डिजिटल दौर में सत्याग्रह

कार्ल मलामुड

Asia Times Desk

हमारी दुनिया संकट में है. अंधाधुंध हिंसा और आतंक विश्व के हर कोने में फैल चुका है, हमारी दुनिया पर्यावरण विध्वंस को झेल रही है और हम कोई कदम नहीं उठा रहे हैं, आय की असमानता बढ़ती जा रही है और भूख और अकाल फैलते जा रहे हैं. इतनी बड़ी आपदा से निपटने का एक अकेले मनुष्य के पास क्या रास्ता है?

मेरे ख्याल से इसका जवाब हमें अपने महान नेताओं के बताए रास्तों पर चलने से मिलेगा, जिन्होंने दुनिया में हो रही गलत चीजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और उन्हें दुरूस्त किया. भारत और अमेरिका में- जो हमारी आधुनिक दुनिया के सबसे बड़े और महान लोकतंत्र हैं- हम इनके उदाहरण देख सकते हैं. भारत में, गांधी और नेहरू की शिक्षा और सारे स्वतंत्रता सेनानी हमें निरंतर प्रेरित करते हैं. अमेरिका में, मार्टिन लूथर किंग, थरगुड मार्शल और वे सभी लोग प्रेरक हैं जिन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया.

एक मनुष्य के तौर पर हमारे लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि हमें ढृढ़ रहना है और अपने ध्यान को नहीं भटकने देना है. ढृढ़ता का मतलब यह है कि दुनिया को बदलने का काम एक फेसबुक पोस्ट और ट्वीट से बहुत बड़ा है. ढृढ़ता का मतलब है कि दुनिया में हो रहे गलत को सही करने में, और खुद को और अपने नेताओं को शिक्षित करने में दशकों लग सकते हैं. गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका और भारत में कांग्रेस के अपने कार्यकर्ताओं को खुद को शिक्षित करने का रास्ता दिखाया, ताकि वे मूल्य, नैतिकता और चरित्र पर ध्यान दे सकें. यह एक ऐसी शिक्षा है जिसे उन सभी को प्राप्त करनी चाहिए जो जनता का नेतृत्व करना चाहते हैं.

गांधीजी और मार्टिन लूथर किंग के सबसे महत्वपूर्ण सबक में ध्यान केन्द्रित करना शामिल है. कोई चुनिंदा चीज उठाएं जो महत्वपूर्ण हो और उसे बदलने की कोशिश करें. अपने उद्देश्य को सीमित रखें: नमक टैक्स को हटाना, काउंटर पर बैठकर खाना खाने का अधिकार, स्कूल जाने का अधिकार, चुनाव में वोट देने का अधिकार, बंटाईदारी को खत्म करना.

एक दशक तक मैंने सिर्फ कानून के राज को बढ़ावा देने के मुद्दे पर ध्यान दिया. जॉन एफ. केनेडी ने एक बार कहा था कि अगर हम शांतिपूर्ण क्रांति के तरीकों को असंभव बना देंगे, तो क्रांति के हिंसक तरीके अनिवार्य हो जाएंगे. एक न्यायपूर्ण समाज में, एक विकसित लोकतंत्र में, हम आम लोग उन नियमों को जानते हैं जिसके तहत हम खुद पर शासन करने का चुनाव करते हैं और हमारे पास दुनिया को बेहतर बनाने के लिए उन नियमों को बदलने की क्षमता है.

हमारी आधुनिक दुनिया में, कुछ विशेष तरह के नियम हैं, और वे सामाजिक सुरक्षा के लिए हैं. यह तकनीकी मानक तय करते हैं कि हम कैसे अपने लिए सुरक्षित रिहायश और दफ्तर बनाएं, फैक्टरियों में मशीनों के साथ काम करने वाले मजदूरों को कैसे बचाएं, कीटनाशक दवाइयों का कैसे सही तरीके से इस्तेमाल करें. इसमें ऑटोमोबाइल की सुरक्षा, नदियों और समुद्रों के संरक्षण समेत कई मुद्दे शामिल हैं. यह हमारे कुछ बेहद महत्वपूर्ण कानून हैं.

दुनिया भर में, कुछ अपवादों को छोड़कर, कानूनी मान्यता प्राप्त सामाजिक सुरक्षा के नियमों को जानबूझकर सीमित रखा गया है. अमेरिका में, बहुत सारे गैर-सरकारी संगठन इमारतों और आग से निपटने के कोड विकसित करते हैं और बाद में उन्हें कानून में तब्दील कर दिया जाता है. इन कोड की एक कॉपी को बनाने में सैकड़ों डॉलर खर्च होते हैं और, खासतौर पर, कॉपीराइट का मामला खड़ा कर दिया जाता है ताकि कोई व्यक्ति बिना निजी संस्था से लाइसेंस लिए कानून के बारे में बात न कर सके.

भारत में भी यही हुआ है, लेकिन यहां पर सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं को लोगों तक पहुंचने नहीं दिया. भारतीय मानक ब्यूरो इन कोड पर अपना कॉपीराइट जताता है और भारतीय राष्ट्रीय बिल्डिंग कोड की एक किताब के लिए 13,760 रूपए लेता है. मैंने सुना है कि जब सरकारी आपदा नियंत्रण टास्क फोर्स की बैठक हुई और यह सुझाव दिया गया कि सारे सरकारी अधिकारियों को आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए इन महत्वपूर्ण सुरक्षा कोड की एक कॉपी दी जाए, तो भारतीय मानक ब्यूरो ने बताया कि वे तभी इसकी कॉपी उपलब्ध कराएंगे जब हर अधिकारी लाइसेंस संबंधी एक समझौता करेगा और 13,760 रूपए फीस के तौर पर देगा. इसकी दूसरी कॉपी बनाने की भी किसी को इजाजत नहीं होगी.

मैंने एक दशक पहले इस परिस्थिति को बदलने की कोशिश की. मेरे एनजीओ ने दुनिया भर में कानून की मदद से इस सुरक्षा कोड को खरीदना शुरू किया. अमेरिका में, मैंने 1000 से ज्यादा संघीय मान्यता प्राप्त सुरक्षा मानकों को खरीदा, उन्हें स्कैन किया और फिर इंटरनेट पर लगा दिया. भारत में, मैंने सारे 19000 भारतीय मानकों को खरीदकर इंटरनेट पर उन्हें पोस्ट कर दिया.

हमने सिर्फ उनकी कॉपी खरीदने और उनका स्कैन करने से आगे का काम किया. हमने कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल कर उन्हें आधुनिक वेब पेज पर फिर से टाइप किया, सारे रेखा-चित्र फिर से बनाएं और सारे दस्तावेजों में आधुनिक टाइपोग्राफी की व्यवस्था की. हमने इन मानकों को इस तरह से कोड किया कि नेत्रहीन व्यक्ति भी इन दस्तावेजों का आसानी से इस्तेमाल कर सके. हमने इन कोड को ई-बुक्स में भी ढाला और एक सुरक्षित वेबसाइट में सारे दस्तावेज को इंटरनेट पर ढूढ़ने की व्यवस्था भी की.

सरकारों की झुंझलाहट

हमारे इस पहल को लेकर सरकारें खुश नहीं थीं. अमेरिका में हमारे खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया गया और 6 अभियोगों में गहन मुकदमेबाजी हुई. फिलहाल हमारे मामले की सुनवाई अमरीकी अपील कोर्ट के सामने चल रही है. भारत में, ब्यूरो ने हमें कोई अन्य दस्तावेज बेचने से मना कर दिया- मंत्रालय के सामने राहत के लिए दी गई याचिका भी खारिज कर दी गई- हमने भारत के कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर इसे लेकर एक जनहित याचिका दायर की जो अभी माननीय दिल्ली हाई कोर्ट के सामने है. हमारे वकील हमें अपना समय देने के बदले फीस नहीं ले रहे हैं, उन्होंने हमारे काम के लिए 10 मिलियन डॉलर की मुफ्त कानूनी मदद की है.

हम जहां कोर्ट से न्याय पाने के लिए लड़ रहे हैं, वहीं हम इन दस्तावेजों को करोड़ों पाठकों के लिए भी इंटरनेट पर उपलब्ध करा रहे हैं. खासतौर पर बड़े भारतीय इंजीनियरिंग संस्थानों में भारतीय मानक काफी लोकप्रिय हैं, जहां छात्र और प्रोफेसर अपनी शिक्षा के लिए जरूरी इन मानकों की उपलब्धता से बहुत खुश हैं.

हर पीढ़ी के पास एस मौका होता है. इंटरनेट ने हमारी दुनिया को सच में एक बड़ा मौका दिया है और यह सभी लोगों की ज्ञान तक पहुंच है. मेरा सारा ध्यान सरकारी फरमानों और हमारे महान लोकतंत्र के कानून तक पहुंच प्राप्त करने में लगा है, लेकिन यह सिर्फ इस बड़े मौके का एक छोटा हिस्सा है. हमें अपनी निगाहों को उठाकर देखना होगा.

ज्ञान और कानून के राज तक वैश्विक पहुंच ही हमारी दुनिया को उन दुर्गम बाधाओं को पार करने में मदद करेगा जिन्हें आज हम झेल रहे हैं. लेकिन, यह तभी होगा जब हम गांधी की तरह सार्वजनिक कार्यों में जुटेंगे जैसा हमसे कई बार कहा गया है. और, यह तभी होगा जब हम सब चुनिंदा मसलों पर ध्यान लगाकर उन्हें लगातार और व्यवस्थित तरीके से अंजाम देते रहेंगे.

मार्टिन लूथर किंग ने हमें सिखाया है कि बदलाव अनिवार्यता के चक्कों पर सवार होकर नहीं आता, यह निरंतर संघर्ष के जरिये आता है. हम दुनिया बदल सकते हैं, लेकिन इसके लिए हमें संघर्ष करना होगा. अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम उन रास्तों पर जा सकेंगे जहां ज्ञान तक हमारी पूरी पहुंच होगी और साथ मिलकर हम पहाड़ पर बसे उस चमकते शहर में दाखिल होंगे, जहां न्याय पानी की तरह बहता है और सच्चाई ताकतवर धाराओं की तरह.

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