स्वास्थ्य नीति का सच

Sohail Rahman

Asia Times News Desk

पिछ्ले महीने माननीय प्रधानमंत्री ने नई स्वास्थ्य नीति लागू की है।जिसमे स्वास्थ्य क्षेत्रों के लक्ष्य को पाने के लिए स्वास्थ्य क्षेत्रों का निजीकरण करने का प्रस्ताव रखा गया है।एक ओर जहाँ एक ही कम्पोजीशन की दवाओं में एक महंगी और दूसरी सस्ती दवाईंयां हैं।

सस्ती दवाओं को जेनरिक कहा जाता है।जितने भी बड़ी बड़ी निजी हॉस्पिटल, डॉक्टर के क्लिनिक हैं।वहाँ सभी डॉक्टर महंगी दवाई ही लिखते हैं।तथा कभी कभी खून जांच,एक्स रे,अल्ट्रासाउंड,सिटी स्कैन के नाम पर रोगियों से मोटी रकम वसूली जाती है।

सरकारी अस्पतालों में अच्छी व्यवस्था नहीं है।सारी दवाइयाँ मौजूद नही रहती है।केंद्र तथा राज्य सरकारों के द्वारा मुफ्त एम्बुलेंस की सेवा दी रही है।लेकिन फिर भी पिछले वर्ष उड़ीसा में एक पति अपने पत्नी को कांधे पर ले जाने को मजबूर था।इसके बाद सरकारों के द्वारा राशि दी गई।लेकिन उस व्यक्ति ने कहा कि अब पैसे लेकर क्या करेंगे जब मेरी पत्नी ही मर गयी।

फिर पिछले महीने असम के मुख्यमंत्री के गांव में एक व्यक्ति अपने भाई के शव को साइकिल पर अस्पताल से घर लेकर गए।लेकिन इसका किसी ने कोई संज्ञान नही ली।फिर कल के अखबार में उत्तरप्रदेश के इटावा में पंद्रह वर्ष के अपने बेटे के शव को एक पिता अपने कंधे पर ले जाने को मजबूर था।तीनों घटना तीन अलग अलग राज्यों से संबंधित है।

इनमे से दो राज्यों में भाजपा की सरकार हैं।तथा पहली घटना उड़ीसा की हैं।जहाँ नवीन पटनायक पिछले  पच्चीस सालों से उड़ीसा के मुख्यमंत्री हैं।भाजपा के बड़े बड़े वादों के बीच ये विकास के नाम पर मुँह चिढ़ाते हैं।नवीन पटनायक के पच्चीस वर्षीय कार्यकाल की खोखली विकास का पता चलता हैं।विकास तभी संभव हैं।जब समाज के सभी लोगों का समावेशी विकास हो।इस विकास में एक भी व्यक्ति नही छूटना चाहिए।

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