इस बार मंत्रिमंडल विस्तार से नरेंद्र मोदी किस तरह की राजनीति साधने की कोशिश कर सकते हैं?

इस बार मंत्रिमंडल विस्तार की जरूरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक और प्रशासनिक, दोनों लिहाज से है

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संसद का माॅनसून सत्र खत्म होने के बाद मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार की संभावना है. 11 अगस्त को सत्र का आखिरी दिन है. तब तक उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. इसके बाद राजनीतिक वर्ग या यों कहें कि केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का पूरा ध्यान गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों पर केंद्रित हो जाएगा.

6 मई, 2014 को सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक दो बार अपनी टीम का विस्तार किया है. इनमें पहला तो सरकार बनने के छह महीने के भीतर ही हुआ था. दूसरा पिछले साल जुलाई में हुआ. प्रधानमंत्री को इस बार मंत्रिमंडल विस्तार की जरूरत राजनीतिक और प्रशासनिक, दोनों लिहाज से है.

अतिरिक्त प्रभार का भार

व्यावहारिक तौर पर कहा जाए तो केंद्र सरकार के कई मंत्रालय खाली हैं. तकनीकी तौर पर देखें तो इनका अतिरिक्त प्रभार किसी न किसी मंत्री के पास है. मनोहर पर्रिकर के फिर से गोवा का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार वित्त मंत्री अरुण जेटली के पास है. चीन के साथ चल रहे विवाद, पाकिस्तान से अक्सर बनी रहने वाली तनातनी और रक्षा क्षेत्र को लेकर सीएजी की कई प्रतिकूल रिपोर्टों के बाद पैदा हुई स्थिति में एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं होने की कमी बहुत लोगों को खली. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने की वजह से जेटली की व्यस्तता वित्त मंत्रालय के कामकाज में अधिक बताई जा रही है. ऐसे में रक्षा मंत्रालय का काम ठीक से नहीं चल पा रहा है.

अनिल माधव दवे के निधन के बाद पर्यावरण मंत्रालय हर्षवर्धन संभाल रहे हैं. उनके पास पहले से विज्ञान प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय हैं. कई अहम विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय मंजूरी की अनिवार्यता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली पर्यावरण कूटनीति को देखते हुए एक पूर्णकालिक पर्यावरण मंत्री के बगैर ठीक से काम चलता नहीं दिख रहा. इसी तरह वैंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हो जाने से शहरी विकास मंत्रालय और सूचना प्रसारण मंत्रालय का प्रभार भी दूसरे मंत्रियों के पास है. सूचना प्रसारण मंत्रालय भी अहम है लेकिन शहरी विकास मंत्रालय पर तो नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी परियोजना स्मार्ट सिटी के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है. ऐसे में इसे भी प्रभारी मंत्री के जरिए चलाना मुश्किल है.

वैसे भी यह मोदी सरकार कार्यकाल का आखिरी मंत्रिमंडल विस्तार है और सरकार के पास ठीक से काम करने के लिए तकरीबन साल भर से थोड़ा ही अधिक का वक्त बचा है. कोई भी सरकार अपने आखिरी छह महीने में तो चुनावों की तैयारियों में ही लगी रहती है. इस नाते भी प्रधानमंत्री मोदी को अपनी टीम मजबूत करने की जरूरत है ताकि सरकारी योजनाएं उस स्तर तक पहुंच सकें जहां से मतदाताओं को अपने पाले में लाने में आसानी हो.

कौन-कौन से नाम?

अब सवाल यह उठता है कि संभावित फेरबदल में किन लोगों को शामिल किए जाने या किन लोगों को हटाए जाने की चर्चाएं चल रही हैं. पांच जुलाई, 2016 को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में प्रकाश जावड़ेकर को स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री से प्रमोट करके कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था. इससे उस वक्त कुछ स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों में असंतोष की बात सुनी गई थी. ऐसे में संभव है कि पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, मुख्तार अब्बास नकवी और मनोज सिन्हा को कैबिनेट मंत्री बना दिया जाए. इनमें भी पीयूष गोयल और धर्मेंद्र प्रधान तो इस सरकार के स्टार परफाॅर्मरों में शुमार होते हैं.

जिन मंत्रियों को टीम मोदी से हटाए जाने की चर्चा है उनमें सबसे पहला नाम कलराज मिश्र का लिया जा रहा है. कहा जाता है कि पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में उनकी कुर्सी इसलिए बच गई थी कि कुछ ही महीने बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे. उन्हें मंत्रिमंडल से हटाए जाने की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि उनकी उम्र 75 साल से अधिक हो गई है. मोदी सरकार में 75 साल की उम्र सीमा अघोषित सेवानिवृत्ति की आयु बन गई है. लेकिन उन्हें हटाने में एक बड़ा पेंच यह है कि योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने से प्रदेश के ब्राह्मण वर्ग में नाराजगी बताई जा रही है. ऐसे में अगर कलराज मिश्र हटते हैं तो नरेंद्र मोदी के अपनी टीम में उत्तर प्रदेश के किसी ब्राह्मण नेता को जगह देनी होगी या उसका प्रमोशन करना होगा. इस नाते देखें तो मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय को प्रमोशन मिल सकता है. ऐसे ही कृषि मंत्री राधामोहन सिंह को हटाए जाने को लेकर भी चर्चाएं हैं. पिछली बार भी ऐसी चर्चाएं थीं, लेकिन उनकी कुर्सी बच गई थी.

मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले नेताओं में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का नाम भी चल रहा था. लालू परिवार को घेरने में उन्होंने जिस तरह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा के लिए उपनी उपयोगिता साबित की है, उसे ध्यान में रखते हुए यह बात कही जा रही थी. लेकिन फिलहाल उनके बिहार का उपमुख्यमंत्री बन जाने के बाद इन कयासों पर विराम लग गया है. पार्टी महासचिव राम माधव और भूपेंद्र यादव के नामों को लेकर भी चर्चाएं हैं. इसी तरह अनुराग ठाकुर का नाम भी चल रहा है. जिस तरह से पूर्वोत्तर पर इस सरकार और भाजपा का जोर है, उसे देखते हुए यह भी कहा जा रहा है कि भारत के इस इलाके के कुछ चेहरों को भी मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए मोदी सरकार में जगह दी जा सकती है. भाजपा के नए सहयोगी जेडीयू को भी इसमें जगह मिलेगी, ऐसी चर्चा भी चल रही है.

चौंकाने वाले नाम भी हो सकते हैं

हालांकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अब तक की जो कार्यशैली रही है उसे देखते हुए पक्के तौर पर किसी नाम पर अंतिम तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. भारत के संविधान के अनुच्छेद-75 के मुताबिक यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है कि वह अपना मंत्रिमंडल चुने. लेकिन आम तौर पर सत्ताधारी पार्टी में राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से मंत्रिमंडल के स्वरूप को लेकर चर्चाएं होना आम है. मोदी सरकार के बारे में यह कहा जाता है कि यहां किसी को मंत्री बनाने या नहीं बनाने का फैसला खुद प्रधानमंत्री लेते हैं और जरूरत पड़ने पर उनकी चर्चा सिर्फ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से होती है. ऐसे में किसी भी नाम को लेकर पक्के तौर पर कुछ कहना बेहद मुश्किल काम है. संभव है कि मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ चौंकाने वाले नाम भी सामने आएं.

आने वाले दिनों में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन राज्यों के सियासी समीकरणों को साधने और भाजपा की चुनावी संभावनाओं को मजबूती देने का काम भी कर सकते हैं. इस साल हिमाचल प्रदेश और प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में चुनाव होने हैं. संभव है कि गुजरात के एक-दो मंत्रियों का प्रमोशन हो. ऐसे ही हिमाचल प्रदेश से अनुराग ठाकुर को भी केंद्र सरकार में लाया जा सकता है. अगले साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी चुनाव होने हैं. ऐसे में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व भी केंद्र सरकार में बढ़ सकता है.

2019 में लोकसभा चुनावों के साथ ही ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें भाजपा को
ओडिशा में सबसे अधिक और तेलंगाना में ठीक-ठाक संभावनाएं दिख रही हैं. इसलिए संभव है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में धर्मेंद्र प्रधान को कैबिनेट मंत्री बना दिया जाए. ऐसे ही तेलंगाना से भी किसी ऐसे नेता को मोदी सरकार में जगह दी जा सकती है जो राज्य में भाजपा के पक्ष में माहौल बना सके.


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