वह बचपन और कुछ ख्वाहिशें

Awais Ahmad

लेखिका: प्रियंका शर्मा

कुछ दिन पहले अपने ख़ास दोस्तों से मिलने के बहाने रोजमर्रा की ज़िंदगी से थोड़ा वक़्त निकालकर शहर की खुली हवा में घूमने निकलना हुआ। मेरे शहर में बहुत नई अनकही किस्से कहानी नहीं है। शायद दिल्ली जैसे शहर में यह बहुत आम बात हो जो यक़ीनन मेरे लिए तो मामूली नहीं है।

उस रोज ढलती शाम के बीच मेरी मुलाकात एक मासूम से ऐसे बच्चे से हुई जो अपनी उम्र से कम बच्चों और अपनी उम्र से ज़्यादा के नौजवानों को खुशियां बाटने को कोशिश करते हुए अपने अंदर के बच्चे को मार रहा था।

जिस उम्र में बच्चे बाजार में अपनी छोटी छोटी खुशियों के समान खरीदने के लिए अपने माँ बाप के साथ बाजार में इधर उधर भागते है उस उम्र में शायद वह किसी की उम्मीदों का बोझ उठाए बाजार में इधर उधर किसी उम्मीद की पूरी करने की चाह में घूम रहा था।

बदन पर एक मटमैली सी लाइनदार टी शर्ट और पेबंद लगी पैंट पहने उस सात साल के मासूम ने अपना नाम आशिफ बताया। आसिफ ! कोई ऐसा जो बेहद साहसी हो। मेरी नज़रो में वो सात साल का बच्चा वाकई साहसी था, हाथ में कुछ गुब्बारे लिए मेरे पास आकर गुज़ारिश करने लगा कि दीदी प्लीज एक गुबारा ले लीजिए।

मेरे एक बार मना करने पर आशिफ ने दोबारा मुझसे दूसरे बच्चो की तरह गुब्बारे खरीदने की ज़िद नहीं की बल्कि एक ऐसी ज़िद्द की कि मैं मना ही नहीं कर पाई। आशिफ की ज़िद्द ये थी की दीदी अगर गुब्बारा नहीं लेना तो मत लो लकिन मेरे गुब्बारे के साथ एक फोटो तो ले लीजिये।

फोटो खींचने की उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई और मैंने उसे हमारे साथ आकर बैठने को कहा। मेरे कई बार बोलने पर आशिफ मेरे साथ एक फोटो के लिए राज़ी हुआ और मेरे पास आकर बैठा और मैने अपने दोस्त के साथ मिलकर हम तीनों की एक सेल्फी फोटो खींचीं।

कुछ देर पहले जो लड़का मेरे पास बैठने में झिझक रहा था, अब प्रतीत हो रहा था जैसे वो हमें पहले कई दफा मिल चूका हो पर ऐसा बिलकुल नहीं था। यह मुलाकात मेरी और आशिफ की पहली मुलाकात थी और जितना आसिफ मेरे साथ रूबरू होता जा रहा था उतने ही कुछ राज वो मुझसे अनजाने में बया भी कर रहा था।

बातो ही बातो में आसिफ की नज़र मेरे सफेद रंग के जूतों पर गई और उसने मुझसे झट से पूछा की दीदी यह शूज कहा से और कितने के ख़रीदे है? मुझे उसका यह सावल थोड़ा सा अजीब लगा और सोचकर की वो मुझसे शायद शूज दिलाने को बोलदे मैंने भी एक झूठा सा जबाब दिया की पता नहीं पापा लेकर आए थे। ऐसा नहीं था की उसे जूते दिलाए नहीं जा सकते थे मगर आशंका ये थी की कल फिर से वो उसके पैरो में शायद नहीं होंगे।

मगर यहां मैं थोड़ी सी गलत हो गई क्योंकि मेरे उस झूठे जवाब के बाद आसिफ का सवाल कुछ और ही था। उसका सवाल सुन कर मैं सोच में पड़ गई। उस सात साल के बच्चे ने मुझसे जूते नहीं मांगे और कहा दीदी पापा को पूछकर आना की वह कितने के लेकर आए क्योंकि मुझे भी ऐसे ही शूज लेने हैं।

अब उसके इस सवाल का जवाब मेरे पास नही था। मैं स्तब्ध सी उसकी तरफ देखती रही और वह टकटकी लगा कर मेरे उस सफेद जूते को देख रहा था जिसका रंग अब मुझको सफ़ेद नही नज़र आ रहा था।

हां ! मेरे पास सच मै जवाब नहीं था उस वक़्त क्योंकि मुझे इतने छोटे बच्चे से ऐसे सवाल की उम्मीद बिलकुल नहीं थी। मेरे आशिफ से मुलाक़ात का अंत यहाँ नहीं हुआ क्योंकि अचानक बात करते वक़्त मेरी नज़रे आसिफ के चेहरे पर और हाथो पर गई जो बहुत ही निरदीयता से काटे जाने के निशानों से भरे हुए थे।

मासूम से दिखने वाले बच्चे के चेहरे पर इतने चोट के देख कर बिना कुछ सोचे मैंने आसिफ से पूछ लिया कि अंकल ने तुम्हे मारा हैं ना जब तुम गुब्बारा बेचने या काम करने से मना कर देते हो ? मुझे इस बात का इलम भी नहीं था की उस सात साल के बच्चे ने मेरे सवाल का जवाब पहले से ही सोचा या फिर रटा हुआ था।

उसने जवाब में एक कहानी बताई की जब वह छोटा था तो एक गाड़ी उस के ऊपर चढ़ गई थी जिसकी वजह से इतने जयादा चोट के निशान उसके चेहरे और हाथ पर है। अब मैं सोच रही थी कि यह अभी सात साल का बच्चा है तो इससे जयादा छोटे बच्चे को किसी गाडी के एक्सीडेंट से बचाना तो मुमकिन नहीं है।

मतलब मैं जान चुकी थी की ये वाकई पीटे जाने के निशान थे जो आशिफ छुपा रहा था। इसी बीच उसका एक गुब्बारा अचानक से खुद से फुट गया और उसके मुँह से निकला ओह नहींअब तो दादी बहुत मारेगी (आसिफ की आवाज़ में एक डर था )

तभी मैंने फिर से पूछ लिया की दादी मारेगी या अंकल ? आसिफ ने कहा कोई अंकल नहीं है। मैंने फिर कहा नहीं मुझे पता है अंकल तुम्हे यहाँ काम करने भेजते हैं और तुम काम नही करते हो तो फिर मरते भी है।

तभी वह बच्चा एक टक होकर मेरा चेहरा देखते हुए बोला आपको कैसे पता आपने मुझे देखा थोड़ी ना है। खैर हमारी बाते बहुत देर तक चली मगर विडंबना यह थी की उस बच्चे ने इतनी चोट खाकर ये मान लिया था की यही उसकी ज़िंदगी है और वह किसी पर दिल खोल कर भरोसा नहीं कर सकता। आसिफ ने मुझे नहीं बताया की वो कहा रहता है, उसे कौन गुब्बारे बेचने भेजता है और गुब्बारे ख़राब हो जाने पर कौन उसको इतनी बेदर्दी से मरता है।

थोड़ी देर बाद आसिफ खड़ा हो गया और आगे बढ़ा ही था शायद किसी और को अपने गुब्बारे बेचने मगर वो वापिस आया और बोला दीदी कुछ खिला दीजिये प्लीज। मैंने पूछा क्या खाना है बताओ ? उसने कहा एक चॉकलेट चाहिए बस। आसिफ मुझे एक दूकान पर लेकर गया और उसने दुकान पर कई चीजे उठाई मगर मैंने बड़ी सी चॉकलेट लेकर आसिफ को दी और बाकी सब वापस रखने को कहा।

आसिफ ने सब चुपचाप वापस रख दिया और चॉकलेट लेकर मेरे तरफ मुस्कुराया और उस चॉकलेट खाते हुए आगे चलता चला गया, हाथ मैं गुब्बारे का गुच्छा था, दूर तक वो मुझे जाते हुई नज़र आया और फिर उस घनी भीड़ मैं कही ओझल हो गया।

मेरी इस कहानी का अंत तो शायद यही है मगर आसिफ जैसे ही लाखों मासूमो की कहानिया आज भी जारी है। आसिफ बड़े पिंजरे में कैद उस छोटे से पंछी की तरह है जिसे खुला आसमान नज़र तो आने दिया जाता है मगर आज़ादी मयस्सर नहीं होती। यह मासूम पंछी हर किसी को नज़र तो आते है मगर इनकी आज़ादी का जिम्मा कोई उठाता नहीं।

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