1897 में पुना में प्लेग कमिश्नर रँड की जब चाफेकर बंधुओं ने हत्या की थी

किसिभी महामारी के वक़्त संकट धर्मपर नहीं मानवजाति के ऊपर होता है ।और इससे उभरना भी मानव के हाथ में है अर्थात अगर वह चाहे तो।

कल का थाली, ताली, शंख ,पटाखे बजाओ उत्सव देखकर कोई शक नहीं रहा भारतीय समाज अभी भी उन्नीसवीं सदी में जी रहा है। भीड़ बनाकर मानो कोरोना के आनेका जश्न मना रहे हो। अब भी लोग इस संकट को गंभीरता से नहीं ले रहे |

1897 में पुना में प्लेग का प्रसार रोकने के लिए नियुक्त किए गए प्लेग कमिश्नर रँड की जब चाफेकर बंधुओं ने हत्या की थी उनका आरोप था की रँड हमारे धर्म में दखल दे रहा है । हमारे घरोमें ‘देवघर' तक जूते पहनकर तलाशी करवा रहा है ।

प्लेग को फैलने से रोकने के लिए ये भी कदम ज़रूरी था कि प्रसार रोका जाए और ऐसे लोग जो इस बीमारी से ग्रसित है उनको ढूंढ़कर अलग किया जाए(quarantine) इसलिए इस कमिश्नर ने अपने लोग पुना में नियुक्त किए।



उस वक़्त भारतीय लोग महामारी को ‘भगवान का कोप' ही मानती थी( कई लोग आज भी मानते है)और जो महारोग(लेप्रेसी) आदि जैसी संक्रामक बीमारी से ग्रस्त होते थे उनको तो ‘पापी’ मानकर गाव की पंचायत तक गावनिकाला दे देते थे अगर वो निचली जाति या अस्पृश्य हो तो और भी ज़िल्लत झेलनी पड़ती ,और अगर वो उच्चवर्ण या ब्राम्हण हो तो अपने घरों के ‘देवघर’ में शरण लेता बीमारी को सबसे छुपाने के लिए घरों में ही बंद रहता, वहीं जड़ी बूटी का इलाज करता रहता और इलाज दौरान उसी में मर जाता क्युकी गांव में पता चल गया तो गांव के लोग पूछेंगे कि उच्च वर्ण और ब्राम्हण होकर भी उन्हें ‘भगवान का कोप' भला कैसे हो? या फिर वह पापी कैसे हो सकते है? (ऐसे अंधविश्वास उच्चवर्ग द्वारा बहुजन समाज में पहले से ही फैलाए गए थे),इसलिए उन्हें ये छुपाना पड़ता था ताकि बाकी बहुजन इनकी इसी बताई ‘भगवान के कोप' की कहानी को ही सच मानता रहे और मूर्ख और अज्ञानी बना रहे।

जब पुना में प्लेग फैला तो रँड ने आसानी से बहुजनो में से प्लेग के रोगी ढूंढ़ लिए मगर उच्च वर्णित वर्ग से रोगी मिल नहीं रहे थे और प्लेग फैल ही रहा था। क्युकी इस उच्च वर्णित सनातनी घर में मुख्यत: ‘देवघर’ में बाहर के लोगों को प्रवेश निषिद्ध होता था। उस घर के प्लेग के रोगी देवघर में छुप जाते थे।

इस तरह रँड को इन घरों के देवघरो की भी तलाशी करनी पड़ी और उच्च वर्ण के रोगी भी मिलने लगे। काफी कोशिशों के बाद प्लेग फैलना और फैलाना बंद हुआ। रँड के उठाएं प्रशासनिक और प्रसार रोकने के लिए उठाएं गए कदमों से लाखों लोगों की जान बची मगर अपने सनातनी धर्म से छेड़छाड़ और उसे भ्रष्ट करने का आरोप लगाकर चाफेकर बंधुओं ने रँड की हत्या कर दी।


अरेस्ट के बाद के स्टेटमेंट में खुद चाफेकर बंधुओं ने कहा कि धर्म भ्रष्ट करने और तलाशी के दौरान मूर्तियां तोड़ने और तुड़वाने की वजह से हमने हत्या कर दी। अब सामान और घरोकी तलाशी में मूर्तियों का टूटना या किसीने तोडना संभव था क्युकी प्लेग के वाहक चूहें और कीड़ो(पिसवा/फ़्ली/bedbugs जो येर्सिनिया पेस्टिस [प्लेग जीवाणु] के वाहक होते है)को ढूंढने के लिए सामान और घर के कोने छाने जा रहे थे ताकि घरो को pesticides इस्तेमाल कर disinfectकर सके तो संभव है सामान का इधर उधर बिखर जाना और टूटना.जिसमें मूर्तियाँ भी टूटी होगी|

कुछ लोग उसपर महिलाओं से छेड़छाड़ करवाने का आरोप भी लगाते है वो आरोप भी पूरी तरह सत्य नहीं ,आधा सच है । जहा तक इस घटना को मै देखती हूं तो ..

बुबोनीक प्लेग में शुरुवाती लक्षणों में बुखार या बगल और जांघों में गाठे उत्पन्न हो जाती है (axillary and inguinal lymphadenopathy).लोग इस लक्षण को छुपाने की कोशिश करते थे विशेषत महिलाएं और उस वक़्त परीक्षण के लिए महिला अधिकारी मिलना मुश्किल था सरकार में महिला अधिकारी या परीक्षक ना के बराबर अर्थात प्लेग की महिला रोगियोका परीक्षण पुरुष अधिकारियों या कर्मचारियों ने किया इसी दौरान कुछ विकृत मानसिकता के पुरुषोंने परीक्षण में अपने हाथ भी साफ कर लिए जैसे की आज के दौर में भी पुरुष बसो, ट्रेनों या भीड़ की जगह औरतों को अनचाही जगह छूने की कोशिश करते है। यह चीज एक महिला होने के नाते मै भी मानती हूं कि वह गलत था मगर डॉक्टर होने के नाते यह भी जानती हूं कि प्लेग रोगी महिलाओ को भी ढूंढ़कर अलग करना ज़रूरी था।

सनातनी लोगो ने धर्म को और महिला को हाथ लगाकर भ्रष्ट करने का आरोप लगाया और यह सब रँडके आदेशों से ये किया जा रहा है ऐसा कहा गया जिसका बदला लेनेके लिए चाफेकर बंधुओं ने रँड की हत्या की जिसे आज भी सनातनी लोग ‘रँडवध’ कहते है ।


रँडका व्यक्तित्व या स्वभाव क्या था ? इससे ज्यादा उसने उस महामारी के दौरान जो प्रशासनिक निर्णय लिए ये ज्यादा ज़रूरी और मायने रखते है जिनके वजह से लाखों लोगोकी जान बचाई गई और प्लेग का प्रसार पुना से बाहर होने की संभावना को खत्म किया गया। प्लेग उस वक़्त ऐसी महामारी थी जिसे दुनिया ‘ब्लैक डेथ' के नाम से जानती थी और करोड़ों लोग उसमें मर गए थे। ऐसी महामारी जो एक गुलाम देश में फ़ैल रही थी तब वहां के लोगो को बचाने की कोशिश एक ब्रिटिश अधिकारी कर रहा था और उसका हेतु मानवता था यही काफी है मानवता के मूल्य को समझने के लिए।



लाखों जाने बचाने के बावजूद रँड भारतीय इतिहास में विलेन है क्योंकि कारण साफ है वो ब्रिटिश अधिकारी था और हम परतंत्र| और चाफेकर बंधु जिन्होंने धार्मिक कारणों के लिए हत्या की ना की राष्ट्रवाद के लिए पर फिर भी वह देशभक्त है। हमारे इतिहास ऐसे ही लिखे गए हैं।

कोरोना संकट काल में आप आज देख रहे हैं जो प्रशासनिक निर्णय लिए जा रहे है और ज़रूरी भी है। महामारी के किसी भी दौर में सख्त कदम लेना ज़रूरी होता है।

यही वक्त की जरूरत होती है , कल अगर दुनियां के सारे रैडिकल धार्मिक लोग उठकर कहे कि हमारे मंदिर ,चर्च , मस्जिद बंद कर देनेसे धर्मपर हमला हो गया है और धर्म पर संकट है । तो क्या आप उनकी बात मानोगे? और फिर किसकी हत्या करोगे?


किसिभी महामारी के वक़्त संकट धर्मपर नहीं मानवजाति के ऊपर होता है ।और इससे उभरना भी मानव के हाथ में है अर्थात अगर वह चाहे तो।

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