पांच वजहें जिनसे साफ है कि बिहार में जो कुछ हुआ उसकी पूरी पटकथा पहले से तैयार थी

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इस्तीफे के कुछ घंटे के भीतर ही नीतीश कुमार का फिर से बिहार का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था. उसके बाद बहुत लोगों ने यह आरोप लगाया कि इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की पटकथा पहले से तैयार कर ली गई थी. इस तरह की बात कल तक उनके सहयोगी रहे राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू यादव ने भी कही और कांग्रेस के नेताओं ने भी. पूरे घटनाक्रम को ध्यान से देखा जाए तो ऐसे कम से कम पांच संकेत मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि ये आरोप हवा-हवाई नहीं हैं बल्कि इनमें काफी दम है.

राज्यपाल का पटना में होना

बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बन जाने के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को बिहार का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. इस नाते देखा जाए तो सामान्य तौर पर उनके पटना में कम और कोलकाता में रहने की अधिक संभावना है. लेकिन बुधवार को वे पटना में उपस्थित थे. लालू यादव ने खुद कहा कि मंगलवार रात तक उनकी नीतीश कुमार से बात हुई और तेजस्वी यादव की तो बुधवार सुबह तक नीतीश से बात हुई है. इसके बावजूद उन्हें तब तक नीतीश ने अपने इस्तीफे की भनक नहीं लगने दी जब तक वे राजभवन के लिए रवाना नहीं हो गए.

बिहार में नई सरकार बनाने के लिए जो पटकथा जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी ने लिखी उसमें सबसे पहले यह सुनिश्चित किया गया कि राज्यपाल बुधवार को पटना में रहें. अगर अतिरिक्त प्रभार वाले राज्यपाल पटना में नहीं होते तो नीतीश कुमार को इंतजार करना पड़ता. याद कीजिए जब 2015 के शुरुआती दिनों में नीतीश कुमार जीतन राम मांझी को बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाने की योजना पर काम कर रहे थे तो उस वक्त भी केसरीनाथ त्रिपाठी के पास बिहार के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार था. उस वक्त जब नीतीश उनसे मिलना चाहते थे तो वे पटना में नहीं होते थे और जब जीतन राम मांझी को मिलना होता था तो त्रिपाठी आसानी से उपलब्ध हो जाते थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट

नीतीश कुमार के राजभवन से इस्तीफा देकर निकलने के 10 मिनट के अंदर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निर्णय के समर्थन में ट्वीट कर दिया. इसमें उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ नीतीश कुमार ने जो रुख अपनाया है, वह स्वागतयोग्य है और अब जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी जाए. इसके बाद कई केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के दूसरे नेताओं ने बयान देना शुरू कर दिया.

भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक

नीतीश का इस्तीफा सार्वजनिक होने के घंटे भर के अंदर भारतीय जनता पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक हो गई. संसदीय बोर्ड निर्णय लेने के मामले में पार्टी में सबसे ऊपर है. इसमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. जाहिर है कि इसका समय पहले से तय किया गया होगा ताकि उनकी उस वक्त बतौर प्रधानमंत्री कोई व्यस्तता नहीं रहे.

पूरी पटकथा पहले से लिखी होने की पुष्टि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संसदीय बोर्ड की बैठक में मौजूदगी से होती है. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अपने आवास से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पार्टी मुख्यालय तक उन्हें पहुंचने में अच्छा-खासा वक्त लगेगा. अगर वे चार्टर्ड जहाज से भी आएं तो भी घर से निकलकर पार्टी मुख्यालय तक पहुंचने में कम से कम तीन से चार घंटे का समय चाहिए. जाहिर है कि शिवराज सिंह चौहान समेत संसदीय बोर्ड के सभी सदस्यों को पहले से इस बैठक के बारे में पार्टी की ओर से बताकर रखा गया होगा.

जदयू और भाजपा विधायकों की पटना में मौजूदगी

भौगोलिक तौर पर देखा जाए तो बिहार कोई छोटा राज्य नहीं है. राज्य में कई ऐसे इलाके हैं, जहां से राज्य की राजधानी पटना पहुंचने में आठ-दस घंटे का वक्त लगता है. ऐसे में अगर कोई पार्टी आपातकालीन स्थिति में भी अपने विधायकों को पटना में जमा करना चाहे तो उसे ऐसा करने के लिए 10 से 12 घंटे का वक्त कम से कम चाहिए.

लेकिन जब नीतीश कुमार ने इस्तीफा दिया तो पार्टी के सारे विधायक पटना में मौजूद थे. पहले से तैयार पटकथा को खारिज करने वाले यह तर्क दे सकते हैं कि नीतीश कुमार ने पहले से विधायकों की बैठक बुला रखी थी. लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं होगा कि भाजपा के सारे विधायक नीतीश के इस्तीफे के वक्त राज्य की राजधानी पटना में क्या कर रहे थे. साफ है कि पार्टी ने उन्हें पहले से निर्देश दे रखा होगा कि बुधवार को सभी को पटना में रहना है. नीतीश के इस्तीफे के कुछ ही घंटे के अंदर जदयू और भाजपा के विधायकों की साझा बैठक बिहार के मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास पर हुई और इसमें नीतीश को नेता चुना गया और सरकार बनाने का निर्णय हुआ. अगर भाजपा के विधायक पटना में नहीं रहते तो यह काम इतनी तेजी के साथ नहीं हो सकता था.

पहले से विधानसभा सत्र की सूचना

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार शुक्रवार को विधानसभा में बहुमत साबित करेंगे. ऐसे पर्याप्त संकेत हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि यह भी पहले से तैयार पटकथा का हिस्सा है. क्योंकि जब नीतीश महागठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री थे तो उसी वक्त से यह तय था कि 28 जुलाई यानी शुक्रवार से विधानसभा का सत्र शुरू होगा. इसका मतलब यह हुआ कि नीतीश कुमार नई सरकार बनाने के बाद सत्र बुलाने की औपचारिकता में लगने वाले समय को कम से कम रखना चाह रहे थे. पहले से सत्र की सूचना होने से इसके लिए जरूरी कई प्रक्रियागत काम निपटा लिए गए होंगे. इस तरह नए सिरे से सत्र बुलाने की अड़चन कम हो गई.


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