मोदी सरकार के तीन साल, कैसे कहें बेमिसाल!

Asia Times News Desk

सदा-ए-दिल

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज से ठीक तीन साल पहले 2014 के आम चुनाव में शानदार जीत दर्ज की थी। तक़रीबन तीन दशकों के बाद यह पहला मौका था कि देश में किसी एक पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। चुनाव से पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी ने जनता से ऐसे ऐसे वादे किए कि देश की जनता ने इन वादों पर भरोसा कर लिया और उनकी उम्मीदें बढ़ गईं। अवाम को लगने लगा कि अब उनके सपनों को साकार करने वाला कोई नेता उनके बीच आ गया है।
मोदी ने कहा था कि उन्हें केवल 60 महीने दे दें। अब इन 60 में से 36 महीने पूरे हो चुके हैं। मतलब आधे कार्यकाल से अधिक मोदी पूरा कर चुके हैं। और फिर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आगामी लोकसभा चुनाव यानी मिशन 2019 पर निकलने की घोषणा भी कर चुके हैं।
इधर सरकार तीन साल का जश्न बड़ी धूमधाम से मनाने की तैयारी में है। ऐसे में एक जिम्मेदार नागरिक के नाते सरकार के कामकाज की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है।
साथ ही कुछ सवाल भी मन में उठने लगते हैं। उदाहरण के रूप में बड़ा सवाल यही है कि सरकार ने तो तीन साल पूरे होने पर जश्न मनाने की घोषणा कर दी है, लेकिन क्या देश की जनता भी इस जश्न में शामिल है या वह भी कोई जश्न मनाने की स्थिति मे है?
हक़ीक़त यह है कि जब तक देश का हर नागरिक सरकार के जश्न में शामिल न हो, तब तक यह जश्न बेमानी ही कहलाएगा।
सरकार अपनी उपलब्धियां गिनवा सकती है, अपने द्वारा किए गए काम बता सकती है, लेकिन काम गिनवाने, उपलब्धियां बताने और जश्न मनाने में ही करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाएं, यह तो ढिंढोरा पीटने जैसा है। मोदी सरकार अपने कामकाज के आँकड़ों के साथ तीन साल का जश्न तो मना रही है, लेकिन ज़मीनी हकीक़त क्या है, जनता कितनी संतुष्ट है, क्या उसके भी कुछ आंकड़े सरकार के पास हैं। गरीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, न्याय, क़ानून व्यवस्था का क्या हाल है, इसके बारे में सरकार कुछ कहेगी? किसान, जवान, मुसलमान, नौजवान, महिलाएं कितने सुरक्षित और संतुष्ट हैं, क्या इसका कोई जवाब सरकार के पास है?
नरेंद्र मोदी के वादों को याद करते हुए लोग सवाल कर रहे हैं कि तीन साल के दौरान कितने करोड़ युवाओं को रोज़गार दिया गया? बुलेट ट्रेन चलाने की योजना किस चरण में पहुंची? देश ईमानदार मुल्कों की सूची में कितना ऊपर आया? क्या किसानों ने आत्म हत्या करना बंद कर दिया? सीमा पर जवानों की शहादत में कितनी कमी आई? नक्सलियों के हौसले किस हद तक कम हुए? न्यू इंडिया और मेक इन इंडिया का क्या हश्र हुआ? लोगों में सुरक्षा का एहसास कितना पैदा दुआ? यह और ऐसे अनगिनत सवाल जनता के मन में हैं, लेकिन उनके जवाब देने वाला कोई नहीं। अपने ‘मन की बात’ तो खूब की जाती है, लेकिन जब अवाम अपने मुद्दों का जवाब चाहते हैं या अपने मन की कोई बात करना चाहते हैं तो चुप्पी साध ली जाती है। हालांकि शोर कुछ ऐसा था कि लोगों को विश्वास दिलाया गया कि अगर पाकिस्तान जरा सी भी गुस्ताख़ी करेगा, देश में अंदर या बाहर से हमले होंगे तो शेर जैसी दहाड़ सबको चुप कर देगी, दुश्मनों पर ख़ौफ तारी हो जाएगा।
लेकिन आज तीन साल के बाद लोगों को समझ में आ रहा है कि हाथी के खाने के दांत और हैं और दिखाने के और। मुल्क के लोग खासकर ज्वलंत मुद्दों पर मोदी की राय के दो शब्द सुनने के लिए भी तरस रहे हैं। दादरी में अख़लाक़ की निर्मम हत्या हो, सर्जिकल स्ट्राइक हो, नोटबंदी पर क़तारों में मर रहे लोग हों, कश्मीर जल रहा हो, छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का आतंक हो, सीमा पर भारतीय सैनिकों का अपमान हो, सहारनपुर और अन्य स्थानों पर सांप्रदायिक और जातीय हिंसा हो, लोग प्रधानमंत्री के बयान के लिए मुंह तकते रहे, लोगों को मोदी के जोरदार बयान का इंतजार ही रहा।
दरअसल जिस अख़लाक़ की हत्या ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी, भारत के दामन पर बदनुमा दाग़ लगा, लेकिन प्रधानमंत्री चुप रहे, ऊपर से जख्मों पर नमक छिड़कते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि ज़रूरी तो नहीं कि हर मामले में प्रधानमंत्री बयान दें। नतीजा यह हुआ कि तथाकथित गौरक्षकों के हौसले बुलंद हुए और उनकी ग़ुंडागर्दी आम हो गई।
न कानून का डर न किसी सरकार का ख़ौफ। अख़लाक़ और पहलू खान से आगे बढ़कर न जाने और कितनी ऐसी घटनाएं देश के अन्य भागों में भी घटित होने लगीं। जब प्रधानमंत्री की नज़र में ये घटनाएं इतनी संवेदनशील या गंभीर नहीं कि उन पर बयान दिया जाए तो समस्याएं और प्रश्न तो पैदा होंगे ही।
इसके अलावा रोज़मर्रा के मामले भी उतने बेहतर और स्वागत नहीं कहे जा सकते हैं कि जो जश्न मनाने का कारण बनें। क्योंकि कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां सरकार के फैसलों से जनता सीधे प्रभावित हुई है। नोटबंदी से देश में जो हालात पैदा हुए, इससे सत्ताधारी वर्ग के अलावा शायद ही कोई नागरिक ऐसा हो जो बुरी तरह प्रभावित न हुआ हो।
नोटबंदी के बाद जो संदेह लोगों के ज़हनों में पैदा हुए, वह आज तक बरक़रार हैं। अमीर, ग़रीब, मध्यमवर्ग हर कोई नोटबंदी से प्रभावित हुआ। यहां तक ​​कि 100 से अधिक लोगों की जान भी चली गई।
विपक्ष के कमजोर होने का नतीजा यह हुआ कि नोटबंदी एक गंभीर संकट के रूप में सामने नहीं आ सकी। यहां तक ​​कि चुनाव में भी विपक्षी दल इसे मुद्दा नहीं बना सके। नोटबंदी के अलावा महंगाई की मार भी सब पर पड़ रही है। दाल, आटा, तेल और अन्य खाद्य वस्तुओं की महंगाई का हाल क्या है, खुद बाज़ार में जाकर पता लगाया जा सकता है।
जिस रेलवे के भरोसे करोड़ों लोग हैं, उसकी बात करें तो पिछले तीन साल के दौरान महंगाई की मार सबसे अधिक इसी पर पड़ी है। चाहे फ्लेक्सी फेयर सिस्टम हो (जिसे बाद में वापस लिया गया) या प्रीमियम तत्काल रेल या आम यात्रा, मोदी सरकार के दौरान महंगी हुई। वहीं कच्चे तेल की क़ीमतें कम होने का कोई लाभ देश की जनता को नहीं मिल सका। जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई थी तो विश्व बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें 153 डॉलर प्रति बैरल से महज़ 35 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं।
लेकिन पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर कितना असर पड़ा और जनता को इसका क्या फायदा हुआ, यह हम सब जानते हैं। इसी प्रकार मोदी सरकार ने पीएफ, बचत खातों वग़ैरह में मिलने वाले ब्याज की तिमाही समीक्षा का फैसला किया। अप्रैल से जून 2017 की तिमाही के लिए केंद्र सरकार ने बचत खातों, पीपीएफ और किसान विकास पत्र पर मिलने वाले ब्याज पर पिछले तिमाही की तुलना में शून्य दशमलव 10 प्रतिशत की कमी कर दी।
आईटी के क्षेत्र में काम करने वाले इंजीनियरों को भी आने वाले समय में करारा झटका लग सकता है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिका की नई वीज़ा नीति की वजह से लोगों के सामने परेशानी पैदा हो गई है।
जिस तरह अवसर कम हो रहे हैं और बाज़ार में बदलाव आ रहा है, उसे देखते हुए 2020 तक भारत के 40 लाख सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के 20 प्रतिशत अपनी नौकरी गंवा देंगे। हैरानी की बात यह है कि बाज़ार की हालत ऐसी होगी कि निकाले गए इंजीनियरों के लिए दूसरी नौकरी मिलना बहुत मुश्किल होगा।
आईटी सेक्टर में काम करने वाले या काम करने की इच्छा रखने वाले मुश्किल में हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि रोजगार के इस अकाल ने केवल इसी सेक्टर को प्रभावित किया है। भारत के 48 करोड़ श्रमिक वर्ग में और भी कई क्षेत्रों के लोगों पर अनिश्चित्ता के बादल छाए हुए हैं। सबसे अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करने वाले बैंकिंग क्षेत्र में भी स्थिति बेहतर नहीं कही जा सकते। फिर हम कैसे कहें कि तीन साल बेमिसाल?

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