछ ठीक चल रहा था और 2 महीने के बाद भाई और बहन की शादी होने वाली थी, दंगों में सब कुछ बर्बाद हो जाने से वालिद बहुत दुखी थे.”

 

ज्ञात हो कि दिल्ली दंगों के फौरन बाद दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष डॉ० ज़फरुल इस्लाम खान और सदस्य करतार सिंह कोच्चर ने हिंसा प्रभावित इलाके का दौरा किया था और इसपर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी. रिपोर्ट में दिल्ली सरकार से पीड़ितों को मुआवज़ा बढ़ाने की मांग भी की गई थी.

 

रिपोर्ट में कहा गया था, “हम जहां भी गए हमने पाया कि मुसलमानों के मकानों-दुकानों को व्यापक नुकसान हुआ है.”

 

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया था कि हिंसा ‘एकतरफा और सुनियोजित’ थी, जिसमें सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों के मकानों और दुकानों को हुआ है.

 

इस रिपोर्ट में कहा गया था, “व्यापक स्तर पर मदद के बिना ये लोग (दंगा पीड़ित) अपना जीवन फिर से नहीं संवार पाएंगे. हमें लगता है कि दिल्ली सरकार द्वारा घोषित मुआवज़ा इसके लिए पर्याप्त नहीं है.”

 

बहुत से दंगा पीड़ित परिवार ऐसे हैं जो अभी भी मुआवज़ा नहीं मिलने के कारण सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. कुछ परिवार ऐसे हैं जिन्हें थोड़ा बहुत मुआवज़ा मिला है लेकिन ज़िन्दगी को दोबारा शुरू करने के लिए काफी नहीं है.

 

कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें कुछ भी मुआवज़ा नहीं मिल सका. ऐसे परिवारों की स्थिति काफी दयनीय है. जो दंगों में बच गए वो अपनी तंगी से पल-पल मर रहे हैं. जो सरकार दिल्ली में दंगा रोकने में नाकाम रही वही सरकार अब मुआवज़ा देने में भी विफल है. ये सरकारी लापरवाही का दिल्ली सरकार कटघरे में खड़ा कर रही है.

 

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